कार्ल मार्क्स : जीवन परिचय, शिक्षा,परिवार, सिद्धांत, दास केपिटल, अनमोल वचन | Biography of Karl Marx in Hindi

Karl Marx Biography in  Hindi :-

दोस्तों कार्ल मार्क्स एक ऐसे इतिहासकार, एक ऐसे दार्शनिक, एक ऐसे अर्थशास्त्री और एक ऐसे समाज शास्त्री जिसे दुनिया आज भी याद करती है और उनके सिद्धांतों को पूरी दुनिया में सराहा गया है। केवल उनको दुनिया में उन्हें याद ही नहीं किया जाता है पर उनके सिद्धांतों को कई देशों में आज भी गंभीर रूप से मान्यता प्राप्त है। उनके सिद्धांतों पर चलते हुए चीन और रूस जैसे देशों ने अपने देश का विकास बहुत ही तेजी से किया है। 

वे एक ऐसे दर्शनशास्त्री थे और ऐसे अर्थशस्त्री थे जिन्होंने विश्व को एक अलग विज़न से देखा और विश्व में समाजवाद जैसी विचारधारा का सूत्रधार रखा। आइये जानते है कार्ल मार्क्स के जीवन परिचय, जन्म,परिवारिक जिंदगी, उनके सिद्धांतों और उनकी लिखी दास केपिटल के बारे में क्या थे उनके जीवन का इतिहास।


कार्ल मार्क्स : जीवन परिचय, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, ऐतिहासिक 

भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष का सिद्धांत, कम्युनिस्ट घोषणापत्र


कार्ल मार्क्स शार्ट बायोग्राफी | Karl Marx short biography in Hindi


1

कार्ल  मार्क्स की  जन्म दिनांक

मई 1818 

2

जन्म स्थान 

 जर्मनी

3

पिता का नाम

हेनरिच मार्क्स

4

माता का नाम

हेनरीट प्रेसबर्ग

5

पत्नी का नाम 

जेनी वॉन वेस्टफेलन

6

कुल बच्चे 

 सात

7

बच्चों के नाम

जेनी कैरोलिन ,जेनी लौराएडगर , 

हेनरी एडवर्ड गाइ , 

जेनी एवलिन फ्रांसिस

जेनी जूलिया एलेनोर एक का ज्ञात नहीं।

8

धर्म

ईसाईपहले यहूदी थे।

9

व्यवसाय 

 वकीलदर्शनशस्त्री और समाजशास्त्री

10

कार्ल मार्क्स की शिक्षा (education)

एडवोकेट (Law)

11

प्रसिद्ध किताबें

 दास कैपिटलकम्युनिस्ट मेनिफेस्टो

12

 कार्ल मार्क्स के सिद्धांत

 द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद

ऐतिहासिक भौतिकवाद,

 वर्ग संघर्ष का सिद्धांत

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत

13

कार्ल मार्क्स की मृत्यु की तारीख

14 मार्च 1883

14

मृत्यु के समय उम्र

64 वर्ष, 9 महीने, 30 दिन

15

मृत्यु का कारण

 फेफड़ों में सूजन

16

कार्ल मार्क्स की कब्र कहां है

लन्दन मेंहाईगेट सिमेट्री

 

कार्ल मार्क्स का जन्म और परिवारिक जिंदगी (Birth and family life of Karl Marx)

कार्ल मार्क्स का जन्म एक जर्मन परिवार में 5 मई 1818 को हुआ था जो एक यहूदी परिवार से सबंध रखते थे। उनके पिता जी का नाम हेनरिच मार्क्स था जो पेशे से एक कुशल वकील थे। उनकी माता जी का नाम हेनरीट प्रेसबर्ग था जो की एक ब्रुकेंगासे की रहने वाली थी। अगर उनके बचपन के इतिहास की पूरी जानकारी की बात करें तो सटीक जानकारी हासिल नहीं है पर कार्ल मार्क्स अपने 9 भाई बहनों में से एक थे। 


