हम जानते हैं भारत सूरवीरों की धरती है बात महाभारत की करें या फिर मध्य इतिहास की बात रामायण की करें या फिर आधुनिक इतिहास की भारत के रणबांकुरों ने जितनी भी बाहरी शक्तियों ने भारत के ऊपर नजर डाली उनके नाकों चने चबा दिए थे। ऐसे ही एक राजूपत वीर सपूत थे जिनका नाम था महाराणा प्रताप उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी भी मुग़लों से हार नहीं मानी और अकबर जैसे सम्राट को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया आज हम नजर डालेंगे महाराणा प्रताप के इतिहास और उनकी जीवनी पर।
| महाराणा प्रताप परिचय | जन्म | परिवार | राज्याभिषेक | शिक्षा | इतिहास | लड़ाइयां | चेतक | अकबर के साथ संबंध | भामाशाह का योगदान | मृत्यु |
पहले एक नजर महाराणा प्रताप का छोटा सा परिचय | Biography and History of Maharana Pratap in Hindi
1. महाराणा प्रताप का जन्म स्थान ---- कुंभलगढ़
2. जन्म तारीख ---- 9 मई सन 1540 ईस्वी
3. वंश ---- राजपूत, सिसोदिया
4. महाराणा प्रताप का मुग़ल समकालीन ---- अकबर
5. महाराणा प्रताप के भाले का भार ---- 81 किलो
6. छाती के कवच का भार ---- 72 किलो
7 दो तलवारों का भार ---- 50 किलो
8. लड़ी गई प्रमुख लड़ाई ---- हल्दी घाटी का युद्ध
9. मृत्यु की तारीख ---- 19 जनवरी 1597
10. मृत्यु के समय उम्र ---- 57 साल 7 महीने 10 दिन
महाराणा प्रताप का जन्म राजपूत सिसोदिया वंश के घर में 9 मई सन 1540 ईस्वी को हुआ था। उनके पिता जी का नाम महाराजा उदयसिंह सिंह थे। और उनकी माता जी का नाम रानी जयवन्ताबाई था। उनके जन्म स्थान में आज का राजस्थान राज्य है और उस स्थान का नाम जहां महाराणा प्रताप सिंह का जन्म हुआ था वह एक किला है जिसे कुंभलगढ़ जिले के रूप जाना जाता है। उनके जन्म स्थान कुंभलगढ़ किले का निर्माण उनके दादा जी ने करवाया था जिनका नाम राणा सांगा ने करवाया था। चलो एक नजर डालते हैं उनके पुरे परिवार पर।
1:- दादा राणा सांगा :-- राणा सांगा रायमल के छोटे बेटे थे और उनका जन्म 12 अप्रैल 1484 में हुआ था। उन्होंने 1509 से लेकर 1528 तक राजपूत सिसोदिया वंश में राज किया।
2 :- पिता उदयसिंह सिंह :--- उदय सिंह का जन्म 4 अगस्त 1527 में और मृत्यु 28 फरवरी 1572 में हुई थी। वे मेवाड़ राजपूत राजा थे और मेवाड़ के 53 वें शासक थे। उनका जन्म चित्तौरगढ़ जिले में हुआ था और संग्राम सिंह के चार पुत्रों में से एक थे। उनका राजतिलक कुंभलगढ़ किले में 1540 में किया गया था। उन चार पुत्रों में महराणा प्रताप सबसे बड़े थे।
3:- माता
:--- रानी जयवन्ताबाई जयवंता बाई महराणा प्रताप की माता जी और उदय सिंह की पत्नी थी जसका संबंध पाली के राजपूतो से था और वह पाली सोनगरा अखैराज राजपूत की बेटी थी।
4 :- महाराणा प्रताप सिंह के भाई :-- महाराणा प्रताप सिंह के भाइयों का नाम शक्ति सिंह, राम सिंह और सागर सिंह था।
5:-- महाराणा प्रताप की पत्नियों के नाम :- अजब देपंवार, रत्नकंवर पंवार, फूल कंवर राठौड़ द्वितीय, भगवत कंवर राठौड़, प्यार कंवर सोलंकी, शाहमेता हाड़ी, माधो कंवर राठौड़, आश कंवर खींचण, रणकंवर राठौड़, अमोलक दे चौहान, चंपा कंवर झाला, फूल कंवर राठौड़ प्रथम,जसोदा चौहान और रत्नकंवर राठौड़।
6 :- महाराणा प्रताप के बेटों का नाम :- दुर्जनसिंह, कल्याणदास, चंदा, शेखा, पूर्णमल, हाथी, रामसिंह, जसवंतसिंह, माना, नाथा, अमर सिंह, गोपाल, भगवानदास, सहसमल, काचरा, सांवलदास, रायभान था।
7 :- महाराणा प्रताप की बेटियों का नाम :- कुसुमावती, दुर्गावती, सुक कंवर, रखमावती, रामकंवर था।
महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक | Coronation of Maharana Pratap
