अगर आप देश के वीर योद्धा के बारे में या देश के क्रान्तिकारियों के बारे में अपने मन में कभी विचार लाते हैं तो निश्चय ही आपके मन में वीर सावरकर का विचार भी आता होगा। कौन भूल सकता है ऐसे क्रन्तिकारी को और देश भक्त को वीर सावरकर एक ऐसे क्रन्तिकारी हिन्दू ब्राह्मण थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए देश की अखंडता के लिए अपन पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। छोटी सी उम्र में उनके अंदर देश प्रेम की भावना कूट - कूट कर भरी हुई थी , आईये जानते हैं देश के ऐसे क्रन्तिकारी के जन्म, परिवार, शिक्षा, क्रन्तिकारी गतिविधियों और सम्पूर्ण इतिहास और जानकारी के बारे में।
वीर सावरकर जीवन परिचय | जन्म | परिवार | शिक्षा | फ्री इंडिया सोसाइटी | सैल्यूलर जेल सफर | माफ़ी नामा | सोच | मृत्यु |
वीर सावरकर का परिचय एक नजर में | First introduction of Veer Savarkar at a glance
- वीर सावरकर का पूरा नाम (Full Name) --- विनायक दामोदर सावरकर
- उप - नाम --- सावरकर
- व्यवसाय (Profession) --- वकील, राजनीतिज्ञ, लेखक और कार्यकर्ता
- जन्म तारीख ( Date of Birth) --- 28 मई 1883
- जन्म स्थान (Birth Place) --- नासिक मुंबई, भारत
- राष्ट्रीयता (Nationality) --- भारतीय
- धर्म ( Religion) --- हिन्दू
- जाति (Caste) --- ब्राह्मण
- पैतृक नगर (Hometown) --- नासिक
- शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualification)--- वकालत
- वैवाहिक जीवन (Marital Status) --- विवाहित
- पत्नी का नाम (Wife’s name) --- यमुनाबाई
- जिंदगी के आदर्श --- (लाल - बाल- पाल) , बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल
- मृत्यु की तारीख (Death Date) --- 26 फरवरी सन 1966
वीर सावरकर का जन्म | Birth of Veer Savarkar
वीर सावरकर का जन्म एक हिन्दू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस महान क्रांतिकारी का जन्म जब हुआ उस वक्त भारत में आजादी की लड़ाई जोरो पर थी। उनका जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के, भागपलापुर नामक स्थान में 28 मई सन 1883 में मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
उनके पिता जी का नाम दामोदर सावरकर और माता जी नाम राधाबाई सावरकर था। उनके अंदर बचपन से ही देश के प्रति प्यार और देश भक्ति की भावना और प्यार था। उनके माता - पिता सावरकर की देश प्रति प्यार के लिए समर्थन तो करते थे पर दूसरी तरफ उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए भी चिंतित रहते थे।
वीर सावरकर के परिवार का व्योरा | Veer Savarkar's family Details
वीर सावरकर के पिता जी एक अच्छे हिन्दू मराठी ब्राह्मण थे जिनका नाम दामोदर सावरकर था और एक महान क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी,समाजसुधारक, इतिहासकार, राष्ट्रवादी नेता तथा विचारक थे। उनकी माता जी नाम राधाबाई सावरकर जो एक कुशल गृहणी और धार्मिक विचारों वाली स्त्री थी।
सावरकर को छोड़ कर उनके तीन अन्य भाई बहन भी थे जिनमे दो भाई और एक बहन थी। दो भाइयों का नाम गणेश, और नारायण था और एक बहन थी जिसका नाम मैनाबाई था। अगर उनके परिवार की बात करें तो उनका एक खुशहाल परिवार था। सावरकर के परिवार का पूरा व्योरा नीचे दिया गया हैं।
