शेरशाह सूरी का नाम इतिहास में सम्मान से लिया जाता है क्योंकि भारत पर राज करने वाले विदेशी शासकों में से शेरशाह सूरी के शासकों में गिना जाता है जिसने भारत वर्ष को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था सूरी के शासनकाल में नागरिक सुविधाओं और यातायात के साधनों का काफी विकास हुआ था जिसके कारण विदेशी शासक देने के बावजूद उसे जनता का निमंत्रण था शेरशाह सूरी ने सुल्तान के शासनकाल में शेरशाह सूरी के दादा इब्राहिम खान सुर अपने पुत्र हसन खान सूर्य के साथ अफगानिस्तान से भारत आए थे उनके पिता आशीष जौनपुर राज्य के अंतर्गत सासाराम के शेरशाह सूरी का जन्म 1486 में हुआ था।
शेरशाह सूरी अपनी वीरता अदम्य साहस और परिश्रम के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा जमाने में सफल हुआ था। आइये हिंदी पुकार में जानते हैं शेरशाह सूरी के जीवन परिचय और इतिहास के बारे में।
| शेरशाह सूरी बायोग्राफी |
शेरशाह सूरी का जीवन परिचय | Sher Shah Suri Biography
- शेरशाह सूरी का जन्म तारीख --- सन 1486
- शेरशाह सूरी का जन्म स्थान --- भारत, सासाराम बिहार प्रान्त
- शेरशाह सूरी के पिता का नाम --- मियन हसन खान सूर
- माता जी का नाम --- हसन खान
- बचपन का नाम --- फरीद खान
- शेरशाह सूरी का राज्य भिषेक कब हुआ---1540 में
- कितने साल शासन किया --- 16 साल
- पत्नी का नाम --- रानी शाह
- बच्चों का नाम --- इस्लाम शाह सूरी, आदिल खान
- दादा जी का नाम --- इब्राहिम खान सूरी
- धर्म --- इस्लाम धर्म
- किस साम्राज्य की स्थापना की --- सूरी साम्राज्य की।
- शेरशाह सूरी की मृत्यु :- शेरशाह सूरी की मृत्यु आज के भारत के बुंदेलखंड क्षेत्र के कालिंजरनामक जिले में 22 मई 1545 को हुई थी। उनकी मौत का कारण युद्ध था अर्थात जब वे कालिंजर किले में चंदेल राजपूतों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे तो इस लड़ाई को जीतने के लिए उन्होंने अपने आग्नेयास्त्र नामक तोप से किले को उड़ाने की कोशिश की थी पर दुर्भाग्य तोप का गोला वहीँ पर फट गया और वे जख्मी हो गए और उनकी मृत्यु हो गई।
शेरशाह सूरी का इतिहास | History of Sher Shah Suri
जब शेरशाह सूरी का जन्म हुआ तो बचपन से उनका नाम शेहशाह सूरी नहीं था। उनके पिता जी ने उनका नाम बचपन में फरीदखांन रखा था। उनके बचपन के बारे में ऐसा माना जाता है कि उनका बचपन बहुत की संघर्ष भरा रहा था। अगर शेरशाह सूरी के परिवार में उनके दादा जी की बात करें तो उनके दादा जी इब्राहिम खान सूरी नारनौल नामक स्थान पर एक जागीदार के रूप में कार्यरत थे। पिता जी का नाम मियन हसन खान सूर था जिसने कुछ इतिहास में इतना नाम नहीं कमाया था जितना शेरशाह सूरी ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम चमकाया।
ऐसा माना जाता है की उनके पिता जी की आठ पत्नियां थी। आठ पत्नियों के चलते उनको बचपन से ही अपनी सौतेली मां का प्यार नहीं मिला था इसलिए उन्होंने बचपन से पिता जी के साथ नाराज होकर अपना घर छोड़ दिया था। अपना घर छोड़ने की पीछे इतिहास कर एक ये भी कारण मानते हैं कि वे अपने घर में रहकर पढ़ाई करना चाहते थे पर उनकी सौतेली माताओं का व्यवहार उनके साथ ठीक नहीं था और फरीद खान ने घर से निकर कर अपने भविष्य की बात अपने मन में लाई।
शेरशाह सूरी की शिक्षा | Education of Sher Shah Suri
