भारत में कई सफल शासक हुए है जिन्होंने भारत में का अच्छी शासन प्रणाली लाई। भारत में मुग़लों ने भी कई साल शासन किया। पर आज हम बात करेंगे एक ऐसे शेर की जिसे मैसूर का टाइगर भी कहा जाता है। उन्होंने अर्थवयवस्था में कई सुधार लाये। इसके इलावा वे एक ऐसे शेर थे जिनके जीते जी कोई भी मैसूर की तरफ आंख उठा कर नहीं देख सका जी आज हम बात करेंगे मैसूर के राजा टीपू सुलतान की जीवनी और इतिहास की तो आएं शुरू करते हैं।
टीपू सुल्तान जीवन परिचय | इतिहास | जीवनी | जन्म | परिवार | शिक्षा | प्रशासन | आर्थिक नीतियां | धार्मिक नीति | लड़ाइयां | तलवार का इतिहास | तथ्य |
टीपू सुल्तान का जीवन परिचय | Biography of Tipu Sultan in Hindi
- टीपू सुल्तान का पूरा नाम --- सुल्तान सईद वाल्शारीफ़ फ़तह अली खान बहादुर साहब टीपू
- जन्म तारीख --- 20 नवंबर सन 1750
- जन्म स्थान --- देवनहल्ली, आज के समय में बेंगलौर, कर्नाटका भारत का राज्य
- टीपू सुल्तान की शासन अवधि --- 10 दिसम्बर 1782 – 4 मई 1799
- टीपू का राज्याभिषेक की तारीख --- 29 दिसम्बर 1782
- पिता का नाम --- हैदर अली
- माता का नाम --- फ़ातिमा फख्र – उन – निसा
- किस नाम से प्रसिद्ध --- मैसूर साम्राज्य के शासक के रूप में
- टीपू का उपनाम या लोकप्रिय नाम --- मैसूर टाइगर
- टीपू की राष्ट्रीयता --- भारतीय
- टीपू सुल्तान का धर्म --- इस्लाम धर्म, सुन्नी समुदाय
- पत्नी का नाम --- सिंध सुल्तान
- मृत्यु की तारीख --- 4 मई सन 1799
- मृत्यु स्थान (tipu Sultan ki mrityu kis sthan pr hui) --- श्रीरंगपट्टनम, आज के समय में कर्नाटका
- टीपू सुल्तान के भाई का नाम --- अब्दुल करीम
- टीपू सुल्तान की मृत्यु कितनी उम्र में हुई --- 48 साल में
टीपू सुलतान का जन्म भारत के कर्नाटका राज्य में हुआ था। उनका जन्म कर्नाटका के बैंगलोर के ग्रामीण जिले 20 नवंबर 1750 में हुआ था। जहां पर उनका जन्म हुए उसका नाम देवनहल्ली था और आज यह स्थान ग्रामीण जिले के अधीन आता है। उनके पिता का नाम हैदर अली था और वे भारत के दक्षिण में जो मैसूर साम्राज्य था उनके एक सेना के अफसर थे। टीपू सुलतान की माता का नाम फ़ातिमा फख्र – उन – निसा था। टीपू सुल्तान ने अपने पिता जी की इच्छा से सिंध सुल्तान से शादी की थी। टीपू सुलतान के पिता जी उन्हें जन्म के बाद आर्कोट की एक दरगाह में ले गए जहां पर उनका नाम टीपू सुलतान रखा गया।
टीपू सुलतान की शिक्षा दीक्षा, बचपन और आरंभिक जिंदगी | Tipu Sultan's education initiation and Early Life
टीपू
सुल्तान के
पिता
जी
उसको
एक
कुशल
शासक
और
अच्छी
शिक्षा
दीक्षा
देना
चाहते
थे।
वे
एक
शासक
के
बेटे
थे
इसलिए
उन्हें
किसी
स्कूल
में
भेजना
और
पढ़ाई
करवाना
तो
दूर
की
बात
थी
इसलिए
टीपू
सुलतान
के
पिता
हैदर
अली
ने
उनकी
शिक्षा
के
लिए
योग्य
शिक्षकों को
चुनाव
किया
और
उन्हें
टीपू
सुलतान
की
शिक्षा
के
लिए
होने
महल
में
ही
नियुक्त किया।
टीपू
सुलतान
उन्हें
पढ़ाई
के
साथ
एक
अच्छा
योद्धा
भी
बंनाना
चाहते
थे
इसलिए
हैदर
अली
ने
एक
अध्यापक टीपू
सुल्तान की
तलवार
बाजी
के
लिए
भी
नियुक्त किया
था।
और
फुरसत
के
समय
