I will not deny that the best apology against false accusers is silence and suffering, and honest deeds set against dishonest words.
"मैं इनकार नहीं करूंगा लेकिन झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ सबसे अच्छी माफी मौन और पीड़ा है, और ईमानदार कर्म बेईमान शब्दों के खिलाफ हैं।"
दोस्तों ऊपर लिखे शब्द किसके हो सकते हैं। तो हम बता दें ये वे सख्सियत हैं जिनका नाम था जॉन मिल्टन जिन्होंने अपनी साहित्य रचनाओं से सभी को आनंद विभोर और जागृत किया। वे एक ऐसे लेखक और लन्दन के रहने वाले कवी और लेखक थे जिनकी कवितायें आज भी हमारे दिल और मन में बोलती हैं। आज हम जॉन मिल्टन की जीवनी के बारे में नज़र डालेंगे जिन्होंने अपनी कृत्यों से समाज को जागृत किया।
जॉन मिल्टन का जीवन परिचय | Biography of John Milton in Hindi
- मिल्टन का पूरा नाम (Full Name) ---- जॉन मिल्टन
- जन्म स्थान (Birth Place) ---- ब्रेड स्ट्रीट, इंग्लैंड
- जन्म तारीख (DOB) ---- 9 दिसंबर 1608
- पिता जी का नाम (Father Name) ---- जॉन मिल्टन
- माता का नाम (Mother Name) ---- सराहा जेफरी
- भाई का नाम (Brother Name) ---- क्रिस्टोफर मिल्टन
- मिल्टन की पत्नियों के नाम (Wives Names) - तीन शादियां हुई थी, एलिज़ाबेथ मयनंशुल, मेरी पॉवेल, कैथरीन वुडकॉक
- जॉन मिल्टन प्रसिद्ध कृतियां (John Milton Famous Works) ---- ऑन हिज ब्लाइंड नेस 1955 में लिखी गई। सेमसन अगोनिस्टर 1651 में लिखी गई। ऑन हिज डिक्रीज़ड वाइफ 1658 में लिखी गई। सांग ऑन मई मॉर्निंग 1633 में लिखी गई। टू सिरिएक स्किनर 1656 में लिखी गई . ऑन शेक्सपीअर 1630 में लिखी गई।पैराडाइस लॉस्ट 1667 में लिखी गई।
- जॉन मिल्टन की मृत्यु (Death) ---- 8 नवंबर 1674
जॉन मिल्टन का जन्म और परिवारिक जिंदगी | Birth and family life of John Milton
जॉन मिल्टन का जन्म 9 दिसंबर 1608 में लंदन में हुआ था। जिस स्ट्रीट में उनका जन्म हुआ उसका नाम ब्रेड स्ट्रीट था। जॉन मिल्टन के पिता जी का नाम भी जॉन मिल्टन था जिन्हे अगर जॉन मिल्टन सीनियर कहें तो भी चलेगा। उनकी माता जी का नाम सारा जेफरी था। जहां तक उनके पिता जी की बात करें वे एक उनके पिता रोमन कैथोलिक धर्म के कट्टर समर्थक थे और संगीत प्रेमी थे जिन्होंने संगीत की दुनिया में नाम कमाया था।
उन्हें रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टवाद की वजह से एक खामयाजा भुक्तना पड़ा की उन्हें घर से बेदखल कर दिया गया था और उहने अपना वसेरा इंग्लैंड की राजधानी लंदन में लगया था जहां पर उन्होंने एक लेखक के रूप में नाम कमाया। माता जी एक धर्मंनिष्ठ स्त्री थी जो रोज चर्च जाया करती थी और इशू की परम् भक्त थी। मिल्टन के भाई का नाम क्रिस्टोफर मिल्टन था।
जॉन मिल्टन की शिक्षा और बचपन | John Milton's education and childhood
