मैडम क्यूरी : जन्म, परिवार, शिक्षा, आविष्कार, मृत्यु | Madame Curie Biography in Hindi

मैडम क्यूरी बायोग्राफी इन हिंदी  : - अगर आप वैज्ञानिकों को पसंद करते हैं और वैज्ञानिकों द्वारा किये गए अविष्कारों में रूचि रखते हैं तो आवश्य ही आपने मैडम क्यूरी या मेरी क्यूरी का नाम सुना होगा। ये ऐसी वैज्ञानिक थी जिन्होंने नावेल पुरस्कार इतिहास में पहली बार दो बार नावेल पुरस्कार प्राप्त किया था। बचपन से दुखों से गुजरती हुई मैडम क्यूरी का जन्म पोलैंड में हुआ था। आईये आज जानते हैं मैडम क्यूरी की शिक्षा,परिवार, नावेल पुरस्कार और इतिहास के बारे में।

 

मैडम क्यूरी जीवनी : जन्म, परिवार, एजुकेशन, खोज , प्लूटोनियम और रेडियम की खोज, नोबेल पुरुस्कार, समाज में योगदान, मृत्यु 

मैडम क्यूरी का जीवन परिचय :-

1

मैडम क्यूरी का पूरा नाम

मारिया सलोमया स्कोलोडोव्स्की

2

जन्म स्थान

वारषापोलैंड पहले रूस

3

जन्म तारीख

नवंबर सन 1867

4

पिता का नाम

 व्लादिस्लॉ स्कोलोडोव्स्की

5

माता का नाम

 ब्रोनिस्लावा स्कोलोडोव्स्की

6

 पति का नाम

 पियरे क्यूरी

7

बच्चो का नाम

ईव और इरन दोनों बेटियां

8

 खोज

प्लूटोनियमरेडियम

9

मृत्यु तारीख

 जुलाई, 1934

10

 मृत्यु के समय

उम्र 66 वर्ष

 

मैडम मैरी क्यूरी का जन्म और परिवारिक जानकारी | The Birth and Family Information of Madame Marie Curie


मैरी क्यूरी का जन्म 7 नवंबर सन 1867 को वारसॉ में हुआ था जो इस वक्त पोलैंड की राजधानी में हुआ और उस वक्त रुसी सम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। उनके पिता जी का नाम व्लादिस्लॉ स्कोलोडोव्स्की था जो पेशे से एक अध्यापक थे और ब्रोनिस्लावा में गणित और भौतिक विज्ञान पढ़ाते थे। उनकी माता जी का नाम ब्रोनिस्लावा स्कोलोडोव्स्की था और पेशे से वह भी एक अध्यापक थी। मैडम क्यूरी को मिलाकर वे कुल पांच भाई बहन थे और क्यूरी उनमे से सबसे छोटी थी। उनके भाई बहन का नाम ज़ोफ़िया, जोज़ेफ़, रोनिस्लावा, ब्रोनिस्लावा, हेलेना था। 

छोटी होने के कारण मैरी को उनके परिवार वाले उसे मान्या के नाम से भी पुकारा करते थे। उनके पिता जी ने उस वक्त पोलैंड की आजादी के लिए पोलिश राष्ट्रीय की बात उठाई जिसकी वजह से उन्हें नुक्सान हुआ और अपनी सम्पति का बहुत बड़ा हिस्सा खोना पड़ा। छोटी उम्र में अर्थात जब वः मात्र 11 साल की थी तो उनकी माता जी का देहांत हो गया। 

माता की मृत्यु हो गई, पिता जी ने आंदोलन में भाग लेकर अपनी नौकरी खो दी अब तो मैडम क्यूरी की जिंदगी में दुखों की झड़ी आना तो स्वाभाविक था पर उन्होंने होंसला नहीं हारा। 