उनके
पिता
उन्हें
अपने
आप
भी
तलवार
बाज़ी
की
शिक्षा
देते
थे।
टीपू
सुलतान
ने
अपनी
प्रारंभिक शिक्षा
इस्लामी, उर्दू
भाषा
में,
कन्नड़
भाषा
में,
न्यायशास्त्र, निशानेबाजी और
तीरंदाज़ी में
प्राप्त की।
1761 में
हैदर
अली
सैन्य
अधिकारी से
मैसूर
के
राजा
बन
गए
इसलिए
उनकी
प्रारम्भिक शिक्षा
के
बाद
हैदर
ने
उन्हें
और
भी
योग्य
बनने
की
शिक्षा
अपने
आप
देनी
शुरू
कर
दी।
टीपू
सुलतान
के
पिता
हैदर
अली
के
फ़्राँसीसियों के
साथ
अच्छे
संबंध
थे
इसलिए
उन्होंने टीपू
सुल्तान को
रणनीति
सिखाने
के
लिए
उनके
पिता
फ्रांसीसी अधकारियों के
साथ
ज्यादा
लगाव
रखते
थे।
ब्रिटश
मैसूर
को
हथियाना चाहते
थे।
टीपू
सुलतान
के
बचपन
के
पराक्रम को
देखकर
टीपू
सुल्तान के
पिता
जी
ने
प्रथम
मैसूर
युद्ध
में
अंग्रेजों के
खिलाफ
होने
वाले
युद्ध
में
अपने
बेटे
को
अपने
साथ
लिया।
जब
वे मैसूर की
पहली लड़ाई में
अपने पिता जी
साथ गए तब
टीपू सुल्तान की
उम्र मात्र 16 साल
थी। उन्होंने ब्रिटिश
आर्मी के चने
चबा दिए थे।
टीपू सुलतान बचपन
से घुड़सवारी में
निपुण थे इसलिए
उन्होंने कर्नाटका
में हुए पहले
युद्ध में घुड़सवारी
की कमान अपने
आप संभाली। कद
में छोटे होने
के साथ वे
एक अच्छे योद्धा
साबित हुए और
अपना नाम उन्होंने
पहले युद्ध में
आगे किया।
टीपू सुल्तान का प्रशासन या साम्राज्य (Tipu Sultan's administration or empire)
साम्राज्य में एक कुशल जल सेना का निर्माण | Building an efficient navy
टीपू सुलतान ने अपने पिता जी की आज्ञा से एक कुशल जल सेना के निर्माण का फैसला किया और इस सेना में 72 तोपों के 20 युद्धपोत और 65 तोपों के 20 युद्धपोत शामिल किये गए। 1790 में उन्होंने कमालुद्दीन को अपना मीर बहार नियुक्त किया और जलालाबाद में बड़े डाकयार्ड स्थापित किये। उनकी जल सेना में दो बड़े जहाजों को शामिल किया गया था और उनमे 30 एडमिरलों की नियुक्ति की गई थी।
उन्होंने बोर्ड ऑफ एडमिरल्टी की स्थापना की और इसका कार्यभार मीर यम को दिया मीर यम ने बेहतर काम करते हुए टीपू सुलतान की सेना में 11 कमांडर शामिल किये थे। टीपू सुल्तान कहीं कहीं वेहम भी करते थे उन्होंने जहाजों में तांबे के बर्तन use करने के लिए वाध्य किया उनका मानना था कि ऐसा करने से जहाजों की लंबी उम्र होती है।
साम्राज्य में टीपू सुलतान की आर्थिक नीतियां | Economic policies of Tipu sultan
टीपू
सुलतान
मैसूर
को
भारत
की
एक
आर्थिक
शक्ति
के
रूप
में
सामने
लाना
चाहते
थे।
उन्होंने अपने
पिता
जी
के
साथ
मिलकर
मैसूर
के
लिए
एक
महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की
शुरुआत
की
जिसका
मकसद
मैसूर
का
आर्थिक
विकास
करना
था।
उन्होंने अपने
साम्रज्य में
आर्थिक
नीति
को
इतना
मजबूत
किया
कि
उस
वक्त
की
बंगाल
जैसी
सबसे
बड़ी
अर्थी
शक्ति
को
भी
पीछे
छोड़
दिया।
उनके
शासन
काल
में
कपड़ा
उद्योग
स्थापित किये
गए
और
कृषि
के
उत्पादन बढ़ाने
के
लिए
प्रयास
किये
गए।
उनके
शासन
काल
में
पर
व्यक्ति औसत
आये
निर्वाह आये
से
पांच
गुना
अधिक
थी।