और उनके एक भाई का देहांत हो गया था जिसका नाम मोरित्ज़ था। मार्क्स के भाई बहनों का नाम सोफी, हरमन, हेनरीएट, लुईस, एमिली और कैरोलिन था। उनके पिता जी एक वकील थे और एक आदर्शवादी सिद्धांत के थे। कार्ल मार्क्स की दो पत्नियां थी जिनका नाम जेनी वोन वेस्टफलेन और एलेनर मार्क्स था।


कार्ल मार्क्स का बचपन और शिक्षा का सफर |Karl Marx's childhood and education journey

  

अगर कार्ल मार्क्स की शिक्षा और और उनके बचपन की बात करें तो उनका बचपन किसी संघर्ष से कम नहीं था। बचपन में उन्हें जर्मन की रूढ़िवादी विचारधारा का सामना करना पड़ा था और कार्ल मार्क्स और उनका परिवार एक सिद्धांतवादी किस्म का था। ऐसे माहौल में उनकी शिक्षा के सफर की बात करें तो वह भी चुनोतोपूर्ण रहा था। 

1830 में कार्ल मार्क्स के पिता जी ने उनकी शिक्षा का सारा कार्यभार अपने निजी तौर पर किया। उनके पिता जी ने उनकी ट्रायर हाई स्कूल का सफर निजी तौर पर पूरा करवाया। दरअसल उनकी शिक्षा के सफर में सबसे बड़ी मुश्किल ये थी की उस वक्त जर्मनी में उदार मानवतावादियों का बोलबाला था। मार्क्स बचपन से ही एक अलग किस्म के इंसान थे इसलिए उन्हें इस विचारधारा का सामना भी करना पड़ा। देश में उदार वादियों का बोलबाला होने के कारण उन्हें भी देश द्रोह में एक बार शामिल किया गया था। 1832 में उन्हें देश के उदारवादियों का सामना करना पड़ा और इसी के बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई को जारी रखा था।

जब मार्क्स मात्र 17 साल के थे तब उन्होंने दर्शन और साहित्य का अध्ययन करने के लिए बॉन विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। उनके पिता जी उनका करियर एक वकील के रूप में देखना चाहते थे इसलिए उन्हें बाद में बॉन विश्वविद्यालय में दाखिल करवाया गया। इस दौरान वे पढ़ने में अच्छे थे और सभी विषयों में उनकी कमांड थी। पर उनकी पढ़ाई में एक मुश्किल पहले से चलती आई थी थी की वे फिर से अपनी पढ़ाई का सफर राजनीतिक कट्टरपंथियों की निगरानी में कर रहे थे। 

कुछ समय बाद इस स्थिति के कारण उनकी पढ़ाई में वधा उत्पन हुई और उन्होंने अपना विश्वविद्यालय फिर से बदल लिया उनके पिता को बर्लिन के अधिक गंभीर और अकादमिक विश्वविद्यालय में स्थानांतरण के लिए मजबूर होना पड़ा।

 

कार्ल मार्क्स का जेर्नलिस्म का सफर और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद | Karl Marx's Journey to Journalism 

कार्ल मार्क्स ने 1835 के बाद अपने करियर को लेकर गंभीरता से लिया और उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए बर्लिन का रुख किया जहां पर उनका एक ही मकशद था वह था वकालत की पढ़ाई करना। अपने इस सफर में वे एक अच्छे दर्शनशस्त्री के रूप में सामने आये। इस सफर के दौरान उन्होंने जर्मनी के उदारवाद और हीगल के द्वंदवाद को बड़ी ही नजदीकी से पढ़ा। वे जर्मनी के उदारवादी विचाधारों से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। 

उसके बाद उन्होंने वक्त के मृत जर्मन दार्शनिक विचारों को त्यागा और जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल में दिलचस्पी हो गई और इसी में अपना दर्शनशस्त्र की विचारों को आगे बढ़ाया। 1837 में कार्ल मार्क्स ने जर्मनी की उदारवादी और नॉन -उदारवादी विचाधारा के लिए लिखना शुरू कर दिया।

