Babur Biography and History in Hindi :-
भारत में मुगलों ने 1526 से लेकर 1707 तक शासन किया। भारत में पहले मुग़ल शासक का नाम बाबर था। उन्हें भारत में मुग़ल वंश का संस्थापक भी माना जाता है। उन्होंने बाबर ने 1504 ई॰ में काबुल और 1507 ई॰ में क़ंधार को जीता इस जीत के बाद ही उन्होंने बादशाह की उपाधि धारण की थी। बाबर का इतिहास भारत में पढ़ने योग्य है और रोचक भी है। आइये नजर डालते हैं बाबर के जीवन परिचय और बाबर के इतिहास पर।
मुग़ल शासक बाबर का जीवन परिचय | इतिहास | जन्म | परिवार | भारत आगमन | लड़ी गई लड़ाइयाँ | मृत्यु |
Babar Biography in Hindi | मुग़ल शासक बाबर का जीवन परिच
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जन्म स्थान |
मध्य एशिया, उज़्बेकिस्तान |
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जन्म तारीख |
24 फरवरी सन 1483 |
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पिता जी का नाम |
शेख मिर्जा |
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माता जी का नाम |
कुतलुग निगार
खानम |
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बाबर की
पत्नियां |
आठ |
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पत्नियों के नाम |
आयशा सुल्तान, जैनब सुल्तान मासूमा सुल्तान, महम सुल्तान,गुलरुख, बेगम, दिलदार, मुबारका, बेगा बेगम |
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कुल बेटे |
चार (हुमायूँ ,कामरान , असकरी , हिंदाल) |
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कुल बेटियां |
चार (गुलजार
बेगम, गुलरंग,गुलबदन और गुलबर्ग) |
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धर्म |
मुस्लिम |
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बाबर की भारत
में शासन अवधि |
मुग़ल शासक बाबर
ने भारत में कुल चार साल 1526-1530 तक शासन किया। |
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बाबर के भारत
में प्रतिद्व्न्दी |
अफगान और राजपूत |
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बाबर ने भारत
में मुग़ल शासन की स्थापना कब की ? |
बाबर भारत में 1526 में पधारा और उसने भारत में मुग़ल वंश
की स्थापना की। जब उसने मुग़ल वंश की स्थापना की तब अघिकतर मुसलमान तुर्क और सुनी
समुदाय के थे। पर उसका शासन जयादा समय नहीं चला और भारत में चार साल तक शासन
करने के बाद उसके शासन का अंत हो गया। |
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बाबर की मृत्यु
की तारीख |
26 दिसम्बर 1530 |
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मृत्यु के समय
बाबर की उम्र |
48 वर्ष |
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बाबर की मृत्यु
कहाँ हुई थी? | बाबर का मृत्यु स्थान |
भारत, आगरा राजस्थान |
Babur History in Hindi :-
बाबर का जन्म परिवार और आरम्भिक जीवन का इतिहास | Birth, family and early life history of Babarबाबर का जन्म मध्य एशिया में आज के उज़्बेकिस्तान में हुआ था। उनका जन्म सन 24 फरवरी सन 1483 में हुआ था। बाबर के पिता जी का नाम उमर शेख मिर्जा था जो चंगेज खान के वंशज थे। बाबर ने आठ शादियां की थी। उनकी पत्नियों के नाम आयशा सुल्तान, जैनब सुल्तान, मासूमा सुल्तान, महम सुल्तान, गुलरुख बेगम, दिलदार, मुबारका, बेगा बेगम था। आठ पत्नियों होने के बाद उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति हुई थी जिनका नाम हुमायूँ ,कामरान , असकरी , हिंदाल था। बाबर की दादी का नाम मीरां शाह और दादी जी का नाम कुतलुग निगार था। उनका एक था जिसका नाम चंगेज़ खान था।
बाबर का मूल या आरम्भिक स्थान मंगोलिया के बर्लास कबीले से जाना जाता था। उस समय उज्बेकिस्तान में फ़ारसी और तुर्क भाषा का अस्तित्व माना जाता था इसलिए इस भाषा में उन्होंने शिक्षा दीक्षा ली और इन भाषाओँ का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा।
बचपन से बाबर शारीरिक रूप से बड़े ही शक्तिशाली थे और अपने साथियों के साथ जब खेलते थे तो अपने दोस्तों को अपने कंधे पर उठा का उज्बेकिस्तान की ढलानदार पहाड़ियों पर भी चढाई कर लेते थे। बाबर के नाम के पीछे भी एक इतिहास से जिसे उनके चचेरे भाई ने बयान किया मुहम्मद हैदर ने किया। उसका कहना था कि उस वक्त वहाँ के लोग कम पढ़े लिखे थे और कबीले किस्म के थे इसलिए बचपन में उनको बाबर का नाम ज़हीरुद्दीन मुहम्मद मुश्किल लगता था इसलिए उन्होंने बाबर के नाम को आसान समझते हुए बाबर को बाबर के नाम से पुकारना शुरू किया था।
बाबर का भारत पहुंचने से पहले का इतिहास :-
मुग़ल इतिहास में बाबर को अकबर से भी पहले गद्दी प्राप्त हुई थी। मात्र बाबर जब 12 साल का था तब उसे फ़रगना घाटी का शासक बना दिया गया था। पर परिवार में आपसी क्लेश और सत्ता की भूख से विभूत उनके चाचा ने उनसे ये शासन छीन लिया। बाबर को जो गद्दी 1494 में प्राप्त हुई थी उसे फिर प्राप्त करने के लिए उन्होंने 1496 में फ़रगना पर हमला किया और उसे जीत लिया। पर जब उन्होंने मुश्किलों का सामना तब करना पड़ा जब उनकी सेना ने उनका समरकंद पहुंच कर साथ छोड़ दिया और बाबर के हाथो दोनों 1501 में निकल गए।
बाबर का भारत भारत क्यों आया और किसने उसे बुलाया ?