महाराणा प्रताप की दूसरी पत्नी भी थी जिसका नाम धीराबाई बाई था और ऐसा माना जाता है कि वह हमेशा इस बात की वकालत करती थी कि कुंबलगढ़ का राज उनके बेटे कुंवर जगमाल को मिला चाहिए और वह मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनना चाहिए। पर दूसरी तरफ लोग महाराणा प्रताप सिंह को प्यार करते थे और उन्हें राजगद्दी सौंपना चाहते थे।
उस वक्त अकबर महान का पुरे उत्तर भारत में शासन था इसलिए महाराणा प्रताप के पिता जी ने मेवाड़ को भी एक बार छोड़ दिया था। इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि महारणा प्रताप के पिता ने राजपूत नियमों के विरुद्ध जाते हुए छोटे पुत्र को उत्तराधिकारी बना दिया था।
इस बात से राजपूत सरदार नाखुश हो गए थे और उन्होंने मिलकर 1 मार्च 1576 को महाराणा प्रताप को गद्दी सौंप दी थी। महारणा प्रताप का राजयभिषेक राजपूत सरदारों के बीच गोगुंदा नामक स्थान पर हुआ था। मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप ने लगभग 29 साल तक शासन किया।
महाराणा प्रताप की शिक्षा भील जाति का योगदान | Contribution of Bhil caste to Maharana Pratap's education
महाराणा प्रताप की अगर शिक्षा की बात करें तो उनकी ज्यादातर शिक्षा होने घर और हुई थी उनके पिता जी ने उनकी शिक्षा के लिए घर पर प्रबंध किया था। अपनी शिक्षा में उन्होंने तलवार चलना और धनुष से तीर अंदाजी करना सीखा था। उनका भील जाति के साथ अच्छे संबंध थे भील जाति के लोग मध्यभारत के वे लोग थे जो तीरंदाजी में बहुत निपुण थे।
महाराणा प्रताप ने भी उनसे तीरंदाजी की शिक्षा बचपन में प्राप्त की थी इसके लिए वे किसी स्कूल में नहीं जाते थे पर उनके साथ जंगलों में तीरंदाजी किया करते थे। यही भील जति के लोगों ने महाराणा प्रताप का युद्ध में साथ दिया था और उनकी जान भी बचाई थी।
राजा मानसिंह और महाराणा प्रताप के संबंधो का इतिहास | History of the relationship between Raja Mansingh and Maharana Pratap
अब आप सोचते होंगे राजा मान सिंह कौन तो राजा मानसिंह भी का राजपूत थे और आमेर के पहले राजपूत राजा थे। उनका संबंध कछवाह राजपूत से था। उनके पिता भगवंत दास था और उन्होंने आमेर के किले का निर्माण करवाया था। दूसरी बात ये कि वे अकबर की सेना में एक प्रधान सेना पति थे और भारत में उड़ीसा से लेकर आसाम तक अकबर के साम्राज्य में मिलाने वाले वे ही थे। एक दिन की बात है जब रजा मानसिंह ने महाराष्ट्र के सोनपुर में विजय प्राप्त की उसके बाद उन्होंने महाराणा जो उस वक्त कुंभलगढ़ में रहे रहे थे से मिलने का विचार बनाया।
मानसिंघ ने महाराणा प्रताप के बेटे अमर सिंह से कहा कि महाराणा प्रताप सिंह उनसे मिलें और उन्होंने महाराणा प्रताप को उन्होंने खाने पर बुलाया था। जब मानसिंघ ने आकर देखा कि महाराणा खाने के बुलावे पर नहीं आये हैं तो मानसिंह इससे आग बबूला हो गए। महारणा प्रताप सिंह किसी भी कीमत पर अकबर के अधीन नहीं होना चाहते थे। कुछ इतिहास कारों का कहना है कि हल्दीघाटी के युद्ध का ये भी एक कारण था।
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महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी के युद्ध का वृतांत | Battle of Haldighati
हल्दी घाटी के युद्ध के बारे में सभी जानना चाहते हैं और सभी ये भी जानते हैं कि हल्दी घाटी का युद्ध महाराणा प्रताप और मुग़ल सम्राट अकबर के बीच में हुआ था आईये जानते हैं महराणा प्रताप के इतिहास ( History of Maharana Partap) में हल्दी घाटी के युधा का वृतांत। हल्दी घाटी युद्ध स्थल राजस्थान में एक ऐसा स्थान था जो एक संकरा दर्रा था और गोगुन्दा के पास स्थित है और गोगुन्दा से लगभग 23 किलोमीटर दूर खमनोर गावं में है। अकबर पुरे भारत का सम्राट बना चाहता था। उसने लगभग पुरे उत्तर भारत को पाने कब्जे में ले लिया था। दूसरी तरफ राजस्थान के मेधावी राजपूत महारणा प्रताप देश को एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। अकबर, महराणा प्रताप के शौर्य और वीरता को भली भांति जनता था।
