भारतीय किसान के बारे में जानकारी | Information about Indian Farmer in Hindi

भारतीय किसान पर निबंध :-  | स्पीच 

हम सभी जानते हैं देश की अर्थव्यवस्था चलाने के लिए सभी का योगदान जरूरी है। अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक दूकानदार का सहयोग होता है, एक शिक्षक का सहयोग होता है, एक डॉक्टर, एक चालक, एक नेता का भी सहयोग होता है। हर कोई अपनी जगह सुचारु रूप से काम करता है तो ही एक अर्थव्यवस्था का संचालन होता है। पर जो एक देश को अन्न देता है लोगों का पेट भरता है उसका सहयोग एक अर्थव्यवस्था के लिए ही नहीं समूचे समाज के लिए जरूरी होता है।

अगर मेहनत की बात करें तो किसान को मेहनत के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता है और मेहनत के बावजूद भी उसे कई बार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। आज हम किसान के ऊपर एक लेख लिख रहे हैं जो सभी के लिए दिलचस्प और पढ़ना जरूरी है ताकि आपके सामने एक किसान की छवि सामने आ सके।

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अगर हम एक बच्चे को पढ़ने वाले अध्यापक की बात करें तो उसे अध्यापक या गुरु जी के नाम से जाना जाता है, अगर एक बीमारी का इलाज करने वाले की बात करें तो उसे एक डॉक्टर कहा जाता है। पर मैं एक किसान हूँ मुझे अलग - अलग नाम दिए गए हैं हालाँकि काम मेरा एक ही है वह है एक देश के लिए भर पेट भोजन का उत्पादन करना।


मुझे आज नहीं पहले से ही कभी बंधुआ मजदूर, देहाती किसान, फार्मर, खेतिहर, भूमिपुत्र या फिर सदियों से जागीदारों का गुलाम भी कहा जा सकता है। मेरी गुलामी मेरी काम में निहित है मैं रोज उठ कर अपने खेत से प्यार करता हूँ पर मुझे इतने नामों से क्यों जाना जाता है क्या इसके पीछे कहीं मेरी जी तोड़ मेहनत का परिणाम तो नहीं।


क्या है मेरा अतीत?



अब किसान ये सोचता है कि क्या मेरा अतीत सही था क्या मेरी हालत ये आज ही है या फिर पहले में एक वह किसान था जिसे दूसरों का पेट भर के भी अपने परिवार का भरण पोषण आराम से करने को मिलता था। तो यह सोचकर मैं कहता हूँ मेरी आज ये हालत नहीं है पर मेरी मेहनत का सदियों से शोषण होता आया है। अगर आप मेरा इतिहास देखोगे तो मुझे पहले से ही नजर अंदाज किया गया। प्राचीन समय में मुझे बंधुआ किसान के नाम से जाना जाता था।


इस नाम से आप पता लगा सकते है कि में उस वक्त कितना आजाद था। बंधुआ का अर्थ होता है किसी बंधन में रहकर काम करना। बात चाहे मध्ययुग की हो या फिर आधुनिक युग की में एक ऐसा मेहनती व्यक्ति रहा हूँ जिसे अपनी मेहनत को बेचने के लिए दूसरों के आगे हमेशा ही झुकना पड़ा है। अत्तीत की बात छोड़ो आज आधुनिक युग में भी में वह जीवन वसर कर रहा हूँ।

 

क्या आप मेरे और अन्य लोगों में अंतर कर सकते हैं ?


मैं एक किसान हूँ, हर कोई मानव जाति के लिए अपनी भूमिका निभाता है उसमें वह एक बात जरूर सोचता है कि मेने मानव जाति के लिए ये किया है। एक डॉक्टर होता है वह भी मानव जाति के लिए काम करता है और उन्हें इस बात से सराहा जाता है कि एक डॉक्टर ने इस अस्पताल के लिए बहुत सराहनीय काम किया है।

एक अध्यापक होता है जब उसका बच्चा कामयाब हो जाता है तो हर कोई ये बात ही कहता है कि ये बच्चा उस अध्यापक से पढ़ा हुआ है। इसी तरह जब कोई खिलाडी होता है तो वह भी मेहनत करता है और उसे अपनी मेहनत का फल मिलता है चाहे बाद में मिले पर बाद में उसे भी अपनी जीवका चलाने के लिए ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ता है।


मैं एक किसान हूँ में किसी की निंदा नहीं करता हूँ पर में ये बात कहना चाहता हूँ कि जब भी कोई काम करता है या फिर मेहनत करता है तो उसे हर क्षेत्र में सराहा जाता जाता है और उन्हें मैडल से नवाजा जाता है। पर आज तक मेरे पास एक ही मैडल है वह है मेरा खेत जो मुझे प्यार करता है और जब में सोता हूँ तो वह खेत मुछे बार बार बुलाता रहता है और कहता है जब तू इस खेत में मेहनत नहीं करेगा तुझे कुछ नहीं मिलने वाला।


क्या है मेरी छत?