बाबर के भारत आने से पहले या उसे भारत बुलाये जाने से पहले उत्तर भारत में खिलजी साम्राज्य का लगभग अंत हो गया था। और दिल्ली पर इब्राहिम लोधी का शासन था और भारत में इस वंश की स्थापना बहलोल लोधी ने की थी। इब्राहिम की नीतियों से दौलत खान लोधी भी परेशान था इसलिए वह भी इब्राहिम लोधी को हराना चाहता था।
दूसरी
तरफ
मेवाड़
के
राजा
महाराणा भी
इब्राहिम की
बढ़ती
हुई
शक्ति
से
परेशान
थे।
दूसरी
तरफ
बाबर
ने
पुरे
उत्तर
भारत
में
विजय
की
योजना
बनाई
हुई
थी
इसलिए
दौलत
खान
लोधी
और
मेवाड़
के
राजा
महाराणा प्रताप
और
दौलत
खान
लोधी
ने
बाबर
को
भारत
में
इब्राहिम लोधी
की
शक्ति
को
काम
करने
के
लिए
बुलाया
था।
बाबर
ने
1526 में
ही
में
लाहौर
पर
अपना
अधिपत्य स्थापित करने
की
सोची
और
अपनी
एक
सैन्य
टुकड़ी
भेजी।
पर
इब्राहिम की
ताकत
के
आगे
वह
टिक
न
सका
और
इब्राहिम लोधी
ने
बाबर
की
सैन्य
टुकड़ी
को
लाहौर
से
भगा
दिया।
पर
दो
दिनों
के
अंदर
बाबर
ने
अपनी
सैन्य
शक्ति
का
विकास
किया
और
फिर
से
लाहौर
पर
अपना
कब्ज़ा
कर
लिया।
इब्राहिम लोधी की शक्ति का बाबर को पूरा एहसास हुआ और उसे ये मालूम हुआ कि इब्राहिम लोधी कभी भी उसे पंजाब में दाखिल होने की अनुमति नहीं देगा। बाबर ने आलम खान को नियुक्त किया। पर बाबर के रस्ते दौलत खान के लिए खुले थे इसलिए आलम खान अपने 30000 हजार सैनिकों के साथ दौलत खान लोधी के साथ मिल गया और उसके बाद इब्राहिम लोधी को घेरना आसान हो गया परिणाम स्वरूप पानीपत की पहली लड़ाई हुई।
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पानीपत की पहली लड़ाई और बाबर का भारत में मुग़ल वंश की स्थापना :-
पानीपत का पहला युद्ध मुग़ल सम्राट बाबर और दिल्ली के सुलतान के बीच अप्रैल 1526 में हुआ। ये एक इसी लड़ाई थी जो 12 वीं शताब्दी के बाद एक निर्णायक लड़ाई थी जिसके बाद ये फैसला होना था कि भारत में उत्तर भारत का सम्राट कौन होगा। बाबर ने अपनी सेना में 15000 सैनिकों की एक सेना तैयार की थी जिसे एक विशेष युद्ध नीति की शिक्षा दी गई थी और उन सैनिकों के पीछे 20 तोपें मौजूद थी जो दुशमन पर हमला करने के लिए तैयार थी।
बाबर द्वारा लड़ी गई लड़ाइयाँ :-
A. खानवा की लड़ाई (16 मार्च 1527)
हम पहले ही बता चुके हैं कि राजपूत डायनेस्टी भी इब्राहिम लोधी के अत्याचारों से परेशान थी। इसलिए राणा सांगा ने भी पहले इब्राहिम लोधी वंश को ख़तम करने के के लिए बाबर को भारत बुलाया था। इसके पीछे एक कारण था कि मेवाड़ का राजा भी भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता था। खानवा के युद्ध के कारण धार्मिक कारण और राजपूत अफगान गठबंधन ही माना जाता है।
सबसे पहले राणा सांगा ने बाबर की गतविधियों को देखने के लिए रवाना हुआ। राजपूत सेना फरवरी 1527 में राजस्थान के बयाना दुर्ग में पहुंचा और इस दुर्ग पर अपना कब्जा कर लिया। 1 मार्च 1527 को राणा सांगा राजस्थान के फतेहपुर सिकरी से बाबर के साथ युद्ध के लिए रवाना हुआ। उस तरफ से बाबर ने भी आगरा से 16 मार्च को कुछ कर दिया था। खानवा के युद्ध में बाबर की सेना की हालत नाजुक थी इसके पीछे कारण ये था कि बयाना युद्ध में बाबर की हार हुई थी और इस हार के बाद बाबर के सैनिकों ने राजपूत शक्ति का वर्णन बाबर के साथ किया था कि राणा सांगा की सेना कितनी मजबूत है।