1894 में जब क्यूरी ने अपनी स्नातक की डिग्री हासिल की थी तो उनकी मुलाकात फ्रांसीसी रसायनविद पिअरे क्यूरी से हुई थी दोनों ने एक दूसरे को समझा और शादी कर ली ,उसके बाद उन दोनों को दो बेटियां हुई एक का नाम इरेने जूलिते क्यूरी और दूसरी का नाम ईव डेनिस क्यूरी था। पर मैडम क्यूरी का भाग्य ने साथ नहीं दिया और उनके पति का भी 1906 में में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।

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मैडम क्यूरी की शिक्षा- दीक्षा | Madam Curie's Education Initiation 

जब मैडम क्यूरी जब 10 साल की हुई तो का दाखला मारिया ने 1877 में जे. सिकोरस्का के बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया। उसके बाद उनकी माता का देहांत 1878 में हो गई अब उनकी शिक्षा और पालन पोषण का दायित्व उनकी बड़ी बहन पर था। 

1891 में मैरी क्यूरी ने अपनी अगली पढ़ाई के लिए आगे पेरिस को सुना और परिस में अपना अध्यापन शुरू किया। उन्होंने यहां आप कड़ी मेहनत की और 12 जून 1883 को स्वर्ण पदक के साथ स्नातक की शिक्षा ग्रहण की। 

अब आपके मन में ये सवाल जरूर आता होगा कि मैडम की शिक्षा में क्या वाधायें आयी। तो हम आपको बता दें उस वक्त पोलैंड रूस का हिस्सा हुआ करता रहा और उनका जन्म भी पोलैंड के वारषा शहर में हुआ था। पहली मुश्किल ये कि बचपन में उनकी माता का देहांत हो गया, दूसरी सामाजिक मुश्किल होने ये फेस करनी पड़ी कि उस वक्त पोलैंड में भी लड़कियों की शिक्षा परचल बहुत कम था। इसलिए उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कभी कभी गुप्त शिक्षा भी ग्रहण करनी पड़ती थी। 

मैडम क्यूरी की जिंदगी में वैज्ञानिक बनने में क्या आई मुश्किलें :-


मैडम क्यूरी ने पहले से सोचा था कि वे एक वैज्ञानिक बनेगी पिता जी एक मैथ और भौतिक के अध्यापक थे और माता जी एक गर्ल स्कूल के प्रिंसिपल थी तो उनकी अगर उनकी प्रारम्भिक शिक्षा की बात करें तो उन्हें अच्छा बैक अप - मिला था। पर वक्त और हालत बदलते समय नहीं लगता कहते है Time is known as a great destroyer . इसा ही खेल खेला वक्त ने उनके साथ। दस साल की उम्र में उनकी माता जी का देहांत हो गया। 

उसके बाद उनकी बड़ी बहिन का भी मौत हो गई। दूसरी तरफ उनके पिता जी को भी नौकरी से निकाल दिया गया था। अब सोचते होंगे उन्हें नौकरी से क्यों निकला गया था। तो उस वक्त पोलैंड रुसी साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। रूस ने पोलैंड पर अपना अधिपत्य जमाने के लिए दामनकारी नीतियों को अपनाया हुआ था। वे रूस की दमनकारी नीतियों का खंडन करते थे इसलिए उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था।

दूसरी बात ये कि उस वक्त पोलैंड में लड़कियों की शिक्षा का इतना प्रचलन नहीं था और उनके पड़ने क व्यवस्था बहुत कम थी। अब मैडम को अपनी शिक्षा का सफर गतय करना मुश्किल लग रहा था। उनको एक आशा की झलक सामने आई और उन्हें इस बात का पता चला की जर्मनी की राजधानी पेरिस में एक संस्था है जो महिलाओं की शिक्षा का प्रबंध करती है। पर उनके लिए उस वक्त बड़ी मुसीबत ये थी कि उनकी आर्थिक हालत कमजोर हो चुकी थी। उन्होंने अपनी बहन से एक अग्रीमेंट किया जिसका नाम ब्रिजिसालवा था। 

