क्रांतिकारी खुदी राम बोस जीवन परिचय, इतिहास, क्रांतिकारी जीवन, फांसी | Khudi Ram Bose biography | History in Hindi

भारत के कुछ ऐसे क्रांतकारी थे जिनका नाम सुनकर ब्रिटिश सरकार के दिल में खौफ पैदा हो जाता था ऐसे ही क्रांतकारी थे देश के युवा क्रन्तिकारी खुदी राम बोस जिन्होंने 15 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए परचम लहराया था। वे देश के सच्चे देश भक्त थे। गरीब परिवार में पले खुदी राम बोस एक ऐसे क्रांतकारी थे जिहोने अंग्रेजो के नाक में दम कर रखा था अगर बलभ बही पटेल को लौह पुरुष कहा जाता है तो उन्हें एक अग्नि पुरुष के नाम से जाना जाता है। आइये आज "हिंदी पुकार" में नजर डालते हैं खुदी राम बोस के जीवन, उनके परिवार, क्रांतकारी गतविधियों और सम्पूर्ण इतिहास पर।

     

खुदी राम बोस का परिचय | जन्म | परिवार | शिक्षा | क्रन्तिकारी जीवन | इतिहास | मृत्यु

               

खुदी राम बोस का परिचय | Biogarphy of Khudi Ram Bose

 

1. खुदी राम का पूरा नाम (Full Name) ---- खुदीराम बोस

2. जन्म तारीख ( Date of Birthday)
---- 3 दिसंबर, 1889

3 . जन्म स्थान (Birth Place)
---- हबीबपुर, मिदनापुर ज़िला, पश्चिमी बंगाल

4 . पिता का नाम (Father Name)
---- त्रैलोक्य नाथ बोस

5.  माता का नाम (Mother Name)
---- लक्ष्मीप्रिया देवी

6. जाने जाते है
---- क्रन्तिकारी के रूप में

7.  मृत्यु की तारीख (Death of Death)
---- 11 अगस्त, 1908

8.  खुदी राम को कहां फांसी कहां दी गई?
---- मुज्जफर पुर जेल बिहार में

9. फांसी के समय उम्र
---- 18 साल, आठ महीने, 18 दिन

 


खुदीराम बोस का जन्म और परिवार | Birth and Family of Khudiram Bose

 

महान क्रन्तिकारी खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर सन 1889 ईसवी.को बंगाल प्रेसीडेंसी के मेदिनीपुर जिले में हबीबपुर नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक कायस्थ परिवार परिवार में हुआ था। हिन्दू ग्रन्थ के अनुसार पुराणों के अनुसार कायस्थ हिन्दू धर्म की ऐसी जाति है जिन्हे क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों ही वर्ण धारण करने का अधिकार है इस लिए खुदीराम बोस एक क्षत्रिय थे और सच्चे ब्राह्मण भी थे। उनके पिता जी का नाम त्रैलोक्यनाथ बोस था जो पेशे से एक तहसीलदार थे।

 

उनकी माता जी का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था जो एक धार्मिक और निष्ठावान स्त्री थी। उनके माता पिता का देहांत तब हुआ था जब खुदी राम बोस छोटे थे और उसके बाद उनकी बहन अपरमा राय ने किया था। खुदीराम तीन बहने थी और वे चौथे बेटे थे। त्रैलोक्यनाथ बोस और लक्ष्मीप्रिया देवी के दो बेटे और थे जिनकी मौत जन्म से पहले हो गई थी। उनकी माता जी का देहांत तब हो गया था जब वे 6 वर्ष के थे और उनके पिता जी का देहांत तब हुआ था जब वे सात साल के थे। 

 


खुदीराम राम बोस का नाम खुदीराम कैसे पड़ा ? | How did Khudiram Ram Bose get the name Khudiram ?


हम सभी जानते हैं कि पहले भारत में पारंपरिक रीति-रिवाजों का प्रचलन ज्यादा था। उस समय ये परम्परा थी कि जब बच्चा नवजात होता था तो उसे तीन मुठी अनाज देकर खरीद लिया जाता था जिसे खुदी का नाम दिया जाता था। ऐसा उस नवजात बच्चे की सलामती के लिए किया जाता था। ये शिशु के अच्छे जीवन के लिए टोटके का काम करता था। 

 

खुदी राम के दो भाई जन्म से पहले मर चुके थे इसलिए जब उनका जन्म नया तब उनकी बहन ने उन्हें तीन मुठी अनाज देकर अपने पिता त्रैल्योकनाथ बसु से खरीद लिया था। ये जो खुदी दी गई थी उसी के नाम से उनका नाम उनके नाम के साथ "खुदी" शब्द जुड़ गया था।


