पृथ्वी राज चौहान बायोग्राफी | इतिहास
- पृथ्वी राज चौहान जन्म --- 1166 में
- पिता का नाम --- सोमेश्र्वर चौहान
- माता का नाम --- कपूरी देवी
- पहली बार शासक बने --- 11 साल की उम्र में
- कहां शासन किया --- आमेर में
- पृथ्वी राज चौहान के घोड़े का नाम --- नत्यरंभा
- पत्नी का नाम --- संयोगिता
- पृथ्वी राज चौहान की बेटी का नाम --- बेला
- पृथ्वी राज चौहान के बेटे का नाम --- गोविन्द राज
- मृत्यु के समय उम्र --- 43 वर्ष
- मौत का कारण --- मुहमद गौरी से हार के बाद द्वारा की गई हत्या
पृथ्वी राज चौहान का जन्म और परिवारिक जिंदगी | Birth and family life of Prithvi Raj Chauhan
महान योद्धा पृथ्वी राज चौहान के जन्म के जन्म बारे में इतिहास कारों के दो मत हैं पृथ्वी राज महाकाव्य के अनुसार उनका जन्म 1 जून 1163 में प्टन नामक स्थान पर हुआ था जो भारत के राजस्थान में स्थित है। कुछ इतिहासकारो का कहना हैं पृथवी राज का जन्म 1168 में राजस्थान के आमेर में हुआ था। उनके पिता जी का नाम राजा सोमेश्वर और माता जी का नाम रानी कर्पूरादेवी था। पर इस बात का आज पक्का प्रमाण है कि उनका जन्म हिन्दू घराने के राजपूत वंश में हुआ था और गुजरात में हुआ था। पृथ्वीराज द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके पिता जी ने चौहान वंश की राज गाड़ी को संभाला था।
मुग़ल सम्राट
अकबर ने एक तरफ 13 साल में गद्दी सम्भली
थी तो दूसरी तरफ पृथ्वी राज चौहान एक ऐसे महान योद्धा और शासक थे जिन्होंने 11 साल में अपने पिता के मरने के बाद राजगद्दी संभाली थी। पृथ्वी राज के भाई का नाम हरिराज था। सोमेश्वर के उस वक्त चालुक्य वंश से अच्छे संबंध थे इसलिए उनके पिता जी ने उनका पालन पोषण चालुक्य वंश की देख रेख में किया था। सोमेश्वर की मृत्यु 1177 या 1234 विक्रमी सवन्त में हुई थी।
इतिहासकारों की माने तो पृथ्वीराज के जन्म के बाद उनके पिता राजा सोमेश्वर ने अपने पुत्र की जन्म पत्तरी देखने के लिए विद्वानों को बुलाया था ताकि वे उनके भविष्य में बारे में जान सकें। विद्वानों ने उनका नामकरण किया था और उनका नाम "पृथ्वी राज" रखा था। पृथ्वी राज का शाब्दिक अर्थ होता है धरती पर राज करने वाला।
जब पृथ्वी राज चौहान का जन्म हुआ था उस वक्त चौहान वंश में मुख्य तौर पर 6 भाषाओँ में शिक्षा का प्रचलन था ये भाषायें थी। संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश भाषा। चौहान इन सभी भषाओं का ज्ञान रखते थे। जब वे पांच वर्ष के हुए उनकी शिक्षा के लिए उन्हें अजयमेरु नामक जो अब अजमेर के नाम से जाना जाता है में “सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ” में पूरी हुई थी।
अजयमेरु एक ऐसा किला था जिस पर अकबर और मेवाड़ के राजा मारवाड़ द्वारा शाशन किया गया था। जहां पर पृथ्वी राज चैहान ने शिक्षा ग्रहण की थी वहाँ पर अभी 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' नमक मस्जिद स्थित है। इसके इलावा उनके मित्र चंदबरदाई ने जो पृथ्वी राज रासो किताब लिखी है उसके अनुसार पृथ्वी राज चौहान शब्द भेदी बाण चलाने में सक्षम थे। शब्द भेदी बाण चलाने की कला वह होती है जब बिना देखे मात्र आवाज से बाण चलाया जाता है। इतिहास में राजा दसरथ के बाद उनके पास ये कला उनके पास थी।
