आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत का जीवन परिचय | RSS chief Mohan Bhagwat biography in Hindi
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक राष्ट्रवादी वादी हिन्दू संस्था है जिसका प्रचार और प्रचलन भारत में नहीं पुरे भारत में है। मोहन भागवत आर आर एस एस के सरसंघचालक हैं या फिर RSS के प्रमुख हैं। उन्हें भारत के एक व्यावहारिक नेता के रुप में भी देखा जाता है। इस वक्त भी मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए अपनी सेवा निभा रहे हैं।
वे अपने फैसलों और हिंदूवादी संगठन आर आर एस एस के लिए फैसलों के लिए जाने जाते हैं। आइये जानते हैं मोहन भागवत के जीवन परिचय, परिवार,शिक्षा और उनके आर आर एस के लिए संबधों के बारे में।
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परिचय बिंदु |
जीवन परिचय |
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1 |
मोहन भागवत कौन हैं |
आरएसएस के सर संघ संचालक |
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पूरा नाम |
मोहन मधुकर भागवत |
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जन्म तारीख |
11 सितम्बर 1950 |
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जन्म स्थान |
महाराष्ट्र, चंद्रपुर जिला |
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आयु (उम्र 2021) |
70 साल |
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पिता का नाम |
मधुकरराव भागवत |
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माता का नाम |
मालती भागवत |
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कुल भाई बहन |
चार (एक बहन, तीन भाई) |
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9 |
विवाहित या अविवाहित |
अविहाहित |
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शिक्षा |
बी एस सी |
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व्यवसाय |
आर एस एस प्रमुख |
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पहली बार प्रचारक बने |
1977 में |
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सरसंघचालक कब बने |
21 मार्च 2009 में |
मोहन भागवत का जन्म और परिवार | Birth and Family of Mohan Bhagwat
मोहन भागवत का जन्म भारत के महाराष्ट्र राज्य के चंद्र पुर जिले में चंद्रपुर नामक स्थान में 11 सितम्बर 1950 को को हुआ था। उनके पिता जी का नाम मधुकरराव भागवत था जिन्होंने पहले चंद्रपुर जिले या जोन के लिए पहले एक कार्यवाह के रूप में काम किया था और बाद में वे भरत में गुजरात प्रान्त के लिए प्रचारक के रूप में कार्यरत हुए।
उनका आर एस एस से परिचय लाल कृष्ण अडवाणी ने करवाया था। इसके बाद उन्होंने अपनी सेवायें संघ के लिए दी और आर एस एस के प्रान्त प्रचारक बने। ये ही नहीं कि उनके पिता जी आर एस एस के प्रचारक थे पर उनकी माता जी भी इस संस्था की आज एक्टिव मेम्बर थी उनकी माता जी का नाम मालती था जो चंद्रपुर जोन की आर एस एस विंग की महिला प्रमुख थी। मोहन भागवत के उनको छोड़ कर एक बहन और दो भाई और थे।
मोहन भागवत की शिक्षा | Education of Mohan Bhagwat
मोहन भागवत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एप पैतृक गांव लोकमान्य तिलक विद्यालय से शुरू की। बचपन से वे बहुत ही होशियार और कुशाग्र बुद्धि वाले बालक थे। बाहरवीं की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने चंद्रपुर कॉलेज में बीएससी के लिए दाखिला लिया। इस कॉलेज से उन्होंने पशु चिकित्सा और पशुपालन में प्रथम वर्ष पास किया और उसके बाद पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला में दाखिला लिया।
यह विद्यालय अकोला में स्थित है जहां से उन्होंने पशु चिकित्सा और पशुपालन में स्नातक की डिग्री हासिल की। 1975 में उन्होंने पशु चिकित्सा में स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्रहण करने के लिए दाखिला लिया पर उन्हें अपना यह सफर अधूरा छोड़ना पड़ा। इसके पीछे क्या कारण थे आइये जानते हैं उनका आर एस एस में प्रवेश और अपनी पढ़ाई का अधूरा छोड़ने के बारे में।
मोहन भागवत और आर एस एस | Mohan Bhagwat
जब पुरे देश में आपातकाल से देश जूझ रहा तब भारत में कई उलट फेर हुए, इस आपातकालीन समय में कई नेताओं को जेल भी जाना पड़ा। जब 1975 में भारत में इंदिरा गाँधी द्वारा आपातकाल घोषित किया गया था तब मोहन भागवत पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला में अपनी पशु चिकित्सा में स्नातक की डिग्री कर रहे थे। देश की विगड़ती स्थति को देखकर उन्होंने अपनी पढाई वहीँ पर छोड़ दी और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की और रुख किया।
वे 1975 में एक पूर्ण कालिक स्वयंसेवक बने। इस विचार धारा ने उनकी जिंदगी में परिवर्तन लाये। 1975 से लेकर 1977 तक वे लगातार RSS के एक निष्पक्ष स्वयंसेवक रहे। 1977 में मोहन भागवत महाराष्ट्र की अकोला इकाई के प्रचारक बने।
