सूरदास एक महान कृष्ण भक्त थे। जो बचपन से अंधे थे पर उनके जैसा कृष्ण भक्त न तो कोई पैदा हुआ है और शायद कोई पैदा होगा। उनके दोहों और छंदों में कृष्ण लीला और कृष्ण भक्ति की भक्ति लहर का समायोजन मिलता है। मात्र 6 साल की आयु में उन्होंने अपने पिता जी से आज्ञा ली और सारी उम्र कृष्ण भक्ति में लींन रहे। आज हम कृष्ण भक्त सूरदास के जीवन परिचय, उनकी शिक्षा और उनके प्रमुख दोहों के बारे में चर्चा करेंगे।
कृष्ण भक्त सूरदास : जीवन परिचय | जन्म | शिक्षा | कृष्ण भक्ति की कहानी | सम्राट अकबर और सूरदास | रचनायें | भाषा शैली | प्रमुख दोहे
| कृष्ण भक्त सूरदास |
कृष्ण भक्त सूरदास का जीवन परिचय | Biography of Krishna Bhakta Surdas
- सूरदास जी का पूरा नाम --- सूरदास
- जन्म तारीख --- संवत् 1535 विक्रमी सवंत पर स्पष्ट नहीं है।
जन्म स्थान
- जन्म स्थान --- रुनकत, मथुरा, उत्तर प्रदेश
पिता जी का नाम
- पिता जी का नाम --- रामदास सारस्वत
गुरु जी का नाम
- गुरु जी का नाम --- बल्लभाचार्य
पत्नी का नाम
- पत्नी का नाम --- आजीवन अविवाहित
- सूरदास की पांच ग्रन्थ --- सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य - लहरी नल-दमयन्ती और ब्याहलो
- अभी भी जाने जाते हैं --- कृष्ण भक्त के रूप में
सूरदास की मृत्यु
- सूरदास की मृत्यु --- सन 1583 ई० में पारसौली नामक स्थान पर
सूरदास का जन्म | Birth of Surdas
कृष्ण भगत और महान कवी सूरदास का जन्म 1534 वैशाख शुक्ल पंचमी में रुनकता नामक गांव में हुआ था। इस महान कवि के जन्म के बारे में हालाँकि कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं। इनके जन्म को लेकर अलग -अलग साहित्यकारों और इतिहासकारों के अलग - अलग मत हैं। पर उनके जन्म की बात करें तो उनका जन्म भारत की पवित्र धरती मथुरा में हुआ था और जिस गांव में उनका जन्म हुआ था वह आज भी मथुरा - आगरा राष्ट्रीय मार्ग के किनारे स्थित है। सूरदास जी के पिता का नाम रामदास था और वे भक्तिकाल के एक महान कवि और गीतकार थे जो हमेशा भक्ति में लीं रहते थे।
सूरदास बचपन से ही कृष्ण भक्ति में इतने मन्त्र मुग्ध हो गए थे जैसे उन्हें कृष्ण की लीला का ज्ञान पिछले युग से हो। जब वे मात्र 6 साल के थे तो उन्होंने घर को छोड़ने का फैसला किया और अपने आप को कृष्ण भगति में लींन कर लिया। अपना पूरा जीवन उन्होंने कृष्ण भक्ति में लगा दिया। सूरदास के जन्म के बारे में नीचे दिए गए दोहे से समझा जा सकता है।
“रामदास सूत सूरदास ने, जन्म रुनकता में पाया,
गुरु बल्लभ उपदेश ग्रहण कर , कृष्णभक्ति सागर लहराया”
अर्थ :- महान व्यक्ति सूरदास का जन्म रुनकता नामक स्थान पर हुआ था और अपने गज्ञान गंगा में उन्होंने गुरू बल्लभाचार्य के मार्ग दर्शनों से किया। गुरु के आशीर्वाद से वे सारी उम्र कृष्ण भक्ति में लीन हो गए। उनके जैसा कृष्ण भक्त न कोई पैदा हुआ है और शायद ही कोई पैदा होगा।
सूरदास के गुरू बल्लभाचार्य का शिक्षा में योगदान | Contribution of Surdas's Guru Ballabhacharya in education
सूरदास
बचपन
से
ही