पृथ्वी राज रासो के अनुसार पृथ्वी राज का पहला विवाह तब हुआ जब वे ग्यारह साल के थे उसके बाद उन्होंने 22 साल की उम्र तक 12 शादियां की थी। जब पृथ्वी राज चौहान 26 वर्ष के हुए तो उन्होंने संयोगिता गाहडवाल नामक लड़की से शादी की थी। संयोगिता गाहडवाल कन्नौज के राजा जयचन्द की बेटी थी। चौहान सभी पत्नियों में से संयोगिता से अधिक प्यार करते थे।
पृथ्वी राज चौहान की पत्नियों के नाम | Prithvi Raj Chauhan wives names
जम्भावती पडिहारी | पंवारी इच्छनी | दाहिया | जालन्धरी | गूजरी | बडगूजरी | यादवी पद्मावती
| यादवी शशिव्रता | कछवाही | पुडीरनी | शशिव्रता | इन्द्रावती | संयोगिता गाहडवाल
पृथ्वी राज और संयोगिता की शादी की कहानी | Prithvi Raj and Sanyogita marriage story
संयोगिता कन्नौज के महाराज जयचंद की पत्नी थी और "पृथ्वी राज रासो" महावाव्य ने उनकी सुंदरता के बारे में बताया है कि वह अपने पूर्व जन्म के में अफसरा नामक परी थी। उस समय गुजरात में पृथ्वी राज चौहान का सिक्का चलता था और एक महान महान योद्धा के रूप में जाने जाते थे। संयोगिता और पृथ्वी राज चौहान एक दूसरे से हृदय प्रेम करते थे। पर दूसरी तरफ जय चंद और चौहान के बीच सबंध अच्छे नहीं थे।
संयोगिता के पिता जी ने अपनी बेटी के विवाह के लिए अश्वमेधयज्ञ यज्ञ का आयोजन किया और अपनी बेटी के विवाह के लिए स्वम्बर की घोषणा कर दी। इस यज्ञ में भारत के सभी राजाओं को बुलाया गया था पर पृथ्वी राज चौहान को इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया गया। इस बात को संयोगिता भली भांति जानती थी। जय चंद ने पृथ्वी राज चौहान को बुलाने की वजाये उनका का बुत यज्ञ में बनवाया। जब जय चंद ने संयोगिता को अपने पसंद के राजा को वर माला पहनने के लिए कहा तो संयोगिता ने पृथ्वी राज के स्टेचू को वर माला पहनाई। इसी दौरान पृथ्वी राज वहाँ पर पहुँच गए और उन्होंने संयोगिता कोअपने साथ उठाया और दिल्ली की और रवाना हो गए।
पृथ्वी राज चौहान की सेना | Prithvi Raj Chauhan's army
इस बात से इतिहास कारों ने बिलकुल साफ किया है कि चौहान के हिन्दू पड़ोसी राज्यों के संबंध कुछ बिगड़ गए थे और उन्हें अकेला छोड़ दिया गया था। इसके बावजूद उनके पास एक विशाल सेना थी। मुहमंद गोरी को हराने के लिए उसने एक विशाल सेना बनाई थी। 16 वीं शताब्दी सदी के मुस्लिम इतिहासकार फ़रिश्ता के अनुसार पृथ्वी राज चौहान के पास एक विशाल पैदल सेना के अतिरिक्त तीन लाख घोड़े और 3000 हठी थे जो युद्ध में भाग लेते थे।
चंदबरदाई और पृथ्वी राज चौहान बचपन के मित्र थे। मित्र होने के साथ चंदबरदाई उनके दरवार में एक राजकवि के रूप में भी काम करते थे। उन्हें एक महाकवि और लेखक के रूप में भी देखा जाता है। पृथ्वी राज चौहान की जीवन गाथा और मुहमंद गोरी के युद्ध की गाथा चंदवरदाई ने महाकाव्य "पृथवी राज रासो" में लिखी है। बड़ी बात ये कि जब गोरी ने पृथ्वी राज चौहान को हराया तो उसके बाद चंदबरदाई और चौहान की मृत्यु एक साथ हुई थी उन्होंने गोरी की सेना से बचने के लिए एक दूसरे को छुरे से मार दिया था।
पृथ्वी राज चौहान और मुहमंद गोरी के बीच लड़ी गई लड़ाइयां | Battles fought between Prithvi Raj Chauhan and Muhammad Ghori
पृथ्वी राज रासो की बात करें तो इस महाकाव्य के अनुसार पृथ्वी ने गोरी को तीन बार हराया था। और अगर हमीर महकाव्य की बात करें तो चौहान ने गोरी को साथ बार हराकर बंदी बनाया था। प्रबन्धकोष के अनुसार चौहान ने गौरी को 20 बार हराकर कैद भी किया था और फिर उसे छोड़ दिया था। सुर्जनचरित