मार्क्स एक अकादमिक करियर पर विचार कर रहे थे, लेकिन सरकार द्वारा शास्त्रीय उदारवाद और यंग हेगेलियन के बढ़ते विरोध के कारण यह रास्ता उनके लिए सरकार की नजरों में सही नहीं था। सरकार ने वहां से उन्हें फिर प्रतिबंधित कर दिया और वे 1842 में कोलोन चले गए जहां पर उन्होंने एक पत्रकार बनने का फैसला किया। अब वे एक कटटरपंथी हेगेलियन समर्थक बन चुके थे। 

उन्होंने अपने पहले लेख में पहली बार समाचार पत्र राइनिशे ज़ितुंग (राइनलैंड न्यूज़) के लिए लिखा और पूंजीवाद और समाजवाद के बीच में अक अंतर् लाने की कोशिश की। इस लेख ने भी उनके लिए मुश्किलें बढ़ाई और उनके लेख के लिए एक प्रत्यक्ष दर्शी जाँच की मांग की गई।

 

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कार्ल मार्क्स की पेरिस यात्रा | Karl Marx's Paris Tour 

1843 में कार्ल मार्क्स ने अपनी पत्नी के साथ फ्रांस की राजधानी पेरिस की और रुख किया वहां पर उन्हें एक अखबार के लिए एक पत्रकार के रूप में काम करना था। वहां पर उन्हें "फ्रेंको-जर्मन वार्षिक पुस्तकें" नामक अख़बार के लिए काम किया। उनके साथ इस अखबार में काम किया उनके सहयोगी अरनोईड रिउज ने,जो एक जर्मन फिलोसोफर थे। कार्ल मार्क्स को इस देश में जाकर भी कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा। 

इसी कार्यकाल में उन्होंने अपने सहयोगी के साथ अच्छा काम किया पर फिर भी उनके लेखों में समाजवाद के प्रति झलक साफ दिखती थी। उनके कुछ लेखों ने उन्हें एक बार फिर से टारगेट किया जो उन्होंने राजशाही और उदारवादी विचरधारा के विरुद्ध लिखे थे। इस सफर के दौरान भी उन्होंने अपनी समाजवादी नीतियों को अपनाये रखा और अपने लेख जारी रखे। 

उनके समाजवादी विचारधारा को एक सही सोच तब मिली जब वे पेरिस में एक समाजवादी विचारक से मिले जिनका नाम फ्रेडरिक एंगेल्स था। दोनों ने भौतिकवादी विचारधारा के विरुद्ध नई सोच को जन्म दिया और दोनों ने अपने लेखों से यूरोप में समाजवादी विचरधारा का विकास किया।

 

क्या था कार्ल मार्क्स का सिद्धांत या कम्युनिस्ट घोषणापत्र | What was Karl Marx's theory or Communist Manifesto

हम सभी जानते हैं हैं कि रुसी क्रांति किस वजह से आई थी जिस वजह से पूरी दुनिया दो धड़ों में वंट गई थी। कार्ल मार्क्स और उनके सहयोगी ने जो भी अपनी कृतियां लिखी थी उस वजह से समाजवाद का विकास हुआ और समाजवादी विचरधारा को एक नया आयाम मिला पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पूंजीवादी विचारधारा ने भी अपनी जड़ों को कायम रखा और इस वजह से वे भी आज पूरी दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाये हुए हैं। 

मार्क्सवाद या कार्ल मार्क्स का सिद्धांत या फिर कम्युनिस्ट घोषणापत्र के संधर्व में उन्होंने एक किताब लिखी थी जिसका नाम दास कैपिटल था। उन्होंने अपने घोषणा पात्र में सीधे तौर से दो वर्गों के बीच संघर्ष की बात कही थी। उन्होंने समाज को दो वर्गों में बांटा हुआ था एक वर्ग का नाम "सर्वहारा वर्ग" और दूसरे का नाम "बुर्जुआ वर्ग" था। 