मैं एक किसान हूं, हर किसी का एक ही सपना होता है कि वह किसी आलीशान घर में रहे और अपनी ख़ुशी भरी जिंदगी वयतीत करे। अगर आप मेरी जिंदगी और और और की जिंदगी या रहने सहन में अंतर देखोगे को आपको यह सही रूप से पता चल जायेगा कि औरों की छत अर्थात घरों में और मेरे घर में कितना अंतर है। जब भी सुबह होती है तो सूरज निकलने से पहले में खेत में होता हूँ और सूर्य की चिचिलाती धुप का स्वागत करता हूँ।

सूर्य न निकले तो बादल का इन्तजार करता हूँ की बारिश आये। जब अधिक धुप होती है तो मैं उस वक्त भी सूर्य देवता का धन्यवाद करता हूँ और उस मेरी एक ही छत होती है नीला आसमान, पर जब बारिश हो तो में अंदर से खुश हो जाता हूँ कि इंद्र देव मेरे ऊपर मेहरवान हुए हैं और अब मेरी खेती अच्छी होगी।


पर उस वक्त भी जब इंद्र देव खुश न होकर मेरे ऊपर नाराज हो जाते हैं और अपना प्रकोप दिखाते हैं तो में अपनी आखों से अपने खेतों की फसल को पानी मैं डूबता हुए देखता हूँ। उस वक्त मेरे पास किसी की कोई सहायता नहीं होती है और में उन्हीं खेतों को अपना घर समझता हूँ और उसी को आना आलीशान बंगला। मेरी छत एक नीला आसमान मुझे देवों की बस्ती से क्या ?

मैं एक किसान मेरा संगी साथी कौन ?


हाँ मैं एक किसान हूँ मैं हर वक्त देखता हूँ एक सहपाठी अपने मित्र सहपाठी के साथ स्कूल जाता है और उसके सहपाठी अन्य सहपाठियों के साथ मिलकर अपनी शिक्षा ग्रहण करते हैं। एक ड्राइवर के साथ पूरी बस उसके साथ उनके साथी के रूप में अपना सहयोग करते हैं। मैं एक किसान हूँ और मेरे दोस्त हैं एक हल, दो बेलों की जोड़ी, वे मेरे किसान के कपडे और वे खेत जो मुझे ही नहीं सभी लोगों को दो वक्त का भोजन देते हैं।


खेती चाहे किसी भी किस्म की हो मैं हमेशा ही इस बात से खुश होता हूँ की मेरे वे साथी मेरे साथ हैं जो 24 घंटे में से 10 घंटे मेरे साथ रहते हैं। इसके इलावा अगर मुझे दो वक्त की रोटी मिल जाये तो उससे में खुश रहता हूँ। मेरा, मेरे किसानी कपड़ों, मेरे बेलों और मेरी हल के साथ इतना प्यार है कि इसे कोई तोड़ नहीं सकता है। 

मेरे दो बेलों की जोड़ी मुझे काम करने की एनर्जी देती है और मेरे फटे पुराने कपडे मेरी लोगों से पहचान करवाते हैं हैं कि मैं एक किसान हूँ और मानव जाति के लिए काम करता हूँ। मुझे अपने दोस्तों पर गर्व है।

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मैं एक भारतीय किसान मेरे में समाज में क्या है अंतर ?




हाँ ये मैं मानता हूँ कि समाज में अंतर पाया जाता है कोई कम आमिर हो कोई ज्यादा गरीब हैं आज किसान में अंतर बहुत ज्यादा हो गया है मैं एक देश का अन्न दाता हूँ और देश को अन्न प्रदान करता हूँ पर आज मेरे समाज में इतना अंतर आ गया है की मेरे ही समाज में कुछ मेरे ऐसे मित्र भी हैं जिन्हे खाने के लिए दो वक्त का खाना नहीं मिलता है।


मैं एक किसान हूँ, मेरी मित्र किसान ऐसे भी हैं जिसके पास 2 हेक्टेयर से भी कम भूमि है और उनका पूरा परिवार उसी पर निर्भर है। मैं भी वही किसान हूँ जिसे दो वक्त की रोटी के लिए तरसना पड़ता है। कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि मैं जो खा रहा हूँ वह मैं अपने बच्चों के लिए रख लूँ पर काम से जाने से पहले मुझे कुछ निवाला लेना पड़ता है। मैं एक खतिहार किसान हूँ मुझे उन भागों में बांटा गया है जैसे गरीब इंसान जिसे दो वक्त का खाना भी नहीं मिलता, मैं वह भी किसान हूँ जिसे मध्य वर्गीय किसान कहते हैं जिसके पास 5 हेक्टयर से ज्यादा भूमि है और मैं दो वक्त का खाना तो खाता हूँ पर कभी भी अपने बच्चों को डॉक्टर नहीं बना सकता हूँ।