बाबर हतोऊत्साहित हो चूका था और उसकी सेना भी डर गई थी पर युद्ध से पहले बाबर ने अपनी सेना को एक भाषण दिया जिसमें एक नया जोश भरा। इसके बाद राजस्थान खानवा नामक स्थान दोनों में एक भीषण युद्ध हुआ और ये युद्ध मार्च 16 सन 1527 ई में प्रातकाल ही शुरू हुआ। इस युद्ध में बाबर को एक तीर वह हताहत हो गया और उसे युद्ध के मैदान से हटना पड़ा। इस युद्ध में राजपूतो की हार हुई और राणा सांगा का राजपूत साम्राज्य का सपना अधूरा रह गया।
इस युद्ध में राणा सांगा की हार के कई कारण थे। पहला कारण राणा सांगा की सेना में असुशासन की कमी दूसरा कारण जो प्रमुख था कि सिलह्दी तंवर ने राणा के साथ विश्वास घात किया और युद्ध के समय बाबर के साथ मिल गया तीसरा कारण ये था कि बयाना के युद्ध के बाद राणा सांगा ने बाबर को संगठित और मजबूत होने का मौका दिया।
बाबर का चंदेरी का युद्ध राजपूतों के साथ | Babar's battle of Chanderi with the Rajputs
मेदनी राय जो एक राजपूत था और खानवा के युद्ध में उसने राणा सांगा का साथ दिया था मालवा क्षेत्र में राज करता था। बाबर ने उसकी सैन्य शक्ति को भी कमजोर कर दिया था और उसकी सैन्य शक्ति को अलग थलग कर दिया था। दूसरी और बाबर ने पूर्व में अफगानों की बढ़ती हुई शक्ति को कम करने के लिए अपने सैनिकों को भेजा। पर दूसरी तरफ उसे ये मालूम हुआ कि मालवा के राजपूत शासक को मेवाड़ के राजा राणा सांगा का समर्थन मिल रहा है। इसलिए उसने पहले वहाँ पर मेदनी राय की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए अपनी सेना भेजी पर उसे हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद बाबर ने अपने आप चंदेरी पर हमला किया। चन्देरी पहुँच कर बाबर ने सबसे पहले बाबर ने चंदेरी के बदले शम्साबाद माँगा पर बाबर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया। परिणामस्वरूप दोनों में एक भयानक युद्ध हुआ और इस युद्ध में बाबर ने मेदनी राय को बुरी तरह से हरा दिया। इस युद्ध के बाद मेदनी राय ने जोहर का आयोजन किया था पर बाबर ने इसकी तरफ कोई भी ध्यान नहीं दिया। अब आपके मन में ये भी होगा कि चंदेरी कहां है तो हम बता दें चंदेरी भारत के मध्यप्रदेश राज्य में अशोकनगर जिले का एक छोटा सा ऐतिहासिक नगर है जहाँ बाबर और राजपूतों का युद्ध हुआ था।
घाघरा युद्ध में बाबर ने अफगानों को हराया :-
बाबर जब भारत आया तो उसके बाद उसके सामने दो ही प्रमुख चुनौतियां थी एक तरफ राजपूत की बढ़ती शक्ति और दूसरी तरफ अफगानों का शक्ति विस्तार जब पानीपत की लड़ाई में बाबर व्यस्त था तब अफगानों ने अपनी शक्ति को सुदृढ़ किया था। अफगान महमूद लोदी ने घागरा की लड़ाई के लिए अपने आप को संगठित किया और बिहार पहुंच कर एक लाख से भी ज्यादा सेना को एकत्रित कर लिया। अफगानों ने भारत के पूर्वी हिस्से में अपना कब्जा कर लिया थ
इसलिए बाबर ने अफगानों को हराने के लिए घाघरा नदी के किनारे अफगानों को बुलाया। घाघरा नदी के किनारे दोनों में 5 मई 1529 में एक भीषण युद्ध हुआ और इसमें बाबर ने अफगानों को पराजित कर दिया।
इतिहास कारों का मानना है कि बाबर हुमाऊं के साथ बहुत प्यार परता था पर 1529 में हुमाऊं जो उनका बेटा था बुरी तरह से बीमार पड़ गया और बाबर हुमाऊं की बीमारी को देखकर चिंतीत हो गया। इससे उसका अपना स्वस्थ्य बिगड़ गया और उसके बाद उसने अपनी हेल्थ को रिकवर नहीं किया परिणाम स्वरूप 26 दिसम्बर 1530 में आज के राजस्थान के आगरा जिले में 48 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।