उन्होंने अपनी बहन से ये अग्रीमेंट किया कि वह उन्हें पढ़ाएगी और उनकी पढ़ाई का खर्चा करेंगी उसके बाद अगर वह एक अच्छी पोस्ट पर पहुँचती है और पैसे कमाना शुरू करती है तो फिर अपनी शिक्षा ग्रहण करेगी। उन्होंने किया भी ऐसा ही उन्होंने अपनी बहन की पढ़ाई के लिए ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया और अपनी बहन की शिक्षा पूरी की उसके बाद उन्होंने अपनी अगली पढ़ाई के लिए जर्मनी की तरफ रुख किया।

मेडम क्यूरी ने किसकी खोज की थी ?


मैडम क्यूरी का जर्मनी का पहला सफर :-

अपनी बहन की शिक्षा पूरी करने के बाद दोनों ने अपने अग्रीमेंट को सही रूप से निभाया। उनकी बहन को अपनी पढ़ाई पूरी करते 6 साल लगा दिए और इन 6 सालों में मेरी ने अपनी बहन के खर्चे के लिए मेहनत की थी। पर इन 6 सालों में अपनी पढ़ाई को भी जारी रखा और फिज़िक्स की किताबों का अध्ययन किया। उन्होंने सोच रखा था कि वे एक वैज्ञानिक बनना चाहती है और इस मुकाम को वे हासिल करेंगी। 

जब मैडम क्यूरी 24 साल की थी तो 1891 में उन्होंने जर्मनी के सोल्वोन यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया और अपनी पढ़ाई का सफर शुरू किया। उन्होंने फ्रांस में खूब मन लगाकर पढ़ाई की और अपने सभी भोग विलास की चीजों को त्याग कर फिज़िक्स की डिग्री हासिल करने में लग गई। तीन साल में उन्होंने मुश्किलों का सामना भी किए पर उन्हें कौन रोक सकता था। मेरी क्यूरी ने तीन सालों में मेहनत करके फिज़िक्स की डिग्री 1894 में हासिल की। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक जर्मन नागरिक और विज्ञानी से हुई जिसका नाम पियरे क्यूरी था। उन दोनों ने शादी करने का फैसला किया और शादी कर ली उसके बाद उन्हें दो बेटियां हुई।


मैडम क्यूरी का जर्मनी का दूसरा सफर और प्लूटोनियम और रेडियम की खोज | Madame Curie's second trip to Germany and the discovery of plutonium and radium

अब मैडम क्यूरी और उनके पति दोनों ही वैज्ञानिक थे जहां एक दिमाग चलता था वहां पर दो दिमाग चलना शुरू हो गए। एक दिन दोनों दम्पति को इस बात का पता चला कि जर्मनी के दो वैज्ञानिक X -rays और रडियम से जो किरणे निकलती हैं उसके बारे में खोज क्र रहे हैं उन्होंने और उनके पति ने भी वह मन बना लिया कि अब वे दोनों X -rays और रडियम के बारे में कुछ नया करेंगे। 

क्यूरी ने और उनके पति ने अब यूरेनियम के ऊपर एक्सपेरिमेंट करना शुरू कर दिया उन्होंने दिन रात मेहनत की। एक दिन की बात है जब मैडम क्यूरी यूरेनियम के पिचब्लेड नामक तत्व के बारे में गहन अध्यययन कर रही थी तो उन्होंने ये महसूस किया कि इस पदार्थ से जो किरणे निकल रही है वे शक्तिशाली किरणे हैं और उन्होंने और उनके पति ने इसके बारे में और गहन अध्ययन करने का फैसला किया। 