शेरशाह सूरी के बचपन में ही उनके सौतेली माता के गलत व्ववहार करके उन्नोतोदर परिस्थितियां पैदा हो गई थी। घर की ख़राब हालत के चलते उनके अंदर एक खोखला पन सा पैदा हो गया था। इसी खोखलेपन को लेकर उन्होंने अपनी पढ़ाई या शिक्षा का सफर जौनपुर में पूरी करने का फैसला लिया। उन्होंने महज 22 साल की उम्र में जौनपुर में इस्लामिक शिक्षा और अरबी शिक्षा में अपना अध्ययन शुरू किया। इस्लामिक शिक्षा के साथ साथ उन्होंने अपना इतिहास और कविताओं के अध्यययन पर भी जोर दिया। तो अगर उनकी शिक्षा की बात करें तो उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा जौनपुर में ही पूरी की थी।
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शेरशाह सूरी को "शेरशाह" की उपाधि | Sher Shah Suri got the title of "Sher Shah"
लगभग 1522 की बात है शेरशाह सूरी ने अपनी पढ़ाई पूरी की और घर के मुहाल को देखते हुए अपने घर को छोड़ने का फैसला कर लिया था। उन्होंने पहली सेवा बिहार के अफगान शासक बहार ख़ाँ लोहानी के वहां निभाना शुरू की। बहार खान ने उन्हें सहायक के रूप में नियुक्त किया था। उन्होंने बहार ख़ाँ लोहानी के घर अच्छा काम किया और इसके लिए उन्हें बहार ख़ाँ लोहानी ने अपने बेटे का शिक्षक भी नियुक्त किया था।
ऐसा
माना जाता है
बचपन से शेरशाह
सूरी का शरीर
बहुत मजबूत और
सुडोल था। एक
दिन की बात
है फरीद खान
जंगल में बिना
किसी के जा
रहे थे। जंगल
में उनका टकराव
एक शेर से
हो गया। बचपन
में ही में
उन्होंने एक
ही तलवार के
वार से शेर
को मौत के
घाट उतार दिया
था। इस बहादुरी
के लिए उनके
सरदार बहार ख़ाँ
लोहानी ने उन्हें
"शेरशाह" की उपाधि
से नवाजा था।
शेरशाह सूरी के राज्य भिषेक में मतभेद और सासाराम छोड़ने का फैसला | Differences in Sher Shah Suri's coronation and decision to leave Sasaram
घर
में
जागीरदारी के
चलते
को
चलते
शेरशाह
सूरी
को
बचपन
में
फ़रगना
का
क्षेत्र दिया
गया
था।
उनकी
सौतेले
भाई
का
नाम
सुलेमान था।
शेरशाह
सूरी
और
सुलेमान के
बीच
हमेशा
की
जागीरदारी के
चलते
हुए
आपस
में
मतभेद
रहता
था।
इसी
के
चलते
उनके
परिवार
में
मतभेद
और
भी
तेज
हो
गया।
शेरशाह
ने
इसी
को
लेकर
अफगान
शासक
बहार
ख़ाँ
लोहानी
के
वहां
काम
करना
शुरू
कर
दिया
था।
इतिहास कर
ऐसा
मानते
हैं
कि
जब
शेरशाह
सूरी
बहार
ख़ाँ
लोहानी
के
वहां
काम
करता
था
उसने
काफी
सुधार
किया
था।
उन्होंने कृषि
में
सुधार
किये
थे।
शेरशाह
सूरी
के
कुशल
प्रशासन की
वजह
से
ही
शोतेले
भाई
और
सौतली
माता
उनसे
जलने
लगे।
शेरशाह
सूरी
ने
सासाराम भी
छोड़ने
का
फैसला
लिया
और
आगरा
की
और
रवाना
हो
गया।
1520 ईसवी में
उनके पिता जी
की मृत्यु हो
गई। इसी बीच
शेरशाह सूरी ने
अपने सभी सगे
संबंधियों से
ये अनुरोध किया
कि उसे बड़े
पुत्र होने के
कारण पिता जी
का उत्तराधिकारी नियुक्त
किया जाये। हुआ
भी ऐसा ही
दौलत खान लोधी
ने उसकी वकालत
की और उसे
सासाराम का
उत्तराधिकारी नियुक्त
किया गया। पर
सूरी ने जब
आकर देखा तो
उसके भाई सुलेमान
ने जागीरदारी का
आपस में बंटवारा
कर लिया था।
इससे शेरशाह सूरी
बहुत नाराज हुआ
और उसने सासाराम
छोड़ने का फैसला
कर लिया और
वह भार खान
के दरवार में
एक सहायक के
रूप में नियुक्त
किया गया।
भारत
में
सूरी
साम्राज्य की
स्थापना और
विकास
"सुर
वंश"
के
अफगान
पठान
शेरशाह
सूरी
ने
1540 ईस्वी
में
किया
था।
सूरी
लेकर
1557 ईसवी
तक
रहा।
सूरी
साम्राज्य के
विस्तार के
लिए
शेरशाह
सूरी
ने
बंगाल
से
अफगानों को
खदेड़ा
और
इसके
साथ
भारत
में
उन्होंने मुगलों
का
भी
सफाया
किया
था।
शेरशाह
सूरी
ने
1540 में
मुगलों
का
भारत
से
पूरी
तरह
से
सफाया
करने
के
बाद
ही
भारत
में
सूरी
साम्राज्य की
स्थापना की
थी।
उन्होंने अपने
साम्रज्य के
विस्तार के
लिए
बंगाल,
मालवा,
पश्चिमी राजपूताना, मुल्तान और
उत्तरी
सिंध
को
अपने
साम्राज्य में
जोड़
लिया
था।
शेरशाह
सूरी ने अपने
सूरी साम्राज्य में
कई काम किये।
भारत में आज
की ग्रैंड ट्रंक