जॉन मिल्टन के का जन्म हुआ तब वे एक बुद्धिजीवी किस्म के बालक थे। उनके पिता वरिष्ठ जॉन का एक सपना था कि उनका बेटा एक पादरी बने। पर जॉन मिल्टन को इन सब से कुछ भी इतना लगाव नहीं था। उनके पिता जी भी एक धार्मिक कट्टरवाद के शिकार हुए थे और उनके पिता ने भी उन्हें घर से बेदखल कर दिया था। उनके पिता जी ने जॉन मिल्टन का दाखला लन्दन के सेंट पॉल स्कूल में ग्यारह साल की उम्र में करवा दिया। उन्होंने दाखिला लेते ही छोटी से उम्र में साहित्यकारों और रचनाकारों की कृतियों को पढ़ना शुरू कर दिया।
इस स्कूल में उन्होंने अंग्रेजी भाषा के इलावा ग्रीक, लेटिन, और अन्य भषाओं का ज्ञान भी प्राप्त किया। अपने बचपन में ही में उन्होंने अपने लेखन का शौर्य दिखाते हुए इब्रानी भाषा जिसे हिब्रू भी कहा जाता है की एक कविता का हिंदी में अनुवाद कर डाला। इससे साफ़ पता चलता है कि वह एक ऐसा व्यक्तित्व था जो बचपन से कुछ कर गुजरें की आशा रखता था।
स्कूली जिंदगी में उनका साथ दोस्त के रूप में चार्ल्स डियोडी ने दिया जो उनके भाई के समान थे और एक अच्छे दोस्त थे। अपनी शिक्षा जारी रखते हुए उन्होंने 17 साल की उम्र में 1625 के आसपास कैम्ब्रिज के क्राइस्ट कॉलेज में अपनी पढ़ाई का सफर शुरू किया। उन्होंने तीन साल इस कॉलेज में कड़ी मेहनत के साथ इस कॉलेज से उन्होंने अपनी स्नातक की डिग्री हासिल की और अपने ग्रुप आर्ट्स में चौथा स्थान प्राप्त किया। शिक्षा के क्षेत्र में वे यहीं नहीं रुके और अपनी पढ़ाई को जारी रखते हुए उन्होंने 1632 में केंब्रिज विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री भी हासिल की।
जॉन मिल्टन का कष्टदाई विवाहित जीवन | John Milton's troubled married life
आदमी शादी क्यों करता है इसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण ये ही होता है कि उसे एक ऐसा जीवन साथी मिले जो उसका बुढ़ापे के वकत उसके साथ हाथ से हाथ मिलाकर चले। ये फिर उनके बच्चे बड़े होकर अंधे की लाठी बने और उनका बुढ़ापा अच्छा गुजरे पैसा तो इंसान कमाता ही रहता है। पर हम बता दें जॉन मिल्टन का विवाहित जीवन इतना खुशहाल नहीं रहा।
उन्होंने 1642 में एक मेरी पॉवेल नामक लड़की से शादी की थी। मेरी पॉवेल एक अच्छे घराने से थी और उनके पिता जी रिचर्ड पॉवेल थे। पर मिल्टन और मेरी पॉवेल का विवाहित जीवन लम्बे समय तक नहीं टिक पाया इसके पीछे कारणों का पता नहीं पर जब मेरी पॉवेल एक बार अपने पिता के घर गई तो उसके बाद वापिस नहीं आई और मिल्टन के विवाहित जीवन पर पहला ब्रेक लग गया। मिल्टन ने भी उसका इंतजार किया पर वह वापिस नहीं आयी।
शादी के दस साल के बाद मेरी पॉवेल की मृत्यु हो गई और मेरी पॉवेल की मृत्यु के बाद उन्होंने तीन साल बाद कैथरीन वुडकॉक नामक लड़की को अपना जीवन साथी चुना और उससे शादी कर ली पर भाग्य और और उनकर विवाहित जीवन ने उनका फिर साथ नहीं दिया और वुडकॉक की भी मृत्यु हो गई। अब उन्होंने ये मन बना लिया की वे शादी नहीं करेंगे पर उनके शरीर ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया और उन्हें अब एक सहारे की जरूरत थी।