2. माता का नाम (Mother’s Name) ---- राधाबाई सावरकर
3. पत्नी का नाम (Wife’s Name) ---- यमुनाबाई, (जन्म 4 दिसंबर,मृत्यु 08 नवंबर 1963)
4. बच्चों के नाम (Children Name) ---- विश्वास सावरकर , प्रभाकर सावरकर और प्रभात चिपलनकर
5. सावरकर के भाई बहन (Brothers /Sisters) ---- गणेश, मैनाबाई और नारायण
क्या एजुकेशन थी वीर सावरकर की ? | Veer Savarkar Education
सावरकर
की
प्रारम्भिक शिक्षा
उनके
अपने
पैतृक
गांव
में
हुई
थी
और
उसके
बाद
सावरकर
ने
पुणे
के
'फर्ग्यूसन कॉलेज'
से
पढ़ाई
की
और
स्नातक
की
डिग्री
हासिल
की।
श्यामजी कृष्ण
वर्मा
ने
इंग्लैंड में
अध्ययन
करने
के
लिए
छात्रवृत्ति प्राप्त करने
में
उनकी
सहायता
की।
उन्होंने 'ग्रेज़
इन
लॉ
कॉलेज'
में
दाखिला
लिया
और
'इंडिया
हाउस'
में
शरण
ली।
यह
उत्तरी
लंदन
का
छात्र
निवास
था।
वीर
सावरकर
ने
लंदन
में
अपने
साथी
भारतीय
छात्रों को
अंग्रेजों से
आजादी
के
लिए
लड़ने
के
लिए
'फ्री
इंडिया
सोसाइटी' बनाने
के
लिए
प्रेरित किया।
श्यामजी कृष्ण
वर्मा
ने
इंग्लैंड में
उन्हें
क्रन्तिकारी गतिवधियों में
साथ
दिया।
जब
वे
शिक्षा
ग्रहण
कर
रहे
थे
तो
तो
लाल,
बाल
पाल
की
क्रन्तिकारी गतिविधियों से
प्रेरित थे
और
हमेशा
उन
आदर्शों को
उन्होंने अपना
आदर्श
बनाया।
सावरकर
ने
'फर्ग्यूसन कॉलेज'
में
अपनी
शिक्षा
का
सफर
सुचारु
ढंग
से
जारी
रखा
और
कॉलेज
से
छात्र
वृति
भी
हासिल
की।
इसके
बाद
वे
कृष्ण
वर्मा
की
सहायता
से
आगे
की
पढ़ाई
के
लिए
इंग्लैंड चले
गए।
वीर सावरकर के जीवन में सच्ची सटीक क्रांति की भावना बचपन से भरी थी। जब वे 12 साल के थे तो उनके गांव में हिन्दू मुस्लिम का आपस में किसी बात को लेकर मन मोटाव हो गया था। उन्होंने 12 साल की छोटी सी उम्र हिन्दू मुस्लिम के बीच में जो अफरा तफरी का सामना किया और एक भारी मुस्लिम भीड़ को भगाने में कामयाब रहे।
जो महौल बना था उसका बड़ी ही दलेरी से सामना किया और एक हिन्दू - मुस्लिम दरार को मिटाने की कोशिश की। सभी लोगों ने उनके इस साहस और बहादुरी के काम केलिए प्रसंशा की और उन्हें उसके बाद सावरकर की जगह वीर सावरकर जाने लगा। ये बात अलग है कि इस भीड़ का सामना करने के लिए उनके भाई गणेश ने भी उनका साथ दिया पर उनके साहस में उस वक्त कोई भी कमी नहीं थी।
अभिनव भारत सोसायटी की स्थापना में सावरकर का योगदान | Contribution of Savarkar in the establishment of Abhinav Bharat Society
जब सावरकर अपनी कॉलेज की पढ़ाई लड़ रहे थे तो उनके अंदर क्रांतिकारी गतिवधियों का आगमन हो चूका था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि दामोदर का हर क्रन्तिकारी गतिविधियों में उनके भाई घेश दामोदर ने साथ दिया। जब दामोदर 21 वर्ष के थे तो उन्होंने 1904 में विनायक दामोदर सावरकर और उनके भाई गणेश दामोदर सावरकर के साथ मिलकर एक गुप्त युवा क्रन्तिकारी सगंठन का निर्माण किया जिसका नाम अभिनव भारत समिति (यंग इंडिया सोसाइटी) था। इस सोसाइटी में रहते हुए उन्होंने युवाओं को घर घर जाकर देश प्रेम के लिए जगाया और उनके अंदर क्रांति की आग को आगे लेकर आये।
क्या था सावरकर "मित्र मेला" ? | What was Savarkar "Friends Fair"?