 

खुदीराम बोस की शिक्षा | Education of Khudiram Bose


ये हम पहले ही बता चुके हैं कि खुदी राम बोस जब छोटे थे तो उनके माता पिता का देहांत हो गया था इसके बाद उनकी बड़ी बहन जो उनसे बड़ी थी जिसका नाम अनुपमा राय था उन्हें अपने साथ लेकर आई थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा के लिए उनकी बहन ने उनका दाखिला हेमिल्टन स्कूल में करवाया था। पर खुदी राम बोस के अंदर तो देश के लिए लड़ने का जज्बा भरा हुआ था। इसलिए उन्होंने अपनी शिक्षा के दौरान क्रन्तिकारी गतिविवधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। देश के लिए पर मिटने की कसम खा कर उन्होंने 9 क्लास में अपनी पढ़ाई छोड़ दी और उसके बाद वे एक क्रन्तिकारी बन गए।

 


खुदीराम बोस का क्रन्तिकारी जीवन | Revolutionary Life of Khudiram Bose

भारत में आजादी से लड़ने के लिए1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस नामक संस्था का निर्माण हो चुका था। खुदी राम बोस 1857 की आजादी की लड़ाई से प्रेरित थे और मात्र 15 साल की उम्र में वे स्वयंसेवक बन गए। उस वक्त खुदी राम बोस ने ये फैसला किया कि वे देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर देंगे।इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वे 15 साल से पहले देश के लिए स्वयंसेवक का काम करते थे पर 15 साल की उम्र में उन्होंने ये निश्चय कर लिया था कि वे ब्रिटिश क्रूर शासन को उखाड़ फेंकेंगे।


  

सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ पोस्टर बाँटना शुरू किये। ये काम उनके द्वारा गुप्त रूप में किया जाता था इसके पीछे कारण ये था कि अंग्रेजी सरकार ने देश के क्रांतिकारियों के पीछे अंग्रेज गुप्तचर लगाए होते थे जो भारत के क्रांतिकारियों पर कड़ी नजर रखते थे। खुदीराम बोस जो पोस्टर बांटते थे उनमे स्वराज की बातें लिखी होती थी। इस काम के लिए उन्हें एक बार गिरफ्तार भी किया गया पर वे छोटे थे इसलिए उनके ऊपर एक छोटे से जुर्म के लिए कोई एक्शन नहीं लिया गया।


अगर हम अरविंदो घोस की बात करें तो उन्हें धर्म गुरु, क्रांतिकारी और आजादी का मसीहा भी कहा जाता था उन्होंने अपने लेखो से देश के अंदर क्रांति ले थी। खुदीराम बोस अरविंदो घोस की शिक्षाओं से प्रीरित थे। 1902 - 03 में देश के अंदर अंग्रेजों के खिलाफ रोष बढ़ता जा रहा था। अरविंदो घोष देश की आजादी के लिए काम कर रहे थे इसकिये खुदी राम बोस ने भी उनके संपर्क में आकर देश के लिए लड़ने का संकल्प लिया। अब खुदीराम बोस के अंदर देश की आजादी के लिए इतनी ललक पैदा हो चुकी थी की वे हर आंदोलन और जनसभाओं में शामिल होते थे।


 

अरविंदो घोस ही नहीं पूरा क्रन्तिकारी वर्ग 1905 के बंग- भंग से परेशान था उन्होंने इसके विरोध में प्रदर्शन किये। उन्होंने वीर सावरकर के साथ मिलकर विदेशी कपड़ों को जलाने में सहयोग दिया। अब खुदी राम बोस बंदेमातरम नामक पत्रिकायें बांटते थे। अंग्रेजी की नजर अब खुदी राम बोस पर सटीक थी। वे इस्तिहार बाँटने के साथ - साथ क्रांति कारियों को जागृत भी करते थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें इस जुर्म में दो बार गिरफ्तार कर लिया था कि ये एक देश द्रोह है उन्हें 2006 दो बार में इस मामले में गिरफ्तार किया गया। मामला इतना सख्त होने के कारण उन्हें दोनों बार छोड़ दिया गया था। एक बार तो वे 12 मई 2006 को वे पुलिस को चकमा देकर भाग भी निकले थे पर 16 मई को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।


Read More :- 


👉👉 सुभाष चंद्र बोस का जीवन परिचय और क्रांति में योगदान 

👉👉 सुखदेव थापर का जीवन परिचय 

👉👉 क्रांतिकारी राजगुरु का जीवन परिचय 


 


क्यों की गई किंग्जफोर्ड को मारने की योजना ?  | Why was the plan to kill Kingsford made?