जॉन मिल्टन ने फिर तीसरी शादी करने का फैसला किया और 1663 में एलिज़ाबेथ नामक लड़की से फिर शादी की थी और उनके साथ अपना जीवन व्यतीत किया। ऐसा माना जाता है कि पहली पत्नी के स्थ उनकी दो बेटियां थी जिनका नाम डिबोरा मिल्टन और ऐनी मिल्टन था उन्होंने भी जॉन मिल्टन के साथ बुरा व्हवहार किया था।
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जॉन मिल्टन को अपनी शिक्षा के दौरान कई भाषाओँ का ज्ञान था वे अंग्रेजी भाषा के इलावा इटालियन, फ्रेंच, स्पेनिश भाषा और डच भाषा का भी ज्ञान रखते थे। वे जहां भी जाते थे उनका लिखने का काम और प्रतिभा उनके साथ जाती थी उन्होंने इंग्लैंड को जोड़कर और देशों में भी यात्राएं की जिनमे वे सबसे ज्यादा इटली में रहे और इटली में जाकर अपनी लेखन प्रतिभा को चमकाया।
1638 में उन्होंने इटली का दौरा किया और इटली में लगभग 15 महीनों के लिए रहे। इटली में जाकर उनकी मुलाकात कुछ इटली के साहित्यकारों के साथ हुई और उन्होंने उन साहित्यकारों के साथ मिलकर मानवता वाद पर कुछ लेख भी लिखे।
इसके बाद उन्होंने प्लोरेन्स का सफर किया और एक खगोलशास्त्री से भी मिले। इटली में रहते हुए उन्होंने अपनी कृतियों का सिक्का जमा लिया था। उन्हें हर कोई एक मेधावी लेखक के रूप में जानता था। पर इटली में रहते हुए उनकी उन्होंने दो घटनाओं के बारे में सुना एक उनके घनिष्ठ मित्र चार्ल्स डियोडती की मौत हो चुकी थी जिससे वे बड़े आघात हुए और दूसरा इंग्लैंड में गृह युद्ध छिड़ चूका था इसलिए उन्हें इंग्लैंड वापिस लौटना पड़ा।
1639 में वे इटली से इंग्लैंड वापिस आ गए और वहां पर अपना लेखन का काम जारी रखा। उन्हें लेटिन भाषा का ज्ञान था इसलिए उन्हें जब इंग्लैंड में कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए लेटिन सेक्रेटरी के रूप में नियुक्त किया गया।
जॉन मिल्टन की जिंदगी में लेखन प्रक्रिया में वाधायें | Constraints in the Writing Process in the Life of John Milton
जिंदगी का सफर किसी का भी हो उनकी जिंदगी में नाम कमाने के लिए वाधाओं का सामना करना पड़ता है। उनकी जिंदगी में एक कवि के रूप में पहली वधा ये आई कि उनका विवाहित जीवन सफल नहीं रहा और वे जिंदगी भर एक अच्छे लाइफ पार्टनर की तलाश में रहे। दूसरी वाधा ये कि जब वे एक कवि के रूप में प्रसिद्ध हुए तब इंग्लैंड में गृह युद्ध की स्थिति बानी हुई थी इसलिए उन्हें अपनी कृतियों में कभी कभी शोध भी करना पड़ता था।
जॉन मिल्टन के लेखन कैरिएर में तीसरी सबसे बड़ी वाधा ये थी वे लगातार लिखते जाते थे इसलिए लिखते समय या लेखन प्रक्रिया में उनकी आखों की नजर बहुत काम हो गई थी जिसकी वजय से अपने अंतिम कृतियों में वे अपने आप नहीं लिख सकते थे। वे बोलते थे और उनके दोस्त और उनकी बेटियां उसे लिपिवद्ध किया करती थी। उन्होंने हर नहीं मानी और लगातार 20 वर्षों तक लिखते रहे।