अक्सर लोग पूछते हैं "मित्र मेला" क्या था ? तो हम बता दें ये एक ऐसा समूह होता था जो इकठे होकर देश प्रेम और अपने शारीरिक विकास के लिए बनाया जाता था। मित्र मेले का गठन वीर सावरकर और उनके भाई गणेश सावरकर द्वारा स्थापित किया गया था ,इसका उदेश्य सभी युवा क्रांतिकारियों को इकठा करना था और उनके अंदर ब्रिटिश सरकार के विरोध मेंजोश भरना था। मित्र मेले में सभी दोस्त इकठे होकर व्यायाम और कसरत किया करते थे इसलिए मित्र मेले का उदेश्य शारीरिक और बौद्धिक विकास दोनों ही थे।
वीर सावरकर का आदर्श वादी पर्चा "हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है ?" Veer Savarkar's ideal"Hindutva: Who is a Hindu?"
हिन्दुत्व हिन्दू कौन है ? एक आदर्श वादी पर्चा या लेख था जो वीर सावरकर ने 1923 में लिखा था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता वे नास्तिक विचरधारा के व्यक्ति थे और धर्म के नाम पर आडंबरों का खंडन करते थे। वे हिंदू शब्द को राष्ट्रवाद शब्द से जोड़ते थे। हिन्दुत्व को एक सजातीय, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक पहचान मानते थे।
वे भारत ही में ही नहीं हिन्दू को पूरी दुनिया में एक सच्चे देश भक्त के दृष्टिकोण से देखते थे। उन्होंने हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र को एक अखंड भारत के रूप में देखा था। उन्होंने हिंदुत्व के बारे में तब लिखा जब वे रत्न गिरी जेल में बंद थे। उन्होंने हिन्दू शब्द के लिए नीचे दिया दोहे को माना था।
आसिन्धुसिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिकाः।
पितृभूपुण्यभूश्चैव
स वै हिन्दुरितिस्मृतः ॥
वीर सावरकर के अनुसार एक सच्चे हिन्दू अर्थ - प्रत्येक व्यक्ति जो सिन्धु से समुद्र तक फैली भारत भूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वह ही हिन्दू है।
वीर सावरकर और उनके भाई गणेश सावरकर का आजादी के लिए योगदान | Contribution of Veer Savarkar and his brother Ganesh Savarkar for freedom
वे फर्ग्यूसन कॉलेज में रहते हुए गुप्त समितियों के गठन में सक्रिय थे। सावरकर ने साप्ताहिक एक हस्तलिखित पत्रिका का प्रचलन किया था जिस वे अपने आप वितरित करते थे। सावरकर हमेशा अपने दोस्तों के साथ विश्व इतिहास, इटली, नीदरलैंड और अमेरिका में क्रांतियों पर वार्ता किया करते थे और उन्हें देश की आजादी के लिए प्रेरित करते थे।
उन्होंने और उनके भाई गणेश ने दोस्तों को स्वदेशी चीजों को प्रयोग में लाने के लिए और अंग्रेजी सामन का वहिष्कार करने के लिए जागृत किया। उन्होंने इस काम के लिए मित्र मेलों का सहारा लिया। भारतीय राष्ट्रवादी गणेश सावरकर ने 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया था।
इंग्लैंड में सावरकर द्वारा "फ्री इंडिया सोसाइटी" का गठन | Formation of "Free India Society" by Savarkar in England)
सावरकर ने भारत तो भारत इंग्लैंड में रहते हुए भी देश के युवाओं को देश प्रेम के लिए जागृत किया। जब सावरकर इंग्लैंड गए तो उन्होंने पढ़ाई के साथ - साथ देश की क्रांति के लिए और मातृ भूमि के लिए काम किया। वे इंग्लैंड में एक छात्र निवास में रहते थे। 1906 में सावरकर ने इंग्लैंड में 1906 में "फ्री इंडिया सोसाइटी" का गठन किया।