कृष्ण
लीला
में
लींन
रहते
थे
एक
दिन
सूरदास
वृन्दावन धाम
जो
हिन्दुओं का
पवित्र
धाम
है
यात्रा
करने
गए
थे
इसी
यात्रा
के
दौरान
उनकी
मुलाकात आचार्य
बल्लभाचार्य से
हुई।
उनकी
शिक्षाओं और
वचनो
से
सूरदास
बहुत
प्रभावित हुए।
सूरदास
ने
बल्लभाचार्य को
अपना
गुरु
बनाने
का
फैसला
कर
लिया।
कृष्ण
भक्ति
का
ज्ञान
उन्हें
बचपन
से
ही
था
पर
बल्लभाचार्य को
गुरु
पाने
के
बाद
इन्हे
एक
सही
मार्गदर्शन मिला
और
उन्ही
से
उन्होंने अपने
भक्तिकाल की
शिक्षा
प्राप्त की।
उनके
गुरु
जी
बल्लभाचार्य और
सूरदास
की
उम्र
में
कोई
खास
फर्क
नहीं
था
दोनों
के
बीच
उम्र
का
सिर्फ
दस
दिन
का
फर्क
था
पर
गुरु
तो
गुरु
होता
है
गुरु
ज्ञान
का
सागर
होता
है
इसलिए
बल्लभाचार्य ने
उन्हें
ज्ञान
की
गंगा
दी।
सूरदास
के
गुरु
बल्लभाचार्य ने
उन्हें
भगवत
गीता
के
उपदेशों के
बारे
में
बताया
जो
कृष्ण
जी
ने
दिए
थे।
अगर
आप
सूरदास
कि
तस्वीर
देखोगे
तो
आपको
ये
मिलेगा
कि
वे
एक
तारा
के
साथ
होते
थे।
उनके गुरु जी और सूरदास ज्ञान प्राप्ति के लिए गोवर्धन पर्वत पर जाया करते थे जहां वे भगवत गीता का एक दोहा लिख के उसका एक तारा से गायन किया करते थे। इस प्रकार उनके गुरु जी ने उन्हें कृष्ण भक्ति के साथ-साथ भगवत गीता का ज्ञान भी करवाया।
सूरदास और कृष्ण भक्ति की कहानी | Story of Surdas and Krishna Bhakti
अगर कृष्ण भक्तों
की
बात
करें
तो
कृष्ण
भक्तों
की
कमी
नहीं
है
जो
कृष्ण
जी
की
लीला
में
लीन
रहते
थे।
पर
सूरदास
कृष्ण
भक्ति
में
इतने
लीन
हो
जाते
थे
कभी
कभी
अपना
आप
भी
भूल
जाते
थे।
एक
पौराणिक कथा
की
अनुसार
कृष्ण
एक
बार
इतने
लीन
हो
गए
और
इक
सितारा
से
कृष्ण
की
लीला
गाते
गाते
कुएं
में
गिर
गए
थे।
भगवान्
कृष्ण
की
इस
भक्ति
को
देखकर
भगवान्
कृष्ण
प्रकट
हुए
और
उन्होंने सूरदास
की
जान
बचाई
थी।
ऐसा माना जाता
है
कि
सूरदास
बचपन
से
ही
अंधे
थे
जब
भगवान्
कृष्ण
ने
उनकी
जान
बचाई
तो
उन्हें
कृष्ण
जी
के
दर्शन
हुए।
पर
अंधे
होने
की
वजह
से
वे
कृष्ण
को
नहीं
देख
सकते
थे।
पर
भगवान
कृष्ण
ने
उनसे
खुश
होकर
उन्हें
रौशनी
प्रदान
की
थी।
सूरदास
भगवान
कृष्ण
को
देखकर
खुश
हो
गए।
भगवान्
कृष्ण
से
रुकमणी
ने
सवाल
किया
कि
अगर
आप
सूरदास
की
भक्ति
से
इतने
खुश
हैं
तो
आप
उन्हें
वरदान
क्यों
नहीं
देते।
भगवान्
कृष्ण
ने
सूरदास
से
वरदान
मांगने
के
लिए
कहा।
सूरदास
ने
भगवान्
कृष्ण
से
कहा
कि
हे
प्रभु
मुझे
फिर
से
अँधा
कर
दें।
भगवान् कृष्ण ने इसका कारण पूछा तो सूरदास ने ये जवाब दिया कि हे भगवान "मैं आपके बिना किसी और को नहीं देखना चाहता हूँ और आपकी छवि हमेशा अपने मन में रखना चाहते हूँ इसलिए मुझे अँधा कर दें। भगवान् कृष्ण फिर से अंधे हो गए और सारी उम्र कृष्ण भक्ति में लीन हो गए।
सूरदास कृष्ण भक्ति में इतने लीन रहते थे कि उनकी भक्ति का गुणगान सभी जगह किया जाता था। उस वक्त भारत में अकबर जैसे महान सम्राट के दरवार में तानसेन जैसे कवि हुआ करते थे। तानसेन भी महान कवि थे पर अकबर सूरदास कि कृष्ण भक्ति को देखकर उनसे मिले बिना नहीं रह सके और उन्होंने सूरदास से मिलने की इच्छा जताई। अकबर ने अपने दरवारी कवि तानसेन से इस बात की इच्छा जताई कि वे उन्हें सूरदास से उन्हें मिलवाये।