महाकाव्य के अनुसार चौहान ने गोरी को 21 बार युद्ध में हराया था और बाद में दया करके छोड़ दिया था। प्रबंध चिंता मणि के अनुसार चौहान ने गोरी को 23 बार हराकर छोड़ दिया था। लेकिन इतिहासकारों की बात करें तो मुहमंद गोरी ने 17 बार चौहान के साथ लड़ाई लड़ी और 17 बार उसे हार का सामना करना पड़ा पर बाद में 18 वीं बार चौहान को हार का सामना करना पड़ा।
पृथ्वी राज चौहान और मुहमंद गोरी का तराइन का प्रथम युद्ध | Prithvi Raj Chauhan and Muhammad Ghori's first battle of Tarain
1186 में लाहौर में गजनवी वंश का लगभग खात्मा हो चूका था और लाहौर पर मुहमंद गोरी ने कब्ज़ा कर लिया था। उस वक्त लाहौर पंजाब के अंदर आता था। मुहमंद गोरी का ये सपना था कि देश में मुस्लिम शासन की स्थापना करे। दूसरी और पृथ्वी राज चौहान का ये सपना था कि वह एक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहते थे।
गोरी ने अपना साम्राज्य का विस्तार किया और पंजाब में आगे बढ़ता गया। उसने पंजाब के बठिंडा तक अपने सामाज्य का विस्तार कर लिया था। मुहमद गोरी इस बात को भली भांति जनता था कि चौहान की नजरें पंजाब पर हैं। दूसरी तरफ चौहान ने भी पंजाब की तरफ अपनी नजर बनाई हुई थी। चौहान को जब इस बात का पता चला कि गोरी अपनी सेनायें आगे बढ़ा रहा है तो पृथ्वी राज चौहान ने पंजाब के हांसी, सरस्वती और सरहिंद के किलों पर हमला कर दिया। हमले के बाद चौहान को किन्ही कारणों से वापिस जाना पड़ा। चौहान की अनुउपस्थित में मुहमंद गोरी ने फिर से इन तीनो किलों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया।
अब लड़ाई आर पार की थी गोरी और चौहान के बीच तराइन की लड़ाई हुई। तराइन आज तरावड़ी के नाम से जाना जाता है जो भारत के हरियाणा में स्थित है यह शहर करनाल और कुरुक्षेत्र के बीच में स्थित है। तराइन की लड़ाई में मुहमद गोरी बुरी तरह से घायल हो गया। गोरी के सैनिकों ने उन्हें युद्ध क्षेत्र से बचाया। चौहान की सेना ने गोरी की सेना का 120 किलोमीटर तक पीछा किया पर गोरी भागने में सफल हो गया।
हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि जय चंद जो कन्नौज का राजा था इस बात से पृथ्वी राज से नाखुश था कियोंकि उसने उनकी बेटी संजोगिता उठाते पृथ्वी को अपने सामने देखा था। इस बात में कोई शक नहीं कि जैचंद और पृथ्वी राज दोनों राजपूत शासक थे। पर जय चंद इस जिद्द को लेकर पृथ्वी राज चौहान का खत्म करना चाहता था। दूसरी तरफ मुहमंद गोरी तराइन की पहली लड़ाई का बदला लेना चाहता था और मुस्लिम शासन की स्थापना करना चाहता था। राजा जय चंद ने मुहमंद गोरी की सहायता का एलान कर दिया।
ये
बात
सुनकर
चंदवरदाई जो
चौहान
के
मित्र
थे
ने
राजपूत
शासकों
से
ये
अनुरोध
किया
कि
वे
चौहान
का
साथ
दें
पर
जय
चंद
के
साथ
राजपूत
सेना
मिल
चुकी
थी।
मुहमद
गोरी
और
पृथवी
राज
चौहान
में
हरियाणा के
तराइन
नामक
स्थान
पर
भीषण
युद्ध
हुआ।
इसमें
गोरी
की
सेना
चौहान
की
सेना
से
कम
थी।
एक
भीषण
युद्ध
हुआ
जिसमें
हिन्दू
राजपूत
जय
चंद
के
इशारों
पर
हिन्दू
राजपूत
को
काट
रहा
था।
गोरी
ने
चौहान
से
ये
युद्ध
जीत
लिया।
ये युद्ध शक्ति से नहीं एक योजना के तहत जीता गया था। इसके बाद जय चंद का भी बुरा हाल किया गया उसे भी मार दिया गया और कन्नौज पर अधिपत्य जमा लिया गया।