टीपू सुलतान ने कावेरी नदी पर कन्नमबाड़ी बांध के निर्माण के लिए शुरुआत की जिसे आज कृष्ण राजा सागर के नाम से जाना जाता है और भारत के कर्नाटका में स्थित है। पर उसे पूरा नहीं कर पाए बाद में भारत सरकार ने इसे 1938 में में बनाया था। अगर रेशम उद्योग की बात करें तो रेशम उद्योग की शुरुआत भी सुलतान के समय शुरू किया गया था। उनके शासन काल में व्यक्ति की प्रति माह व्यक्ति आये ब्रिटिश सरकार से ज्यादा थी।
टीपू
सुलतान
का
अपना
धर्म
मुसलमान था
और
मुस्लिम धर्म
के
लिए
उन्होंने बहुत
प्रचार
किया।
उन्होंने जगह
जगह
मस्जिदें बनवाई।
पर
कुछ
नीतियां उनकी
ऐसी
थी
जो
धर्म
विरोधी
थी
और
हिन्दू
धर्म
के
कही
न
कहीं
खिलाफ
थी।
प्
कुछ
लोग
उन्हें
हिन्दू
धर्म
मुस्लिम धर्म
और
ईसाई
धर्म
के
लिए
मसीहा
मानते
हैं।
असहिष्णुता के
प्रमाण
के
भी
उनके
धार्मिक विचारों में
देखने
को
मिलता
है।
दक्षिण
में
उन्होंने गिरजा
घरों
का
कहीं
न
कहीं
विनास
किया
था।
वे मुस्लिम धर्म में भी सुनी समुदाय के मुसलमान थे। एक कट्टर मुसलमान होने के बाबजूद वे एक दानी के रूप में सामने आये थे उन्होंने हिन्दू धर्म को और मंदिरों को कई तोहफे भी दिए थे श्रीरंगपट्टण के श्रीरंगम जिसे रंगनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है उन्होंने सात चांदी के कप दान के रूप में दिए थे। मेलकोट में सोने और चांदी के बर्तन जो हैं वे इस बात के प्रमाण हैं कि उन्होंने उन्हें भी भेंट किया था। ननजद्गुड़ के श्री कांतेश्वर मंदिर है वह टीपू का दिया हुआ एक रत्न जड़ित कप है। शिव जी की उपासन के लिए उन्होंने एक शिव लिंग भी भेंट किया था जो अभी ननजुदेश्वर मंदिर में विराजमान है।
Recommended Posts :--
👉👉 मुग़ल शासक अकबर का इतिहास और जीवन परिचय
👉👉 मुग़ल शासक बाबर का इतिहास और जीवन परिचय
👉👉 शेरशाह सूरी का जीवन परिचय और इतिहास
👉👉 कारोबारी बिलगेट्स का जीवन परिचय और कारोबार
टीपू सुलतान द्वारा लड़ी गई लड़ाइयां | Battles fought by Tipu Sultan
Second Anglo-Mysore War | मैसूर का दूसरा युद्ध
टीपू
सुलतान
के
फ्रांसीसियों के
साथ
अच्छे
संबंध
थे
टीपू
सुलतान
ने
माहे
एक
जो
बन्दर
गाह
तह
उसे
अपने
कब्जे
में
रखा
हुआ
था।
पर
1779 में
अंग्रेजों ने
इस
बंदरगाह पर
अपना
कब्ज़ा
कर
लिया।
इसका
बाला
लेने
के
लिए
हैदर
अली
ने
अपने
पुत्र
को
अंग्रेजो का
साथ
लड़ने
के
लिए
भेजा।
इस
लड़ाई
में
पोलिलूर का
युद्ध
कहा
जाता
था
में
टीपू
सुलतान
ने
बेली
को
निर्णायक रूप
से
पराजित
का
दिया
था।
दिसंबर
1781 में
टीपू
सुलतान
ने
तंजौर
के
पास
अन्नागुडी में
कर्नल
ब्रेथवेट को
बुरी
तरह
से
हरा
दिया
था।
उनको
पता
था
कि
ब्रिटिश उनके
लिए
एक
खतरा
बन
रहे
थे
इसलिए
उन्होंने ब्रिटिशर की
सभी
बंदूकें जब्त
कर
ली
और
कई
सेनिको
को
बंदी
बना
लिया।
इस
युद्ध
के
बाद
टीपू
सुलतान
ने
एक
नए
अनुभव
को
ग्रहण
किया
था।
इस
लड़ाई के बाद
ही टीपू सुलतान
रविवार, 22 दिसंबर 1782 को
वे मैसूर के
शासक बने। इस
लड़ाई के बाद
उन्होंने अपने
मराठों और मुग़लों
के साथ ाचे
संबंध रखे और
अंग्रेजों की
नीतियों के
खिलाफ काम किया।
दूसरे मैसूर युद्ध
की समाप्ति 1784 में
मैंगलोर की
संधि के साथ
हुई जो टीपू
सुलतान और अंग्रेजों
के बीच हुई
थी।