हाँ में वह भी किसान हूँ जिसके पास भूमि तो 10 हेक्टेयर से ज्यादा है पर मैं भी कभी - कभी सरकार की नीतियों और कुदरत के केहर का शिकार हो जाता हूँ और एक समय ऐसा भी आता है कि मुझे भी भूखा रहना पड़ता है। हाँ मैं एक किसान हूँ मेरे समाज मैं अंतर है और इस अंतर की वजह से मुझे सँभालने वाला मैं खुद ही हूँ।


मैं एक भारतीय किसान आंदोलन करना मेरा हक़ है तो क्या है उसकी छवि ?


हाँ मैं ये सोचता हूँ कि हर कोई अपने हक़ के लिए लड़ता है हमारे पिता जी कहा करते थे बेटा जायज के लिए लड़ना सीखो और अपना हक लेना सीखो। जब तक एक बच्चा रोता नहीं है उसे भी उसकी मां दूध नहीं पिलाती है। किसानी हकों को लेकर मेने अपनी जिंदगी में संघर्ष भी किये हैं आंदोलन भी किये हैं। पर इस बात का आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उन आंदोलनों का आज भी क्या असर हुआ है जब से मैं अस्तित्व में आया हूँ तब से लेकर आज तक मेरे लिए कोई कड़े और संतोषजनक कानून नहीं बने हैं अगर बने भी हैं तो उन्हें सही रूप से लागु नहीं किया गया है।


मेने भारत मैं ही नहीं पर भारत से बाहर भी आंदोलन किये हैं जिससे पुरे विश्व में किसान आराम की जिंदगी और शाशन रहित जिंदगी जी सके पर इसके कोई भी परिणाम नहीं निकले हैं। मैं अपने हक के लिए लड़ता तो हूँ पर कभी मैं अपने हक के लिए लड़ते लड़ते लड़ते किसी ऐसी राजनीति में फंस जाता हूँ कि मुझे अपना हक़ नहीं मिलता है। राजनितिक सोच रखने वाले व्यक्ति एक छोटे और मेहनती किसान की मेहनत के बारे में न सोच कर, उसका गलत फायदा उठाते हैं। मेरा एक भारतीय किसानों से ये ही विनम्र निवेदन है कि कभी गलत गलत राजनीतिक छवि वाले इंसान के हाथ न चढ़ें।

मैं एक किसान कब होता है मुझे दुःख ?


वैसे तो मेरे दुखों की बात करें तो वे काम नहीं हैं, कम जमींन कम कमाई का दुःख, ज्यादा जमींन गलत नीतियों का दुःख और अगर कहीं फसल निकली भी है तो उस फसल का उचित दाम न मिलने का दुःख। इसके इलावा में भी कभी कभी बड़ी बड़ी पर्टियों में जाता हूँ ताकि अपने समाज को देख सकूँ। हालाँकि मेरे पास इतने शान और शौकत के कपडे नहीं होते है जिससे मैं बड़े लोगों के समाज में जा सकूँ। पर कभी जाता भी हूँ तो खाना खाते इस बात का गर्व होता है कि जो भी लोग खाना खा रहे हैं उस में मेरा सहयोग है।

पर मुझे दुःख इस बात का होता है कि जब कुछ आमिर लोग उसी खाने की बेकद्री करते हैं और खाने का आदर नहीं करते हैं क्या वही खाना किसी और के काम नहीं आ सकता है। मैं इस बात को मानता हूँ कि उनमे कुछ कमियां हैं पर इससे जायदा दुःख मुझे तब होता है जब एक मध्य वर्ग का किसान या फिर गरीब किसान कुछ बड़े किसानों को देखकर अपनी सामाजिक पहचान के लिए अपनी खेती के टुकड़े को बेच देता है जिससे वह खेतिहीन हो जाता है। मेरा दोनो ही वर्ग से निवेदन है की इस में सुधार करें।


निष्कर्ष:-

मेरे इस लेख में मेरे लिए कहने के लिए शब्द नहीं हैं अर्थात कहने को तो बहुत कुछ है पर मैं निष्कर्ष में ये ही कहूंगा कि एक किसान होते हुए अपनी खेती से प्यार करें मेहनत करते रहें और अपने हक़ के लिए लड़ना सीखें। किसी का बुरा न सोचें अपने काम से काम रखें और परिस्थितियां चाहे किसी भी हों उनका सामना करना सीखें मेरा आप से ये ही निवेदन है। धन्यवाद।

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

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