अकोला जोन से एक प्रचारक के रूप में उन्होंने संगठन के लिए निश्वार्थ काम किए। रोज शाखा लगाना और आर एस एस के लिए शाखा का प्रबंध उनका कार्य बन गया। अकोला में उनके संगठन के लिए किये गए कामों के करण विधर्व क्षेत्र का प्रचारक चुना गया जो नागपुर जिले में आता है। 1991 में उन्हें संघ के शारीरिक शिक्षा का दायित्व दिया गया और उन्होंने संगठन के लिए सवंसेवकों को अच्छी शिक्षा ग्रहण करवाई।
1991 से 1999 तक वे RSS के शरीरिक शिक्षा के प्रमुख रहे। उसके बाद उन्हें संगठन ने आगे का कार्यभार दिया और 1999 में ही में उन्होंने भारत के सभी आर आर एस एस प्रचारकों का प्रमुख बनाया गया। उन्होंने संगठन में रहते हुए सभी प्रचारकों के साथ विभिन स्तर पर मीटिंग की और संघ को संयुक्त रूप ने संगठित किया।
इनके बारे में भी पढ़िए
मोहन भागवत एक आर एस एस प्रमुख कब बने | When did Mohan Bhagwat become an RSS chief
मोहन भागवत ने 1975 में ही में अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया था। मोहन भागवत को संघ का प्रमुख चुनने का फैसला आर एस एस , संघ द्वारा 2009 में लिया गया। मोहन भागवत ने 2009 तक संघ के सरकार्यवाह के रूप में दायित्व निभाया। 21 मार्च 2009 में नागपुर के रेशीम बाग़ जो आर एस एस का दफतर हैं वहां पर संघ अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की एक मीटिंग हुई।
इस मीटिंग मुख्य उदेश्य संघ के लिए नए सरसंघचालक का चयन किया जाना था। हम आपको बता दें आर एस एस में सरसंघचालक का चुनाव कोई पैतृक नहीं मानी जाति है और इसका सबंध राजनीति से भी नहीं है अर्थात सरसंघचालक का चुनाव किसी चुनाव प्रक्रिया से नहीं होती है। अगर अगर आर एस एस के सरसंघचालक के चुनाव का इतिहास देखें तो सभी ने इस पद से दाइत्व तब छोड़ा है जब उनके स्व्स्थय में गिरावट आई।
आर एस एस के पहले सरसंघचालक डॉक्टर हेडगेवार थे उनके बाद माधव सदाशिव गोलवलकर का चुनाव हुआ। 2000 तक रज्जू भैय्या भैया को सरसंघचालक चुना गया। 2000 के बाद एस. सुदर्शन को आर एस एस का सरसंघचालक चुना गया था। 2009 में एस. सुदर्शन के स्वास्थय में गिरावट आई और मोहन भागवत को आर एस एस का प्रमुख चुना गया। 2009 में जब मोहन भागवत आर एस एस के प्रमुख बने तब उनकी उम्र 59 वर्ष की थी।
मोहन भागवत का आर एस एस से नाता |Mohan Bhagwat's relationship with RSS
अगर मोहन भागवत और आर एस एस के आपसी सबंधीं की बात करें तो ये नहीं कि वे इस संगठन में एक नए चेहरे के रूप में आये थे पर उनके पूर्वजों में उनके दादा जी जिनका नाम नारायण भागवत पहले से ही आर एस एस से जुड़े थे। उनके दादा जी आर एस एस के संथापक हेडगेवार के सहपाठी थे और संघ की शाखा इकठे लगाया करते थे।
उसके बाद मोहन भागवत के पिता जी अर्थात नाना साहेब भागवत के बेटे मधुकर भागवत हुए उन्होंने ने भी बचपन से आर एस एस को ज्वाइन किया हुआ था और बचपन से इस विचारधारा के साथ जुड़े हुए थे। उनके पिता जी को 1940 में गुजरात प्रान्त का प्रचारक चुना गया था। इसके इलावा उनकी माता जी भी आर एस इस में महिला स्वंयसेवक थी और आर एस एस की विचारधारा से प्रभावित थी।
मोहन भागवत के सुविचार | Some Quotations of Mohan Bhagwat in Hindi
- उन्होंने स्वयंसेवक को एक कठिन परिस्थितयों में निपटने वाला वयक्तित्व माना है और उन्हें राष्ट्र निर्माण के लिए एक स्त्रोत के रूप में देखा है।
- उन्होंने संगठन को समाज के निमार्ण के लिए एक जरूरी तत्व के रूप में देखा है उनकी नजरों में संगठित समाज ही देश के लिए भाग्य निर्माण कर सकता है।
- उनकी नजरों में अगर आप चारों तरफ से गर विरोधियों से भी घिर चुके हैं हार मत मानो इन परिस्थितियों में भी जो हिम्मत रखता है वह ही आखिर में विजय प्राप्त करता है।
- उनकी सोच में सभी मानव जाति के लोग अपने हैं, इंसान चाहे किसी भी जाति का हो, किसी भी मजहब का हो वह अपना ही है।
- उन्होंने समाज में एक विशिष्ट गुण वाले स्वयंसेवक की होने के विचार व्यक्त किये हैं। उनकी नजरों में अगर स्वयंसेवक विशिष्ट होगा तो इससे शिक्षित समाज का निर्माण होगा।
- उनके विचारों में न कोई हिन्दू है और न कोई मुश्लिम है भारत पहले से सनातन संस्कृति से जुड़ा हुआ है चाहे धर्म कोई भी हो।
- उनकी नजरों में भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और हिन्दू संस्कृति से पहले सनातन काल से जुड़ा हुआ है।
- संघ (आर एस एस) के किये उनके विचार ये हैं कि ये एक संगठन है और किसी के बांधने से बांधा नहीं जाता है। इसकी सीमायें अनिश्चित हैं अर्थात ये कोई वस्तु नहीं जिसे आप एक वस्तु में बंद करके रखोगे।
- जो देश के निर्माण के लिए संघर्ष नहीं कर सकता है वह जीवन भर किसी भी विचार धारा से नहीं जुड़ सकता है।
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