हालाँकि 1567 में अकबर ने चित्तौरगढ़ की घेरा बंदी की जो अकबर के सेना पति जयमल ने की थी और इसका कुछ हिस्सा जो पूर्वी भाग था अपने कब्जे में ले लिया था। महाराणा प्रताप को संधि के लिए कई बार बुलाया गया इतिहासकारों की माने तो अकबर ने महाराणा प्रताप को के पास 6 राजदूत भेजे गए थे। इससे साफ पता चलता चलता है कि अकबर राणा के शौर्य और वीरता से कहीं न कहीं डरता था। दूसरी तरह 1568 ने राणा की उपाधि धारण की। इससे अकबर और भी तिलमिला गया और अकबर का अब एक ही मकसद था वह था महाराणा को मात देना।
इस तरफ महाराणा प्रताप के साथ भील लोगों समर्थन था। महाराणा प्रताप के पास 400 घुड़सवारों और 400 से भी ज्यादा भील धनुर्धारी मौजूद थे। पर इसके बारे में भी अलग - अलग इतिहासकारों की अलग - अलग राय है इतिहासकार बदांयूनी कहते हैं कि महारणा प्रताप ने 5000 घुड़सवारों के साथ आक्रमण किया था और अकबर को यह एहसास हुआ कि उसके पास सिर्फ 5000 हजार ही सैनिक हैं पर ये गिनती सिर्फ घुड़सवार सैनिकों की थी। वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इस बात की पुष्टि की है कि महाराणा प्रताप ने सिर्फ 22000 सैनिकों के साथ अकबर के का सामना किया था। युद्ध में सैनिकों की गिनती जीतनी भी हो दोनों तरफ से भीषण युद्ध हुआ।
महाराणा प्रताप और अकबर की सेना ने इस युद्ध में पैदल सैनिकों घुड़सवारों और तोपों का इस्तेमाल किया। ये युद्ध चार दिन तक चला। युद्ध चार घंटे तक चला और युद्ध में महाराणा प्रताप जख्मी हो गए। इस युद्ध में मानसिंह ने अकबर का साथ दिया और लगभग 10000 सैनिकों के साथ युद्ध में में लड़ा। युद्ध में महराणा प्रताप ने अपना कब्जे वाला हिस्सा खो दिया और मानसिंह को इसका फायदा हुआ।
हल्दीघाटी के युद्ध के परिणाम | Results of the Battle of Haldighati
अब हर कोई ये भी जानना चाहता है कि हल्दी घाटी युद्ध के क्या परिणाम रहे कुछ ऐसा सोचते हैं कि इस युद्ध में अकबर की जीत हुई और कुछ ऐसा मानते हैं कि इस युद्ध में महारणा प्रताप की जीत हुई। तो हम आपको बता दें कि ये युद्ध अनिर्णायक युद्ध था अर्थात इस युद्ध में किसी भी जीत नहीं हुई थी हाँ ये बात कही जा सकती है कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना को पीछे हटने के लिया मजबूर कर दिया था। जो एक भयंकर खुला युद्ध था वह तो समाप्त हो गया था पर राजपूतों का संघर्ष और अकबर की साम्राज्य विस्तार की भूख अभी तक समाप्त नहीं हुई थी।
ये बात है कि युद्ध के बाद महाराणा प्रताप को जंगलों में अपना जीवन वसर करना पड़ा। पर महाराणा प्रताप हार मानने वाले नहीं थे उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए जंगलों में जाकर खास की रोटियां खाई और अपने साम्राज्य को वापिस पाने के प्रयास में लगे रहे। दूसरी तरफ अकबर ने अपना ध्यान दूसरे कामों में लगा लिया और महाराणा प्रताप ने इसका फायदा उठाते हुए अपने कुछ स्थानों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया था। इस युद्ध के परिणाम गंभीर ये निकले कि दोनों तरफ जान मॉल की हानि हुई। अकबर को भी राजपूत की शक्ति का एहसास हुआ।
महाराणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक का इतिहास | History of Maharana Pratap and his horse Chetak
दोस्तों महाराणा प्रताप की बात करें या फिर सिख महाराज महाराज रणजीत सिंह की इनके जीवन में उनके घोड़ों ने साथ दिया थे था अपनी वफादरी पर परिचय दिया था। चेतक के बारे में हम बता दें महाराणा
प्रताप का घोडा चेतक ईरानी मूल का घोडा था। इसे महाराणा प्रताप ने एक गुजरात के काठियावाड़ी व्यापारी से खरीदा था। महाराणा प्रताप ने इस व्यापारी से चेतक ही नहीं खरीदा था पर एक और घोडा था जिसका नाम अटक था।