अकबर और सूरदास की मुलाकात मथुरा जैसे पवित्र धाम में हुई। सूरदास की रचनाओं और जो उनके पद थे उनसे अकबर बहुत प्रभावित हुए। अकबर ने कृष्ण भक्ति का गुणगान अपने दरवार में करने की इच्छा जताई पर सूरदास ने ये कहा कि वे कृष्ण भक्ति में ही हमेशा लीन रहते हैं इसलिए उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया।
सूरदास की रचनायें | Works of Surdas
सूरदास
जी
कविता
और
पद
कृष्ण
लीला
से
विभूत
होते
थे
वे
हमेशा
कृष्ण
भक्ति
में
लीन
रहते
थे।
जब
कृष्ण
जी
की
लीला
की
बात
करें
तो
तो
वह
सूरदास
की
रचनाओं
में
मिलती
हैं।
सूरदास
जी
द्वारा
लिखित
5 ग्रन्थ
हैं
जो
आज
भी
प्रचलित हैं।
पहला सूरसागर
सूरसागर सूरदास
सूरदास
दुआरा
रचा
गया
गया
कृष्ण
भक्ति
का
पवित्र
ग्रन्थ
है
जिसमें
सूरदास
द्वारा
रचे
गए
कीर्तनों-पदों
का
एक
सुंदर
संकलन
है
इस
में
नौ
अध्याय
हैं
जिन्हे
संक्षिप्त रूप
से
बड़ी
अच्छी
तरह
से
बयान
किया
गया
है
इस
ग्रन्थ
को
लिखने
के
लिए
ब्रज
भाषा
का
प्रयोग
किया
गया
है।
"सूरसागर" के दो
रूप
मिलते
हैं
जिनमे
पहला
"संग्रहात्मक" और दूसरा
"द्वादश
स्कंधात्मक" है। इस
ग्रथं
को
12 स्कंदों में
बांटा
गया
है।
आज
भी
सूरसागर की
हाथों
से
लिखी
प्रतियां मिलती
हैं।
इसे
एक
ग्रन्थ
इस
लिए
कहा
जाता
है
क्योकि
यह
इतना
बड़ा
है
कि
इसमें
सवा
सौ
लाख
कृष्ण
भक्ति
के
पदों
का
वर्णन
मिला
है।
दूसरा ग्रंथ सूरसारावली
सूरसारावली सूरदास
द्वारा
रचयित
दूसरा
ग्रंथ
है
जिसमें
कृष्ण
भक्ति
का
गुणगान
किया
गए
है
और
इसमें
1107 छंद
हैं
जिनका
वर्णन
बहुत
अच्छी
तरह
से
सूरदास
ने
किया
है
और
इस
ग्रंथ
में
होली
और
कृष्ण
लीला
के
छंद
विराजमान है
जो
कृष्ण
लीला
से
विभोर
हैं।
तीसरा ग्रन्थ साहित्य
- लहरी
सूरदास
द्वारा
रचित
तीसरा
ग्रंथ
साहित्य - लहरी
हैं
और
इस
इस
ग्रंन्थ में
118 पदों
को
व्यक्त
किया
गया
है।
इस
ग्रन्थ
में
सूरदास
को
सूरजदास के
नाम
से
जाना
गया
है।
और
उन्हें
एक
महान
कवी
चंदवरदाई के
वंश
में
से
बताया
गया।
यह
ग्रन्थ
कृष्ण
भक्ति
से
विभोर
है
और
अलकारों और
छंदों
से
कृष्ण
की
किला
का
गुणगान
किया
गया
है।
सूरदास का चौथा
ग्रन्थ नल-दमयन्ती
इस
ग्रंथ
में
भी
सूरदास
ने
कृष्ण
की
लीला
का
गुणगान
किया
है
और
यह
व्रजभाषा में
लिखा
गया
है
इसमें
कृष्ण
की
उस
लीला
का
गुणगान
किया
गया
जब
वे
पांडवों और
कौरवों
द्वारा
जुआ
के
खेल
में
कृष्ण
की
गाथा
का
गुणगान
करते
हैं।
सूरदास द्वारा रचियत पांचवां ग्रंथ ब्याहल ग्रन्थ है जहां पर आपको कृष्ण की लीला का गुणगान छंदों में मिलता है।
सूरदास की रचनाओं की विशेषताएँ | Features of Surdas's compositions
सूरदास
एक
ऐसे
रचनाकार जिनकी
रचनाओं
में
कृष्ण
भक्ति
का
भरपूर
गुणगान
होता
है
और
उनकी
रचनाओं
में
जो विशेषताएँ हैं
वे
निम्न
दी
गई
हैं।
- सूरदास ने अपनी रचनाओं में वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया है। उन्होंने कृष्ण लीला का जो वाल्य रस है उसका बड़ी अच्छी तरह से वर्णन किया है।