यह सोसाइटी इटली के राष्ट्रवादी कान्तिकारी नेता ज्यूसेपे मेत्सिनी के विचारों पर काम करती यही और उन्हें अपना आदर्श मानती थी। इसके साथ इस सोसाइटी द्वारा इंग्लैंड में रहते हुए सभी भारतीय मेले और त्यौहार मनाये जाते थे। इन त्योहारों में आजादी की लड़ाई लड़ने वाले फ़रिस्तों को याद किया जाता था।
वीर सावरकर की किताब " द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ द इंडियन"| Veer Savarkar's book "The History of the War of the Indian"
सावरकर जी शिवाजी द्वारा चलाई गई गोरिला युद्ध प्रणाली से बहुत प्रभावित थे उन्होंने मित्र मेलों में अपने दोस्तों के साथ गगोरीला युद्ध प्रणाली का अभ्यास भी किया था। इसके साथ उन्होंने 1857 की भारत की आजादी की लड़ाई का गहनता से अध्ययन किया था। वे 1857 की आजादी की लड़ाई के कारणों और परिणामों की व्याख्या दोस्तों और क्रांतिकारियों
के बीच में करना चाहते थे।
इसलिए उन्होंने एक किताब लिख डाली जिसका नाम " द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ द इंडियन" इंडिपेंडेंस रखा गया था। इस किताब ने ब्रिटिश सरकार की चिंताएं बढ़ा दी थी इसके पीछे कारण ये था कि अंग्रेजों को इस बात का डर था कि अगर " द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ द इंडियन" का विमोचन किया गया तो भारत में फिर से क्रांति की आग लग सकती है इसलिए इस किताब को उस वक्त भारत में प्रसारित नहीं किया गया और प्रतिबंध गला दिया बया। ये बात अलग है कि ये किताब उनके दोस्तों में बहुत प्रचलित हुई।
वीर सावरकर का जेल सफर, और काले पानी की सजा | Veer Savarkar's Jail Journey, and the Punishment of Black Water
इंग्लैंड से जब सावरकर भारत वापिस आये तो उस वक्त “इंडियन कॉउन्सिल एक्ट 1909” का विरोध जोरो पर था। इसलिए उन्होंने भी इस एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। प्रदर्शन करने के आरोप में सावरकर को दोषी पाया गया।
अंग्रेजी सरकार उनकी क्रन्तिकारी गतिविधियों से पहले ही परिचित थी इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए अभियान चलाया पर वे बच के पेरिस निकल गए सन 1910 में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। उस बाद उन्हें मुंबई स्थनांतरित किया गया।
उस वक्त जो भी ब्रिटिश सरकार के लिए एक मुसीबत और टेढ़ी खीर साबित होती थी उसे अंडमान निकोबार द्वीप समूह में स्थित काळा पानी की सजा सुनाई जाती थी निश्चय ही सावरकर अंग्रेजो के लिए डेढ़ी खीर थे इसलिए उन्हें काळा पानी की सजा 4 जुलाई 1911 को दी गई जहां उन्हें सेल्यूलर जेल में बंद कर दिया।
वीर सावरकर और सैल्यूलर जेल का सफर | Veer Savarkar's journey to cellular jail
इस जेल में उन्हें भारी प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। सावरकर इस जेल में इतनी यातनायें दी गई जिसका अगर कोई वृतांत सुने तो उनके रोंगटे खड़े हो जाएँ पर देश के लिए लड़ते हुए उन्होंने हार नहीं मानी। इस जेल में सावरकर अप्रैल 1911 से मई 1921 तक रहे जो दस साल की सजा थी।