कड़ी मेहनत के बाद उन्हें और उनके पति को ऐसा लगा कि उन्होंने एक ऐसी खोज कर डाली है और हुआ भी ऐसा ही ही उन्होंने पिरियौडिक टेबल में के लिए दो नए तत्वों की खोज कर डाली थी और उनका नाम रखा गया था पॉलोनियम और दूसरे का नाम रखा गया था रेडियम। मैडम क्यूरी को अपने देश पोलैंड से बहुत प्यार था इसलिए उन्होंने पहले तत्व का नाम पॉलोनियम अपने देश पोलैंड के नाम पर रखा था। इस तरह ये एक ऐतिहासिक खोज थी। क्यूरी की मेहनत रंग लाई और उन्होंने विज्ञानं की दुनिया में एक नया नाम कमाया।

 

मैडम क्यूरी को 2003 का नोबेल पुरस्कार | Madame Curie wins 2003 Nobel Prize


मैडम क्यूरी और उनके पति ने रेडिओधर्मी किरणों पर अध्यययन किया था और एक नई खोज की थी इसलिए उन्हें इस काम के लिए 2003 में नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। ये पुरस्कार दुनिया का सबसे बड़ा अवार्ड है जो साइंस, और अन्य ख्याति प्राप्त क्षेत्रों में दिया जाता है। उन्होंने मेहनत की थी इसलिए उन्हें पुरस्कार दिया जाना तो कोई बड़ी बात नहीं थी हम आपको बता दें उस वक्त रेडियो धर्मी के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करने के लिए तीन आदमियों को पुरस्कार प्राप्त हुए थे। 


एक मैडम क्यूरी दूसरे उनके पति पियरे क्यूरी और तीसरे थे अंटोइन हेनरी बैकेरल जिन्हे भीतिकी में नोबेल पुरस्कार मिला था। पर हम आपको बता दें मैडम क्यूरी दुनिया की वह पहली स्त्री थी जिन्हे पहली बार नोबेल पुरस्कार मिला।


मैडम क्यूरी बनी 2006 में दो बार नोबेल पुरस्कार पाने पहली व्यक्ति | Madame Curie becomes first man to win Nobel Prize twice in 2006

मैडम क्यूरी ने अपनी मेहनत को जारी रखा और रेडियम पर अपने शोध को जारी रखा उनके साथ उमके पति भी काम करते थे। 2006 में उन्हें दुबारा नोबेल पुरस्कार मिला। पर एक बात ये है कि उन्हें इस वक्त भौतिकी में नहीं बल्कि Chemistry में नोबेल पुरस्कार मिला था। मैडम क्यूरी या मैरी क्यूरी अब दुनिया में एक ऐसे व्यक्ति बन चुकी थी जिन्होंने दो बार नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया था।


एक दिलचस्प बात ये भी है कि उनके साथ उनके पति को भी ये पुरस्कार प्राप्त होना था पर वे एक दुर्घटना के शिकार हो गए और 2006 में एक गोदा गाड़ी से गिरने बाद उनकी मौत हो गई थी। 

दूसरी बात आपके मन में ये भी होगा कि क्या मैडम क्यूरी आज तक ऐसी व्यक्ति है जिन्हे दो बार नोबेल पुरस्कार मिला तो ऐसा नहीं है। मैडम क्यूरी के बाद भी तीन महापुरुषों को दो बार नोबेल पुरस्कार दिया गया। 

जाँन बारडीन को दो बार 1956 और 1972 में भौतिकी के लिए, फ़्रेंडरिक सेंगर को 1958 में और 1980 में दो बार Chemistry के लिए और लीनस पालिंग को 1954 और 1962 में रसायन विज्ञानं और शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया है। 

मैडम क्यूरी के आविष्कार का समाज के लिए योगदान | Madame Curie's invention contributes to society