जॉन मिल्टन ने वैसे तो 11 साल की उम्र में अपनी लेखन जोहर को दिखाना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपने कॉलेज के समय भी कई रचनायें लिखी। एक कवि वह होता है जो गद्य और पद्य रचनायें दोनों ही करता है पर उन्होंने पद्य रचनायें बहुत ज्यादा नहीं की पर गद्य रचनायें की जिनके बारे में हम नीचे बतायेंगे।
On the Morning of Christ's Nativity
ऑन द मॉर्निंग ऑफ क्राइस्ट्स नेटिविटी
ऑन द मॉर्निंग ऑफ क्राइस्ट्स नेटिविटी जॉन मिल्टन ने 1629 में लिखी थी और इसे जॉन मिल्टन ने 1645 में प्रकाशित किया था। इस Poem में मसीह के अवतार और सांसारिक और मूर्तिपूजक शक्तियों का खंडन किया गया है।
Song on May Morning
सोंग ऑन मई मॉनिंग
ये कविता जॉन मिल्टन ने 1631 में लिखी थी और 1633 में प्रकाशित हुई थी इस कविता में उन्होंने प्रकति के सौंदर्य का वर्णन किया है।
An Epitaph On The Admirable Dramatic Poet
प्रशंसनीय नाटकीय कवि पर एक उपसंहार
ये कविता जॉन मिल्टन के मरने के बाद 14 साल लिखी थी इसे 1632 में लिखा गया गया था इसमें उन्होंने शेक्शपीयर की मृत्यु को अमरता के साथ जोड़ने की कोशिश की हैं।
On His Having Arrived at the Age of Twenty-Three
उनके तेईस वर्ष की आयु में आने पर
ये poem जॉन मिल्टन ने इस लिए लिखी थी ताकि वे अपने जीवन के युवा क्रूसीएल जीवन का वृतांत बता सकें इसमें उन्होंने सोंनेट्स का बेहरीन प्रयोग किया है।
इनके इलावा अगर उनकी कृतियों की बात करें तो वे जिंदगी भर लिखते रहे उन्होंने एल लेग्रो जैसे 1633 में लिखा गया, इलपेंसिरोज़ो जैसे 1633 में लिखा गया, आर्केडिस जिसे 1633 में लिखा गया , लिसिड्स जिसे 1637 में लिखा गया प्रमुख रचनायें है पर हम बचपन से" Paradise Lost" के बारे में पढ़ते रहे हैं आइये जानते हैं क्या है "Paradise Lost"
हम
सभी
जानते
हैं
कि
भारत
में
रहते
हुए
हर
कोई
ये
ही
चाहता
है
है
कि
अंग्रेजी इतिहास
को
पढ़ा
जाये
और
आप
भी
ये
सोचते
होंगे
तो
अपने
मिल्टन
की
पैराडाइस लॉस्ट
के
बारे
में
सुना
तो
होगा
ही।
अगर
नहीं
सुना
है
तो
हम
इस
पोस्ट
"Biography of John Milton" के मध्यम
से
आज
इसके
बारे
में
आपको
बताएंगे पूरा
तो
नहीं
थोड़ा
अंश
जरूर
बताएंगे।
पैराडाइस लॉस्ट
17 वीं
सदी
में
लिखा
गया
गया
एक
ग्रन्थ
ही
कहें
तो
चलेगा।
क्योकि
इसकी
दस
किताबे
और
लगभग
10000 वर्स
हैं।
यह
इंग्लैंड के
मशहूर
पोइट
जॉन
मिल्टन
द्वारा
लिखा
गया
था।
यह
किताब
1663 में
लिखना
शुरू
की
गई
और
1667 में
पब्लिश
की
गई।
अगर
paradise lost को
हिंदी
में
कहें
या
इसका
अर्थ
की
बात
करें
तो
इसका
अर्थ
होता
है
"गुम
हुई
जन्नत"
और
इस
किताब
में
स्वर्गं शैतान
और
इंसान
के
आपसी
संबंधो
का
वर्णन
देखने
को
मिलता
है।
उन्होंने इस