वे एक समाजवादी विचारधरा के थे इसलिए उन्होंने अपने घोषणा पत्र में सीधे तौर से ये वैज्ञानिक व्याख्या की थी कि किस तरह "सर्वहारा वर्ग" , "बुर्जुआ वर्ग" को सत्ता से हटाकर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेगा।

 हालाँकि इस विचारधारा के प्रति कुछ विचारकों ने ये बात कही कि दुनिया में अशांति या गैरबराबरी का कारण कार्लमार्क्स का सिद्धांत है पर उनके इस सिद्धांत ने समाजवादी विचारधरा की दुनिया में एक नीव रखी। उनके इस सिद्धांत के बाद रूस, क्यूबा और चीन जैसे देशों में क्रांति आई और मजदूरों ने संपत्ति को नुक्सान भी पहुँचाया था। 

दूसरा उनके मेनिफेस्टो में ये भी साफ लिखा था कि दुनिया में आर्थिक मंदी का आना, पूंजीवाद की वजह से है। उनका ये मानना था कि पूंजीवादी विचारधारा में संपत्ति को नियत्रित करने के लिए कोई उदेश्य निहित नहीं होता है इसलिए विश्व में मंदी आती है। 

वैसे कार्ल मार्क्स के सिद्धांत को चार भागों में बांटा गया था जो निम्नलिखित थे।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद

ऐतिहासिक भौतिकवाद

वर्ग संघर्ष का सिद्धांत

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत

 

कार्ल मार्क्स की दास केपिटल (Karl Marx's Das Capital) 

कार्ल मार्क्स एक साम्यवादी विचारधारा के विचारक थे। दास केपिटल एक ऐसी किताब थी जिसका विमोचन या प्रकाशन कार्ल मार्क्स ने 1867 में किया था। इस किताब में कार्ल मार्क्स ने पूंजी विचाधारा और साम्यवादी विचारधारा का वर्णन किया था। 

उन्होंने इस किताब में साफ तौर से लिखा था कि पूंजवादी वर्ग हमेशा ही मजदूर वर्ग का शासन करता है और जो भी काम करता है वह अपने हितों के लिए करता है। इस किताब में उन्होंने ये भी लिखा था कि मजदूर वर्ग किस तरह से पूंजीवादी वर्ग का सामना या फिर मजदूर वर्ग का विकास कर सकता है। उनकी दास केपिटल ही किताब थी जिसकी वजह से रूस में क्रांति का उदय हुआ था और एक साम्यवादी विचारधारा ने जन्म लिया था।


कार्ल मार्क्स के अनमोल वचन | Some interesting Quotations of  Karl Marx in Hindi)

  • जमींदार, अन्य सभी पुरुषों की भांति, वहां काटना पसंद करते हैं जहां उन्होंने कभी नहीं बोया।

  • बहुत सी उपयोगी चीजों के उत्पादन से बहुत से लोग बेकार हो जाते हैं।

  • अनुभव उस व्यक्ति की प्रशंसा करता है जिसने सबसे अधिक लोगों को प्रसन्न किया हो।

  • आवश्यकता तब तक अंधी होती है जब तक कि वह सचेत हो जाए। स्वतंत्रता आवश्यकता की चेतना है।

  • लेखक इतिहास के एक आंदोलन को इसके मुखपत्र के रूप में अच्छी तरह से सेवा दे सकता है, लेकिन वह निश्चित रूप से इसे बना नहीं सकता है।

  • कम्युनिस्टों के सिद्धांत को एक वाक्य में अभिव्यक्त किया जा सकता है: निजी संपत्ति का उन्मूलन।

  • शासक वर्ग के विचार हर युग में शासक विचार होते हैं, यानी जो वर्ग समाज की शासक भौतिक शक्ति है, उसी समय उसकी शासक बौद्धिक शक्ति भी होती है।

  • प्रकृति के नियमों को पार करना बिल्कुल असंभव है। ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग परिस्थितियों में जो बदल सकता है, वह केवल वह रूप है जिसमें ये कानून खुद को उजागर करते हैं।

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

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