 

हर किस के मन में ये सवाल होता है कि किंग्जफोर्ड को मरने की योजना क्यों बनाई गई थी तो इसके पीछे दो कारण थे पहला ये कि उस वक्त बांग्लादेश में एक जुगांतर अखबार देश हित के लिए माना जाता था है आज भी ये न्यूज़ पेपर काम कर रहा है। जुगांतर अख़बार हमेशा स्वराज की बातों को लेकर अपने लेख लिखा करता था और ब्रिटिश सरकार इस अख़बार के लेखों से परेशान थी इसलिए किंग्जफोर्ड ने इस अखबार पर प्रतिबंध लगा दिया था। 

 

ब्रिटश पुलिस इस अखबार से जुड़े सभी लोगों को जेल में बंद कर रही थी। क्रन्तिकारी ब्रिटिश फैसले से नाखुश थे। दूसरा कारण ये था कि बंग -भंग के विरोध में सारे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे लाखों लोगों ने इसमें भाग लिया था। किंग्जफोर्ड जो कलकत्ता के चीफ मेजिस्ट्रेट थे आंदोलन करियों को क्रूर दंड दिया था इसलिए कुड़ी राम बोस और उनके दोस्त ने ये फैसला किया कि कि ऐसा फैसला करने वाले को जड़ से उखाड़ देंगे।

 

किंग्जफोर्ड को मारने की पूरी योजना



हम आपको बता दें कि किंग्सफोर्ड को मारने का पहला प्रयास हेमचंद्र द्वारा निर्मित पुस्तक बम के रूप में किया गया था। पर वे बच निकले थे। इसके बाद उन्हें तरक्की दी गई और उन्हें बिहार मुजफ्फर नगर का जिला न्याय धीश नियुक्त किया गया। पर खुदी राम बोस और उनके साथियों ने एक दल बनाया था जिसका नाम टोह दल था मुजफरनगर बिहार का दौरा किया और हालत का जायजा लिया। मुज्जफरनगर में बम प्लांट करने के लिए खुदी राम बोस और प्रफुल चक्की को चुना गया इसके पीछे कारण ये था कि दोनों ही बम बनाना जानते थे और बम प्लांट करना भी जानते थे। उन्होंने पहले दो सप्ताह तक तो उस जगह का दौरा किया जिस जगह पर बम प्लांट करना था।

 

पहले वे दोनों स्कूल के विद्यार्थी के रूप में वहां का दौरा किया करते थे पुलिस उनपर पूरी नजर बनाये हुए थी। पुलिस से बचने के लिए दोनों ने अपने नाम बदल लिए थे खुदी राम बोस ने अपना नाम हरेन सरकार चुना था और प्रफुल चक्की थे उन्होंने अपना नाम दिनेश कुमार राय। किसी को नहीं पता था कि ये दो बालक क्या करने वाले हैं। 

 


कहां हुई गलती किंग्जफोर्ड को मारने की पूरी योजना में ? Where did the mistake go in the whole plan to kill Kingsford?

 


दोनों खुदी राम बोस और प्रफुल पटेल ने 29, 1908 को उस जगह का दौरा किया जहां पर उन्होंने बम फेंकना था। उस वक्त किंग्जफोर्ड के एक अच्छे दोस्त थे जिनका नाम प्रिंगल कैनेडी था और वे बेरिस्टर थे। किंग्जफोर्ड और प्रिंगल कैनेडी दोनों किंग्जफोर्ड के घर या फॉर्म हॉउस में विराजमान थे। प्लानिंग के मुताबिक किंग्जफोर्ड की जो घोडा गाड़ी थी उस पर बम फेंका जाना था। 30 अप्रैल 1930 को लगभग आठ वजे का समय था और अप्रैल में आठ वजे अँधेरा हो जाता है।



प्रफुल पटेल और खुदी राम बोस दोनों ने किंग्जफोर्ड की घोडा गाड़ी पर बम फेंका पर गलती से बम प्रिंगल कैनेडी के वाहन पर लग गया और इसमें प्रिंगल कैनेडी और उनकी बेटी का देहांत हो गया। इसलिए होती है की दोनों की बग्गी एक जैसी होती है। हालाँकि दोनों क्रांतिकारिओं को इस बात का अंदाजा नहीं था कि इसमें उनका परिवार भी शामिल है। चारों तरफ अफरा तफरी का मोहाल बन गया और दोनों क्रांतिकारियों को पकड़ने की धर पकड़ शुरू हो गई।


 

खुदी राम बोस और प्रफुल चाकी कैसे पकड़े गए ? | How were Khudi Ram Bose and Praful Chaki caught?