रोड और भारतीय
पोस्टल सेवायें उनकी
ही देन है।
शेरशाह का दूसरा
पुत्र जलाल खाँ
उसका उत्ताराधिकारी हुआ।
22 मई 1545 को शेरशाह
सूरी का देहांत
हो गया और
उसके देहांत के
बाद सूरी साम्राज्य
का अंत होना
निश्चित था
क्योकि शेरशाह सूरी
के दुशमन अफगान
और मुग़ल दोनों
थे। बाबर को
जब शेरशाह सूरी
की मौत का
पता चला तो
उसने उसी वक्त
दिल्ली पर कब्ज़ा
कर लिया। और
सूरी साम्राज्य के
अंतिम शासक को
हेमू ने हरा
दिया और चारों
तरफ से सूरी
साम्राज्य घिरने
के बाद इस
साम्राज्य का
लगभग 1557 में अंत
हो गया।
शेर शाह सूरी के शासनकाल में किये गए विकास कार्य | प्रशासन
शेरशाह सूरी ने अपने शासन काल में विकास कार्य तब से शुरू कर दिए थे। जब वे बहार ख़ाँ लोहानी कके दरवार में काम करते थे। पर उनके शासन काल के उन कार्यों को आज भी यद् किया जाता है जब उन्होंने अपने शासन काल में सूरी वंश की स्थापना के बाद किये थे आईये जानते हैं उनके विकास कार्यों के बारे में।
- इतिहास कार कहते है जब शेरशाह सूरी राज किया करते थे तो शेर और बकरी भी इकठे पानी पिया करते थे अर्थात उनके शासन काल में न्याय व्यवस्था बहुत अच्छी थी।
- शेरशाह सूरी ने अपने शासन काल में मुद्रा की एक इकाई का प्रचलन किया था जिसका नाम रुपया था आज भी भारत समेत और अन्य देशों में जैसे पाकिस्तान, मलेशिया बांग्लादेश आदि देशों में मुद्रा की ये ही इकाई का प्रचलन हैं।
- उन्होंने भारत में दूरसंचार व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पोस्टल सिस्टम में सुधार किये जो भारत में आज भी उसी शासक की देन है।
- शेरशाह सूरी ने अपने विकास कार्यों में दुसंचार के साथ सड़क निर्माण कार्यों पर भी जोर दिया और भारत में ग्रैंड ट्रंक रोड जैसी विशाल सड़क का निर्माण करवाया जो आज भी भारत के पंजाब से लेकर दिल्ली होकर अफगानिस्तान तक जाती है।
- जब उन्होंने मुग़ल शशकों का भारत से खत्म किया था उसके बाद उन्होंने भारत में धर्म के नाम पर जो भी लोग भरष्टचार करते थे उनपर पूरी तरह से नियंत्रण किया।
- शेरशाह सूरी के शासन काल में सरकार लगभग एक तिहाई लगान के रूप में वसूल करती थी जो वह विकास के काम के लिए प्रयोग में लाता था।
चौसा के युद्ध के बारे में आपसे बात करेंगे और शेरशाह के बीच में हुआ था आप आइए जानते हैं इसका क्या परिणाम सामने हुमायूं का प्रबंधन शत्रु शेरखान बंगाल में विजय के बाद हुमायूं निश्चिंत होकर आराम करने लगा क्योंकि उसके आराम करने के शेरशाह सूरी ने चुनार, बनारस, जौनपुर, कन्नौज और पटना इत्यादि पर अधिकार कर लिया इससे हुमाऊं विचलित हो गया।
मलेरिया के प्रकोप से हुमायूं की सेना कमजोर पड़ गई थी आगरा के लिए कूच कर गया वापस लौटने की सूचना पाकर शेर खान उर्फ शेरशाह ने मार्ग में ही हुमायूं को घेरने का निश्चय किया अनेक गलतियां की सबसे पहले उसने अपनी सेना को दो भागों में बांट दिया था सेना की एक टुकड़ी दिलावर खान के अधीन मुंगेर यारी बिहार पर आक्रमण करने को भेजी गई थी खेड़ा की दूसरी टुकड़ी के साथ हुमाऊं खुद आगे बढ़कर शेरशाह का सामना केने लगा।
उनके सलाहकारों ने सलाह दिया था कि वह गंगा के उत्तरी किनारे से चलता हुआ जौनपुर पहुंचे और गंगा पार करके शेरशाह , शेर खा पर हमला करें परंतु उसने उन लोगों की बात नहीं मानी वह गंगा पार कर 10 मार्च से ग्रैंड ट्रंक रोड से चलाइए शेर खा के नियंत्रण में था दो हाल बाद बरसात के मौसम में शुरू हुए आक्रमण की योजना बनाई गई। 15 जून को शेरशाह सूरी ने हुमाऊं पर आक्रमण कर दिया शेरशाह सूरी ने हुमाऊं के खेमे में खलबली मचा दी। शेरशाह सूरी ने हुमाऊं की सेना में खलबली मचा दी और हुमाऊं ने भी अपनी जान बचाई।