दोनों हो घोड़े बहुत चुस्त और फुर्तीले थे। महाराणा प्रताप ने दोनों को खरीद लिया था। अटक को उन्होंने अपने छोटे भाई को दिया था और चेतक अपने आप रखा था। महाराणा प्रताप की शौर्य और वीरता की गाथा चेतक के साथ जुडी हुई है ऐसा माना जाता है कि उसने कभी महाराणा प्रताप को कभी भी धोखा नहीं दिया। युद्ध में लड़ते हुए जब महाराणा प्रताप घायल हो गए उनके घोड़े को भी नुक्सान पहुंचा था पर वह उन्हें लेकर युद्ध क्षेत्र से बहार निकला और एक नाले को पार करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
महाराणा प्रताप और उनके भाई जिनका नाम शक्ति सिंह था उन्होंने चेतक का संस्कार किया था। अगर आप कभी राजस्थान के राजसमंद जिले में जाते हो तो चेतक की समाधि को देख सकते हैं जो अपने में एक इतिहास है। चेतक को आज भी राजस्थान में याद किया जाता है और उनके वीरता की गाथा गाई जाती है।
क्या है महाराणा प्रताप और अकबर की जीत के पीछे इतिहास ? | What is the history behind the victory of Maharana Pratap and Akbar ?
कुछ इतिहास कार ऐसा मानते हैं है कि हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की जीत हुई थी पर डॉ. चन्द्र शेखर शर्मा ने जो एक राजस्थान विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय के उदय पुर जिले में प्रोफ़ेसर हैं उन्होंने महाराणा प्रताप पर एक रिसर्च की है जिसमें उन्होंने ये कहा है कि महाराणा प्रताप की हल्दी घाटी के युद्ध में विजय हुई थी।
उन्होंने एक किताब का विमोचन किया था जिसका नाम “राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप” है। उन्होंने मेवाड़ के महाराणा प्रताप पर चार किताबें लिखी हैं। उन्होंने हल्दी घाटी के के युद्ध से कुछ ताम्ब्रपत्र इकठे किये हैं है और महाराणा प्रताप की विजय गाथा के प्रमाण रजत विद्यालय विश्वविद्यालय में submit करवाए हैं। उन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि अकबर युद्ध की हार से दुखी था और उसने सेनापति मान सिंह और आसिफ खां को कई दिन अपने दरबार में नहीं आने दिया था।
महाराणा प्रताप की जिंदगी में दानवीर भामाशाह का योगदान | Contribution of Danveer Bhamashah in the life of Maharana Pratap life
"वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला"
आप ने अपनी जिंदगी में दानवीर तो देखे होंगे दानवीर कर्ण का नाम भी सुना होगा पर आधुनिक युग में भामाशाह एक ऐसे दानी थे जिनकी गाथा को आज भी याद किया जाता हालाँकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वे एक जैन परिवार से संबंध रखते थे और उनका जन्म 28 जून 1547 को आज के राजस्थान के पाली जिले में हुआ था।
ऐसा माना जाता है कि जब महाराणा प्रताप अकबर से युद्ध के बाद जंगलों में अकबर की सेना की छापेमारी से बचने का प्रयास कर रहे थे तो भामा शाह ने उन्हें दुबारा से संगठित होने का साहस दिया और उन्हें मातृ भूमि से लड़ने के लिए एक आत्म बल दिया। उन्होंने महाराणा प्रताप को अपनी पूरी संपत्ति दे दी थी। ऐसा माना जाता है कि भामा शाह ने उन्हें इतनी संपत्ति दी थी कि जिससे लगभग 24000 सैनिकों का लगातार 12 वर्षों तक खर्चा चल सकता था। ऐसे दानवीर को हम सभी नमन करते हैं।
महाराणा प्रताप की मृत्यु | Death of Maharana Pratap)
महाराणा ने
जिंदगी
में
कभी
भी
किसी
से
हार
नहीं
मानी
उन्होंने अपनी
मातृ
भूमि
की
रक्षा
के
लिए
अपनी
जान
से
खेलकर
रक्षा
की।
19 जनवरी
1597 में
शिकार
खेलते
महाराणा प्रताप
की
मृत्यु
हो
गई।
ऐसा
माना
जाता
है
कि
उनकी
मृत्यु
के
बाद
उनके
कठोर
प्रतिद्वंधी अकबर
ने
भी
दुःख
जताया
था
और
उनकी
वीरता
का
गुणगान
किया
था।
ऐसे
वीर
पुरुष
को
हम
सदा
के
लिए
नमन
करते
हैं।