टीपू सुलतान द्वारा लड़ी गई तीसरी लड़ाई | 1790-92
दूसरे युद्ध के बाद जो अंग्रेजो और टीपू सुलतान के बीच संधि हुई वह संधि अंग्रेजों और टीपू सुल्तान के बीच विवाद सुखझाने के लिए काफी नहीं थी। इसके पीछे कारण था दक्षिण में अपने अधिपत्य को स्थापित करना। अंग्रेजों का एक सहयोगी था जिसका नाम त्रावणकोर था पर टीपू ने आक्रमण कर दिया त्रावणकोर एक बड़ा व्यापारी था। अंग्रेजों के आक्रमण को देखते हुए टीपू सुलतान ने भी अंग्रेजो पर आक्रमण कर दिया। टीपू सुल्तान की शक्ति को देखते हुए मराठों ने भी टीपू का साथ छोड़ दिया और अंग्रेजो का साथ दिया।
1790 में मैसूर की तीसरी लड़ाई हुई और इसमें टीपू सुल्तान ने जनरल मीडोज़ के नेतृत्त्व में ब्रिटिश सेना को हार का सामना करना पड़ा। 1791 में लॉर्ड कार्नवालिस ने कार्नवालिस ने इस युद्ध का कार्य भार संभाला और अपने सैन्य बल को मजबूत किया। टीपू सुल्तान ने इस युद्ध में अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया पर वह जीत न सका। वर्ष 1792 में श्रीरंगपटनम की संधि के साथ युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि के बाद टीपू सुल्तान का बर्चस्व दक्षिणी भारत में लगभग कम हो गया।
टीपू सुल्तान द्वारा लड़ी गई चौथी मैसूर की लड़ाई (1792-99)
टीपू सुल्तान की तलवार का इतिहास | History of Tipu Sultan's Sword
अक्सर ये सवाल पूछे जाते हैं कि टीपू सुल्तान की तलवार का भार कितना था। और उनकी तलवार की चीज की बनी हुई थी तो हम बता दें टीपू सुलतान की तलवार स्टील की बनी हुई थी और इस तलवार का बजन 7 किलो 400 ग्राम है। उनकी तलवार रत्न जड़ित सोने की बनी हुई थी अंग्रेजो और टीपू सुलतान के बीच संघर्ष ख़त्म होने के बाद अंग्रेजों ने नीलाम घर बॉनहैम्स में टीपू सुलतान की तलवार सहित 30 चीजों को नीलाम किया था।
इन सभी चीजों की कीमत लगभग 60 लाख पाउंड थी जो भारत के 56 करोड़ रुपए बनते हैं। 30 चीजों में सबसे कीमती टीपू सुल्तान की तलवार थी जो लगभग भारतीय 21 करोड़ रुपए में नीलाम हुई है।
Some interesting Facts about Tipu Sultan in Hindi | टीपू सुल्तान से जुड़े कुछ अनसुने तथ्य
- टीपू सुल्तान जब मात्र 15 साल के थे जब उन्होंने अपने पिता के साथ युद्ध में भाग लिया।
- क्या आप जानते हैं कि बचपन में वे अपने मित्र के साथ जंगल में जा रहे थे और उनका सामना एक शेर से हुआ और उस शेर को उन्होंने मार दिया था उसके बाद उनका नाम मैसूर का टाइगर का नाम से जाना जाने लगा।
- ये भी आप कम ही जानते होने कि वे एक अंगूठी पहनते थे जिस पर राम लिखा था और उनकी मौत के बाद उसे अंग्रेज अपने साथ ले गए और नीलाम कर दिया गया।
- टीपू सुलतान को तोपों का राजा या मिसाइल मैंन भी कहा जाता है क्योंकि उनके पास बहुत बड़ी तोपें थी।
- टीपू सुल्तान को भरतीय जल सेना का जन्म दत्ता भी कहा जाता है।
- क्या आप जानते है कि टीपू सुल्तान की कब्र कहां पर स्थित है तो ये गुम्बज़-इ-शाही, श्रीरंगपटना, गंजम में बनी हुई है।
- टीपू सुल्तान ने एक किले का निर्माण करवाया था जो पालक्काड टाउन के मध्य भाग में स्थित है और जिसे 1766 में बनवाया गया था।