इस बात के लिए आज भी भारतीय संसद में सवाल पूछा गया था कि क्या सावरकर ने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी या नहीं ? कुछ लोगों का मन्ना है है कि वीर सावरकर ने अंग्रेजों को एक माफीनामा भेजा था जिसमें उन्होंने ये लिखा था कि अगर अंग्रेजी सरकार उन्हें छोड़ दे तो वे अंग्रेजी सरकार के खिलाफ कोई भी आंदोलन नहीं करेंगे। सावरकर का ये माफीनामा आज भी भारत में सवाल बना हुआ है। पर हम आपको बता दें हाल ही में केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रहलाद पटेल ने इस बात का खंडन करते हुए ये कहा था कि अंडमान और निकोबार प्रशासन के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो कि सावरकर ने अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी थी या नहीं।
उनके शब्दों " जिस तरह की जानकारी अंडमान और निकोबार प्रशासन के आर्ट एंड कल्चर विभाग से मिली है उसके मुताबिक़ सेल्युलर जेल में रहते किसी तरह की दया याचिका देने का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है जिससे इस बात की पुष्टि हो की उन्होंने माफ़ी मांगी थी या नहीं." असल में बात ये है की सावरकर के जीवन को एक राजनीति से जोड़ लिया गया है। भारतीय जनता पार्टी उन्हें "भारत रतन" से सुसज्जित करना चाहती है पर दूसरी और दूसरी पार्टियां उन्हें इस पुरस्कार के काबिल नहीं समझती है। सच्च क्या है यह एक राजनितिक विषय बन चूका है।
वीर सावरकर ने किया था जेल में पुस्तकालय का निर्माण | Veer Savarkar built a library in jail
वीर सावरकर का जेल के बाद का सफर | Veer Savarkar's Journey After Jail
वीर सावरकर 6 जनवरी सन 1924 में दस साल बाद काले पानी की सजा से रिहा हो गये। रिहा होने के बाद उन्होंने रत्नागिरी हिंदू सभा के निर्माण में अपनी एक अलग भूमिका निभाई। वे जेल के आने के बाद टूटे नहीं थे अपर रिहा होने के बाद भी हिन्दू महासभा का निर्माण किया जिसका उदेश्य भारत की संस्कृति और विरासत को आगे लेकर जाना था।
हिंदू सभा का निर्माण मदन मोहन मालवीय ने 1915 में किया था। सावरकर की छवि और देश प्रेम की भावना को देखते हुए उन्हें हिन्दू सभा का अध्यक्ष बना दिया गया। जिन्हा ने ये बयान दिया कि कांग्रेस पार्टी अब एक हिन्दू पार्टी बन चुकी है। धीरे धीरे सावरकर की लोकप्रियता बढ़ती गई।
इस बात में सच्चाई है कि वे भारत को एक हिंदुत्व की ओर लाना चाहते थे पर उनका ये कहना था कि सच्चा हिन्दू वह जो देश की अखंडता को बनाये रखने में में अपना सहयोग दे। वे इस बात पर भी विश्वास करते थे आजादी की लड़ाई, एक लड़ाई है और इसमें हिंसा और अहिंसा का कोई स्थान नहीं है। ये बात कभी- कभी आम जीवन में भी सच्ची लगती है, जब तक छोटा बच्चा रोता नहीं है उसकी मां भी उसे दूध नहीं पिलाती है। इस लिए उनका कहना भी ये था कि आजादी की लड़ाई के लिए अंग्रेजों से लड़ना पड़ेगा।
पर दूसरी तरफ महात्मा गाँधी का कहना था कि आजादी की लड़ाई के लिए हिंसा जरूरी नहीं है। महात्मा गाँधी डिप्लोमेटिक तरिके से भारत को आजादी दिलाना चाहते थे। हालंकि भारत छोड़ो आंदोलन में महात्मा गाँधी ने "करो या मरो" का नारा जरूर दिया था पर लाल बहादुर शास्त्री ने उसे भी "मरो और मारो में" बदल दिया था। जब देश का वँटवारा हुआ तब भी वीर सावरकर ये कभी नहीं चाहते थे कि देश की अखंडता को कोई आंच पहुंचे और भारत पाकिस्तान दो देश बने। कुल मिलाकर बात करें तो वीर सावरकर महात्मा गाँधी के विचारों के समर्थक नहीं विरोधक थे।
क्या वीर सावरकर अन्य धर्मों के विरुद्ध थे ? | Was Veer Savarkar against other religions?