- सूरदास की रचनाओं में कर्मभेद, ज्ञान और योग की श्रेष्ठ रचनायें मिलती हैं।
- कोमलकांत पदावली, भावानुकूल शब्द-चयन, सार्थक अलंकार-योजना, धारावाही प्रवाह, संगीतात्मकता को अपनाते हुए सूरदास ने व्रजभाषा का इस्तेमाल किया है।
- उनकी रचनाओं में श्रृंगार रस का भी मेल मिलता है जिसमें कृष्ण और गोपियों की लीला देखने को मिलती है।
- "हमारे प्रभु औगुन चित न धरौ। समदरसी है मान तुम्हारौ, सोई पार करौ।" जैसे पदों में कहीं -- कहीं अपने आप को दास बताते हैं। इसलिए दास्य रस भी उनकी रचनाओं में मिलता है।
- सूर दास ने ने स्थान-स्थान पर कूट पद भी लिखे हैं।
- सूरदास की रचनाओं में वियोग रुपी विशेषताएँ भी देखने को मिलती हैं जो राधा और कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करती है।
- माता यसोदा और कृष्ण की जो लीला हैं उसमें सौम्य रस देखने को मिलता है।
- सूरदास की कविता में पुराने आख्यानों और कथनों का उल्लेख बहुत स्थानों में मिलता है।
सूरदास के अंधेपन की कहानी | The story of Surdas's blindness
सूरदास
क्या
बचपन
से
अंधे
थे
? इसके
बारे
में
अलग
- अलग
विचारकों के
अलग
अलग
विचार
हैं।
इसके
बारे
में
प्रसिद्ध विचारक
श्याम
सुन्दर
दास
ने
लिखा
है
कि
उनकी
भक्ति
रचना
से
पता
चलता
है
कि
वे
बचपन
से
अंधे
नहीं
थे।
दूसरी
ओर
मशहूर
कवी
हरि
प्रसाद
द्वेदी
ने
ये
कहा
है
कि
सुरदास
के
सूरदास
के
कुछ
पद
ऐसे
भी
हैं
जिनसे
ये
पता
चलता
है
कि
वे
बचपन
से
अंधे
थे।
दूसरी तरफ गोसाईं हरिराये ने भी इस बात को माना है कि सूरदास की कृतियों से पता चलता है कि सूरदास बचपन से अंधे थे। एक पौराणिक कथाओं में ये बात भी प्रचलित है कि सूरदास बचपन से अंधे थे पर एक बार श्री कृष्ण के दर्शन के बाद श्री कृष्ण जी ने उनकी रोशनी को वापिस लाया था। ऐसा इसकिये हुआ था क्योकि सूरदास ने कृष्ण जी के दर्शन के लिए ऐसा किया था। इसके बाद उन्होंने फिर से अंधे पन का वरदान माँगा था।
सूरदास की भाषा और शैली | Language and style of Surdas
हिन्दी साहित्य के सूर्य प्रज्ञा चाशु सूरदास जी ने अपनी मेहनत की अभिव्यक्ति के लिए कोमलकांत पदावली से युक्त ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जो अपने मधुर बुध के लिए प्रसिद्ध है। "सूर और उसका साहित्य" नामक पुस्तक में महान कवि सूरदास की भाषा के संबंध में लिखा गया है - "सॉफ्ट-कंट वाक्यांशविज्ञान
क्या है, शब्दों का भावुक विकल्प, सार्थक अलंकरण-योजना, प्रवाह, संगीत और जीवंतता में है सूर से भाषा, वही कहने के लिए ऐसा लगता है कि सूर ने सबसे पहले ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया था।
लेकिन उनकी भाषा सरल, सीधी और धाराप्रवाह है, सुर ने काव्य शैली को अपनाया है। AND - वर्णन में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। दृश्य पदों में स्पष्टता शामिल की गई है। सामान्य तौर पर, उनकी शैली सरल और प्रभावशाली है।
सूरदास के प्रमुख दोहे व्याख्या सहित | Major couplets of Surdas with explanation
"सूरदास के प्रमुख दोहे अर्थ सहित