किताब
में
एक
शासक
की
व्याख्या की
है
जिसके
आदेशों
को
हर
इंसान
को
मानना
पड़ता
है।
और
इस
किताब
में
लोकतंत्र के
महत्व
को
बहुत
कम
बताया
गया
है।
इस किताब में सामंतवादी परिस्थितियों को बताया गया है। दूसरी तरफ बात करें तो मिल्टन ने इंग्लैंड के गृह युद्ध जो वक्त वहां पर छिड़ा हुआ था उसे भी कहीं न कहीं व्यान किया है। उन्होंने इस किताब में अंग्रेजी नौकर शाही का इस किताब में खुल के विरोध किया हैं। वैसे तो उन्होंने ये किताब 1658 में लिखना शुरू कर दिया था पर उनके साथ दो प्रमुख घटनायें हुई जिन्होंने इस किताब के लिखने में वाधा
उत्पन की एक उनकी दूसरी वाइफ का देहांत हो गया और दूसरी ये कि लगातार लिखें के बाद उनकी आखों की नजर काम हो गई थी।
उन्होंने इस किताब में ईशवर, इंसान और स्वर्ग का आपस में सबंध बताये हैं। उन्होंने कहा है जब इंसान गलती करता है तो वह हड़वहट में गलती कर लेता है और इस हड़वड़ाहट का ख़मयाज़ा उसे भुक्तना पड़ता है और उसे भगवान द्वारा स्वर्ग से कैसे निकाला जाता है। अर्थात उन्होंने इंसान की हरकतों को गलत ठहराया है और ईशवर के फैसलों का अभिवंदन किया है। इसके इलावा उन्होंने पुरुष और स्त्री के आपसी संबंधो का वर्णन भी इस ग्रन्थ में देखने को मिलता है।
ये ग्रथ बड़ा है इसलिए हम इसे john Milton Biography में व्यान तो नहीं कर सकते है पर अगर हम शार्ट में कहें तो यह ग्रन्थ मनुष्य, ईशवर जायज़- नाजायज, धर्म - अधर्म, प्रेम -प्यार के बारे हमें बताता है।
जब भी इंसान कुछ हासिल करता है तो निशचय ही उसे कुछ न कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और उसे आलोचना का सामना भी करना पड़ता है। जॉन मिल्टन के साथ भी ऐसा ही हुआ पैराडाइज लॉस्ट भी विवाद की सुर्ख़ियों में आ गई। इसके लिए विवाद ये था कि जब इस किताब की रचना की गई तब उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी अगर उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी उन्होंने ये किताब लिखी कैसे।
जॉन मिल्टन का निधन | John Milton passed away
जीते जी मरणा तो सभी को है जॉन मिल्टन ने अपनी कृतियों से हम सभी को आनंद विभोर किया। पर एक दिन उन्हें किडनी की बीमारी ने घेर लिया। और उनकी मृत्यु 8 नवंबर 1674 में में होगी गई। मृत्यु के बाद उन्हें लंदन स्थित सेंट गिल्स-विदआउट-क्रिप्लेगेट चर्च में दफनाया गया था। उनकी कृतियां हैं तो लम्बी पर अगर आप पढ़ना शुरू करोगे तो आप आनंद का अनुभव करोगे।
निष्कर्ष :- हर कोई जिंदगी और लेख का कोई न कोई निष्कर्ष होता है। हम तो इस लेख "John Milton Biography
" से ये ही निष्कर्ष निकलते हैं कि आपको साहित्य में ख्याति प्राप्त करने के लिए कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा पर अच्छा तभी होगा जब आप इस पर निरंतर काम करते रहेंगे। आप "John Milton Biography " से क्या निष्कर्ष निकालते हैं।