 

पुलिस ने सक के तोर पर दोनों को गिफ्तार करने का अपना अभ्यान शुरू किया दोना पेडल ही भाग रहे थे उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। खुदी राम बोस तो दूसरे दिन 1 को पकडे गए जब उनको फतेह सिंह और सियो प्रसाद सिंह ने पुलिस स्टेशन के सामने पकड़ लिया। अब उनका जीवन ब्रिटिश सरकार के हाथों लिखा जाना था। दूसरी और प्रफुल चक्की भी भाग रहे थे और बचने का प्रयास कर रहे थे। पर उनको एक क्रन्तिकारी मिलते हैं जिनका नाम था त्रिगुणा चरण घोस वे भी एक क्रन्तिकारी थे वे उन्हें पहचान लेते हैं और उन्हें अपने घर ले जाते हैं।

 

त्रिगुणा चरण घोस ने उन्हें अच्छे तरह से ट्रीट किया और उन्हें समस्तीपुर से हावड़ा की ट्रैन को पकड़ने का फैसला किया। एक बार प्रफुल चाकी से फिर गलती हुई जब उन्होंने ट्रैन में बैठ के नन्द लाल बनर्जी से बात शुरू कर दी। नन्द लाल बनर्जी ब्रिटिश सरकार में एक इंस्पेक्टर थे उन्होंने बात - बात में प्रफुल पटेल से ये उगलवा लिया कि बम विस्फोट में उनका हाथ है। नन्द लाल बनर्जी पुलिस को खबर कर देते हैं। अगले स्टेशन पर पुलिस की गिरफ्त में जाते हैं पर वे फिर एक बार भागने में कामयाब हो जाते हैं। प्रफुल चाकी को इस बात का अंदेशा था उनकी हालत बुरी होगी इसलिए उन्होने अपने आप को गोली मर ली। 



खुदी राम बोस को सजा का वृतांत | Death | Story of the punishment of Khudi Ram Bose)


 

खुदी राम बोस की पहली सुनवाई 21 मई 1908 में हुई। खुदी राम बोस को वकील मिले और उन्होंने उन्हें बचने के लिए बहुत प्रयास किये। 23 मई को खुदीराम ने मजिस्ट्रेट ईडब्ल्यू ब्रेडहोड को अपना बयान फिर से सौंप दिया, जिसमें बमबारी के लिए पूरे मिशन और ऑपरेशन के किसी भी पहलू या चरण में किसी भी तरह की भागीदारी या जिम्मेदारी से इनकार किया गया था। शुरुआत में खुदीराम इस बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार नहीं थे लेकिन अपने वकीलों के समझाने के बाद उन्होंने ऐसा किया।

 

8 जुलाई 1908 में दूसरी सुनवाई शुरू हुई और उसने उन्हें दोषी पाया गया। उनकी फांसी की सजा 11 अगस्त 1908 निश्चित की गई। खुदी राम को जब कोर्ट ट्रायल में होते थे तो उनक दोस्त क्रन्तिकारी अंग्रेजी सरकार को ये चिठ्ठी लिखते थे कि वे खुदी राम बोस को छोड़ दें पर ऐसा कुछ नहीं था। जब उनको फांसी की सजा सुनाई गई तो जज ने उनसे एक सवाल पूछा था कि आप कुछ बोलना चाहते हैं तो उन्होंने अपने हस्ते हुए चेहरे से ये कहा की अगर आपको बम बनाना आता है अगर नहीं तो मैं सीखा सकता हूँ। 11 अगस्त सन 1908 को देश के क्रन्तिकारी को फांसी दी गई और वे हँसते हँसते फांसी पर चढ़ गये। उन्होंने ये सन्देश दिया कि मेरे जैसे हजारों क्रांतकारी पैदा हों।


निष्कर्ष :- खुदी राम बोस के जीवन परिचय से हिंदी पुकार इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि आज का युवा किसी भी के भी गुलाम नहीं है आप इनके जीवन परिचय से अंदाजा लगा सकते हैं आज देश अगर गुलाम होता तो खुदी राम बोस जैसा 18 साल का लड़का देश के लिए क्या करता। 

 

आज के युवा को जरूरत है कि जो देश हमारे क्रांतिकारियों ने आजाद करवाया है उसे एकता के सूत्र में बांध के रखे, जरूरत है देश में जाति,धर्म और नशे जैसी ख़तरनाक बिमारियों से लड़ने की। अगर आप भारत के लिए इतना करते हो तो भारत को एक महान शक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता है और खुदी राम बोस के सपनो को साकार किया जा सकता है।


ये भी पढ़े :-- 


Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

Please Select Embedded Mode To Show The Comment System.*

और नया पुराने