चरन कमल बंदौ हरि राई,
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई।
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई,
सूरदास स्वामी करुनामय बार बार बंदौं तेहि पाई।"
व्याख्या - इस दोहे में सूरदास ने कृष्ण की लीला का गुणगान करते हुए ये कहा है कि जब श्री कृष्ण के चरणों की कृपा जब किसी पर होती है तो पंगु अर्थात एक विकलांग जो नहीं चल सकता है वह भी बड़े से बड़े पहाड़ को पर कर सकता है। अँधा सब कुछ देख सकता है। अर्थात श्री कृष्ण कि लीला से एक अपंग चल सकता है और गंगा बोलने लगता है। इस दोहे में गरीब पर दया करने वाले कृष्ण के बारे में उन्होंने बताया है कि कृष्ण की लीला से एक गरीब अमीर हो सकता है। इस दोहे में कृष्ण की लीला का करुणामई रस का बोध होता है।
गुरू बिनु ऐसी कौन करै।
माला-तिलक मनोहर बाना, लै सिर छत्र धरै।
भवसागर तै बूडत राखै, दीपक हाथ धरै।
सूर स्याम गुरू ऐसौ समरथ, छिन मैं ले उधरे। “
व्याख्या – इस दोहे में सूरदास कहते हैं कि अपने शिष्य पर अपार कृपा भगवान श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं। उनकी कृपा से ही हर कोई शिष्य अपने सिर पर तिलक लगाता है और गले में कृष्ण रुपी माला धारण करता है। जब ऐसा होता है तो चेला मनमोहक हो जाता है। जब कृष्ण जी का चला अज्ञान रुपी सागर में डूब जाता है तो उन्हें ज्ञान रुपी दिया या दीपक कृष्ण ही पकड़ाते हैं। कृष्ण भक्ति ने सभी को सागर पार करने की शक्ति दी है।
चोर न लेत, घटत नहि कबहूॅ, आवत गढैं काम।
जल नहिं बूडत, अगिनि न दाहत है ऐसौ हरि नाम।
बैकुंठनाम सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम।।
व्याख्या – इस दोहे में सूरदास ने कृष्ण जी को राम शब्द से पुकारा है। सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु कृष्ण गरीबों के लिए माया और धन रुपी काम करते हैं। हर कोई धन को चोर चुरा सकता हैं पर राम रुपी धन एक ऐसा धन है जिसे कोई नहीं चुरा सकता है या एक अमूल्य धन है। ये एक ऐसा धन है जो न तो किसी भी पानी में डूब सकता है और न ही किसी अग्नि में भस्म हो सकता है।
अर्थात जब राम रुपी धन की प्राप्ति हो गई तो ये किसी भी रूप में नशवर नहीं है। सूरदास जी कहते हैं कि हे बैकुंठ के स्वामी सभी को सुख देने वाले हैं और हर परिस्थिति में सुख के सागर के रूप में काम करते हैं।
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात ?
गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हँसत-सबै मुसकात।
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत॥
व्याख्या – इस दोहे में भगवान कृष्ण और मां यसोदा की लीला का वर्णन सूरदास द्वारा किया गया है। सूरदास जी कहते हैं कि हे मां मुझे बड़े भाई बलराम बहुत सताते हैं। इस दोहे में कृष्ण जी अपने भाई के साथ खेलने के लिए इंकार कर देते हैं और वे बोलते में उनके साथ नहीं खेलूंगा। जब बलराम उन्हें सताते हैं तो इनके साथ सभी ग्वाले उस पर हँसते हैं इसमें सूरदास ने कृष्ण जी, बलराम और मां यशोदा की स्नेह लीला का वर्णन किया है।