पृथ्वी राज चौहान की हार के कारण | Reasons for the defeat of Prithvi Raj Chauhan at the Second Battle of Tarain
जो पृथ्वी राज चौहान गोरी को 17 बार हरा चूका था उसकी तराइन की दूसरी लड़ाई में हार कैसे हो गई। इसके पीछे इतिहास कार कई तथ्यों को मानते हैं पहला तथ्य ये कि गोरी को बार -बार हराने के बाद चौहान ने गोरी को अपनी शक्ति मजबूत करने का मौका दिया था। दूसरा कारण ये था कि उन्हें अपने सबंध जय चंद के साथ ठीक क्र लेने चाहिए थे। जय चंद के बदले के कारण चौहान को राजपूतों का समर्थन नहीं मिला था। हिन्दू इतिहास कहता है या ग्रन्थ कहते हैं कि शत्रु को क्षमा बार नहीं करना चाहिए।
अगर हम रामायण की बात करें तो भगवान् श्री राम ने समुन्द्र से रास्ता माँगा था तब वे कुदरत के नियमों के खिलाफ न जाते हुए तीन दिन तक समुन्द्र से रास्ता मांगते रहे। तीसरे दिन जब श्री राम जी ने गुस्से में आकर समुन्द्र को सुखाने का निश्चय किया तो समुन्द्र ने उन्हें समुन्द्र पर करने का रास्ता बताया था। इसलिए उन्होंने अपने प्राचीन ग्रंथों से शिक्षा लेकर गोरी को माफ़ नहीं करना चाहिए था।
अगर इतिहासकारों में आधुनिक मुस्लिम इतिहासकारों की बात माने चौहान को गोरी ने हराया था और हरा कर उन्हें बंदी बनाया था बंदी बनाकर उन्हें 1192 में बुरी तरह प्रताड़ना के बाद हत्या कर दी थी। वहीं पृथ्वी राज रासो की बात करें तो गोरी पृथ्वी को बंदी बनाकर गजनी लेकर गया था। ये तथ्य कुछ दिलचस्प हैं जो एक दिन चार मौतों का विवरण देता है आइये जानते है पृथ्वी राज रासो के अनुसार पृथ्वी राज चौहान की मृत्यु कैसे हुई थी।
"पृथ्वी राज रासो" में ये कहा गया है कि गोरी चौहान को हराने के बाद गजनी ले गया था। गजनी लेकर गोरी ने चौहान को अँधा कर दिया था। उस को अँधा इसलिए किया गया था कि गोरी ने उनके मित्र चंदवरदाई से अंतिम इच्छा पूछी थी।
चंदवरदाई ने जब चौहान से पूछा कि उनकी अंतिम इच्छा क्या है तो चौहान ने आखिर बार शब्द भेदी बाण के प्रयोग की इच्छा जताई थी। अब गोरी को इस बात का शक था कि कहीं आखों पर पट्टी बांधने के बावजूद भी उन्हें नजर न आ जाये। इसलिए गोरी ने पृथ्वी की आँखों में लोहे की सलाखें डलवा दी और साथ में उनकी आखों पर पट्टी भी बांध दी।
पृथ्वी राज चौहान के मित्र ने शब्द भेदी बाण चलाते समय चंदवरदाई से बात की और चंदवरदाई ने उन्हें एक दोहा सुनाया जिसे "ठुमरी" भी कहा जाता है ये थी
पृथ्वी राज चौहान के मित्र चंदवरदाई ने ये शब्द कहे थे पृथ्वी राज चौहान के कानों में।
"चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता उपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।"
इस दोहे से चौहान ने गोरी की स्थिति का पूरा अंदाजा लिया और तीर सीधे गोरी के माथे पर मारा। गोरी की उसी वक्त मृत्यु हो गई। चौहान और चंदवरदाई ने भी एक दूसरे को खतम कर लिया। चौहान की मौत सुनकर उनकी पत्नी संयोगिता ने भी अपनी हत्या कर ली।
अब चौहान की मृत्यु का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि अगर उनकी मृत्यु अजमेर में हुई होती तो उनकी समाधि वहां पर होती पर चौहान की समाधि आज भी अफगानिस्तान के गजनी में मौजूद है। हाँ गोरी और चौहान की समाधि में ये फर्क है चौहान की समाधि कच्ची है और गोरी की समाधि पक्की है भारत सरकार पृथ्वी राज चौहान की इस समाधि के सुधार के लिए प्रयत्न कर रही है।