कुछ लोगों का कहना है कि वीर सावरकर अन्य धर्मों के दुशमन थे पर उनके विचारों से ये साफ पता चलता था कि वे किसी धर्म विरुद्ध नहीं थे। हिन्दू धर्म के पाखंडवाद के भी खिलाफ थे वे मानते थे असली हिन्दू वह है जो अपनी मातृ भूमि के लिए जिये और मरे। हाँ, वे इस बात का खंडन जरूर करते थे कि ईसाई धर्म की जो धर्मांतरण की नीति है वाह गलत है।
वे सभी ग्रंथों का अध्ययन करते थे पर धर्म के नाम जो गलत भावना और देश के प्रति जो गलत सोच रखता हो उसके बिलकुल विरुद्ध थे। राष्ट्र प्रेम को लेकर वे मुसलमान धर्म के भी कभी खिलाफ नहीं बोले पर मुग़ल शासकों द्वारा किये गए अत्या चारों का वे खंडन करते थे और देश को एकता के सूत्र में बांधना चाहते थे।
वीर सावरकर की मृत्यु | Veer Savarkar's Death | वीर सावरकर की मृत्यु कैसे हुई थी ?
सावरकर ने अपनी मृत्यु से पहले एक लेख लिखा था और ये लेख 1964 में में लिखा गया था जिस लेख का शीर्षक था 'आत्महत्या या आत्मसमर्पण' था। उन्होंने लेख में उन्होंने हत्या और आत्म समर्पण दोनों में अंतर समझाते हुए ये कहा था कि आत्मा दाह और आत्म समर्पण होता है और वे आत्मसर्पण कर रहे थे। इसका अर्थ ये था कि उन्होंने आत्मसमर्पण और इच्छा मृत्यु का निर्णय कर लिया था। उन्होंने सभी से ये बात साफ कर दी थी कि उन्होंने अपनी मृत्यु तक उपवास का पर्ण और निश्चय कर लिया है इसलिए तब तक वे अन्नाज, अन्न को हाथ नहीं लगाएंगे जब तक वे मृत्यु को आत्म समर्पण नहीं कर देते हैं।
उन्होंने ये बात बिलजुल साफ की थी कि इसे आत्म हत्या नहीं आत्म समर्पण समझा जाये और ऐसा करना सभी का हक्क है। 1 फरवरी 1966 को सावरकर ने ये घोसना की और अपने प्रण पर अडिग रहे उन्हें कुछ नेताओं ने समझाने की कोशिश भी की पर वे नहीं मने आखिरकार 26 फरवरी 1966 में देश का वीर सपूत इस दुनिया को अलविदा कह गया।
वीर सावरकरी के कुछ अज्ञात तथ्य | Some unknown Facts about Veer Savarkar in Hindi
- इस बात को लोग बहुत काम जानते होंगे कि हमारे देश का जो तिरंगा है उसमें अशोक चक्र लगाने का सुझाव किस ने दिया था तो वे वीर सावरकर ही थे।
- वे पहले क्रांतिकारी थे जिन्होने देश से अस्पृश्यता जैसी खतरनाक बीमारी से लड़ने के लिए देश में आंदोलन किया था।
- इसे भी आप कम ही जानते होंगे कि वे एक कवी भी थे जिन्होंने जेल में रहते हुए कोयले की कलम पर लोहे की किलों की कलमें बनाकर कवितायें लिखी थी।
- 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857" उन्होंने जो किताब लिखी थी वह भारत में कभी भी प्रकाशित नहीं हुई क्योकि अंग्रेज उनसे डर गए थे कि इस किताब से देश में दूसरी आजदी की लड़ाई का आगाज न हो।
- वे एक ऐसे वीर योद्धा थे जिन्होंने देश के लिए दो बार जेल की सजाओं का सामना किया था।
- ये बात भी आप कम ही जानते होंगे कि वे स्नातक तो थे पर एक क्रांतिकारी होने की वजह से उनकी स्नातक की डिग्री अंग्रेजी सरकार द्वारा वापिस ले ली गई थी।
- वैसे तो सभी ये मानते हैं कि देश में विदेशी वस्त्रों का वहिष्कार महात्मा गाँधी द्वारा किया गया था पर हम आपको बता दें वीर सावरकर देश के ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने वस्त्रों की होली जलाई थी महत्मा गाँधी जी ने ये होली 22 अगस्त 1921 में जलाई थी और वीर सावरकर ने 1905 के बंग भंग के विरोध में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी।
- क्या आप ये भी जानते हैं कि उन्होंने इंग्लैंड में रहते वे हुए इस बात से इंकार कर दिया कि वे इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादार रहेंगे।