हर कोई ये ही सोचता होना की कि मैरी क्यूरी के की खोज तो की पर आज उसका हमारे समाज के लिए क्या योगदान है तो हम बता दें कि उनकी खोज के बाद जल्द ही वैज्ञानिकों ने ये खोज क्र ली थी कि रेडियो धर्मी किरणों का प्रयोग कैंसर के इलाज के लिए किया जा सकता है। पहले विश्व युद्ध में घायल सैनिकों के इलाज के लिए रेडिओ धर्मी केंद्रों की जरूरत मह्सूस की गई थी और रेडियोलॉजिकल केंद्रों की स्थापना की गई थी। 

अपने अविष्कारों के कारण वह रेड क्रॉस रेडियोलॉजी सर्विस की निदेशक बनीं और फ्रांस में पहला सैन्य रेडियोलॉजी केंद्र स्थापित किया। जब 1914 में पहला विश्व युद्ध हुआ तो उन्होंने 200 रेडियोलॉजिकल इकाइयों को फ्रांस में स्थापित किया जिससे सैनिकों का इलाज हो सकता था इसमें उनकी बेटी ने उनका साथ दिया जिनका नाम इरेन था।

रेडियो धर्मी का प्रयोग कैंसर के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है इससे गामा नामक किरणे निकलती है। इसके इलावा इसका प्रयोग पेंट को चमकाने और जहाज के स्विच में भी प्रयोग किया जाता है। पर का बात ये है कि इससे कैंसर का खतरा बना रहता है इसलिए इसका प्रयोग अब कम होता जा रहा है।


मैडम क्यूरी का पूरा परिवार बना नोबेल पुरस्कार विजेता | Madame Curie's entire family becomes Nobel Laureate

ये भी अपने आप में बहुत बड़ी ख्याति है जब किसी का पूरा परिवार ही एक महान पुरस्कार नोबेल पुरस्कार का विजेता हो। मैडम ये इतिहास में पहली बार है कि मैडम क्यूरी का पूरा ही परिवार नावेल पुरस्कार प्राप्त कर चूका है। मैडम क्यूरी की बड़ी बेटी जिसका नाम इरन था उन्हें 1935 में आर्टिफीसियल रेडॉक्टविटिस रेज़ में अच्छा काम करने के लिए 1935 में नावेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उनकी छोटी बेटी जिनका नाम इव था उनको यूनिसेफ में रहते हुए महिलाओं और अनाथ लोगों की सहायता के लिए 1965 में शांति के लिए नावेल पुरस्कार मिला था।

मैडम क्यूरी की मृत्यु कैसे और कब हुई ? | How and when did Madame Curie die?

इस बात का अंदाजा आप लगा सकते हैं कि जिस रेडियम के संक्रमण से कैंसर का खतरा बना रहता है उसी खोज को पूरा करने के लिए मैडम क्यूरी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया था और हमेशा रेडियम के कांटेक्ट में रहती थी। काम समय वह किस भी बात की परवाह नहीं मारती थी पर 66 वर्ष की आयु में उनका स्वास्थ्य खराब हो गया और उन्होंने अपने स्वास्थ्य की परवाह किये बिना काम किया। जब कि उन्हें फ्रांस के अस्पताल में भर्ती करवया गया। 4 जुलाई, 1934 में उनका निधन हो गया जब वह 66 वर्ष की थी।

 निष्कर्ष :-- इस पोस्ट " Biography of Madame Curie " से आप खुद ही निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं। हम तो ये ही कहेंगे कि इंसान अगर होंसले बुलंद रखे और उसकी जीवन में कुछ पाने और बनने की इच्छा हो तो उन्हें बिना रुके निरंतर प्रयास करना चाहिए और अपने जीवन को समय के अनुसार ढाल लेना चाहिए। 

अगर आप ऐसा करते हैं तो सफलता अवश्य ही आपके जीवन में दस्तक देगी। इस पोस्ट Biography of Madame Curie में अगर कोई गलती हो तो कमेंट करके जरूर बताएं ताकि इसमें बदलाव किया जा सके। धन्यवाद सहित।


Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

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