कप्तान सौरव कालिया का जीवन परिचय और शहादत की कहानी :-
भारत वीर सपूतों की धरती रही है और जब - जब भी भारत पर किसी ने भारत को लूटने के लिए अपनी नजरें बढ़ाई हैं भारत के वीर सिपाहियों और क्रांतिकारियों ने भारत की आन वान और शान के लिए अपने प्राण न्योछावर किये हैं। 1999 में भारत के प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था पर बदले में भारत को कारगिल जैसे युद्ध का सामना कएने पड़ा था।कारगिल युद्ध में भारत के सिपाहियों ने अपने प्राणों की आहुती देकर कारगिल पर विजय हासिल की थी। इन वीर सपूतों में एक थे कैप्टन सौरभ कालिया जिन्होंने न
की भारत के लिए बलिदान दिया पर पाकिस्तान की गंभीर यातनाओं का सामना भी करना पड़ा। आईये आज जानते हैं कैप्टन सौरभ कालिया के जीवन परिचय, उनकी शिक्षा, परिवार एक सिपाही के रूप में कॅरियर और कैप्टन सौरभ कालिया की कारगिल विजय में दिए गए योगदान के बारे में।
| कैप्टन सौरभ कालिया बायोग्राफी |
कैप्टन सौरभ कालिया का जन्म और परिवार | Birth and Family of Captain Saurabh Kalia
भारत के वीर सिपाही कैप्टन सौरभ कालिया का जन्म भारत के अमृसतर जिले में 29 जून 1976 को को हुआ था। कैप्टन सौरभ कालिया की माता जी का नाम विजया कालिया था जो एक गृहणी थी। उनके पिता जी का नाम नरेंद्र कुमार कालिया जो पेशे से का डॉक्टर थे। कैप्टन सौरभ कालिया के छोटे भाई का नाम वैभव कालिया है जो उनसे छोटे थे।
कैप्टन सौरभ कालिया की अभी तक शादी नहीं हुई थी जब वे भारत के लिए लड़ते हुए मात्र 22 साल में शहीद हो गए थे। अगर उनके पैतृक गांव की बात करें तो वे अमृतसर जिले के रहने वाले थे पर उनका पालन पोषण और शिक्षा हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले के पालमपुर तहसील में हुआ था।
सौरभ कालिया का बचपन और शिक्षा-दीक्षा | Saurabh Kalia's childhood and education
कैप्टन सौरभ कालिया की प्रारंभिक शिक्षा हिमाचल प्रदेश के पालमपुर से शुरू हुई थी। वे बचपन से पढ़ने में बहुत होशियार थे और उन्हें शिक्षा के दौरान स्कालरशिप भी मिले थे। जब सौरभ कालिया का पार्थिव शरीर पालमपुर लाया गया था तब उनकी माता जी ने ये कहा था की जब उनका जन्म हुआ था तो अस्पताल में डॉक्टर ने उन्हें नटखट कह कर बुलाया था। बाहरवीं को परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने काँगड़ा जिले के पालमपुर कृषि विश्वविश्यालय में बी एस सी मेडिकल में दाखिला लिया।
उन्होंने 1997 में इसी विश्व विद्यालय से मेडिकल स्नातक की डिग्री हासिल की और इस सफर में उन्होंने इस विश्व विश्व विद्यालय से छात्र वृतियां भी हासिल की थी और अपने माता पिता का नाम रोशन किया था। सौरभ के बचपन और उनके आर्मी करियर की बात करें तो वे बचपन से ही आर्मी में भर्ती होना चाहते थे जब उन्होंने पालमपुर डी ए वी स्कूल से बाहरवीं की परीक्षा दी थी तो उनके बाद उन्होंने ए एफ एम सी की परीक्षा दी थी पर दुर्भाग्यवश उनकी सिलेक्शन नहीं हो पाई थी।
कैप्टन सौरभ कालिया का आर्मी में चयन या भर्ती | Captain Saurabh Kalia's selection or recruitment in the Army
1997 में उन्होंने पालमपुर कृषि विश्व विद्यालय से मेडिकल की शिक्षा हासिल की उसके बाद उन्होंने अगस्त 1997 में Combined Defense Services Exam (संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा) दी और उनका चयन भारतीय थल सेना में हो गया। उन्होंने 12 दिसंबर 1999 को अपनी थल सेना के रूप में 22 साल की उम्र में कमीशन अधिकारी के रूप में अपनी ट्रेनिंग पूरी की और उन्होंने 4 जाट रेजिमेंट (इन्फ़ॅण्ट्री) में पहली जॉइनिंग की।
जब उन्होंने जब अपनी ट्रेनिंग बरेली में पूरी की उसके बाद उनकी पहली अप्पोइंटमेंट 1999 में कारगिल में ही में हुई थी। 31 दिसंबर में बरेली में ज्वाइन करने के बाद जनवरी में कारगिल में भेजा गया था और इसी जोइनिंग के साथ वे शहीद भी हो गए थे।
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कैप्टन सौरभ कालिया थे कारगिल युद्ध के पहले शहीद : उनकी शहादत की स्टोरी :-
पाकिस्तानियों ने सौरभ के साथ अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए उनकी आंखें तक निकाल ली और उन्हें गोली मार दी थीं। दिसंबर 1998 में आईएमए से ट्रेनिंग के बाद फरवरी 1999 में उनकी पहली पोस्टिंग करगिल में 4 जाट रेजीमेंट में हुई थी। जब मौत की खबर आई तो बमुश्किल चार महीने ही तो हुए थे सेना ज्वाइन किए।
तारीख 3 मई 1999, ताशी नामग्याल नाम के एक चरवाहे ने करगिल की ऊंची चोटियों पर कुछ हथियारबंद पाकिस्तानियों
को देखा और इसकी जानकारी इंडियन आर्मी को आकर दी थी। 14 मई को कैप्टन कालिया पांच जवानों के साथ पेट्रोलिंग पर निकल गए। जब वे बजरंग चोटी पर पहुंचे तो उन्होंने वहां हथियारों से लैस पाकिस्तानी सैनिकों को देखा।
कालिया और उनके साथियों ने जमकर मुकाबला किया लेकिन जब उनका एम्युनेशन खत्म हो गया तो पाकिस्तानियों ने उन्हें बंदी बना लिया। फिर जो किया उसे लिखना भी मुश्किल है। उन्होंने कैप्टन कालिया और उनके पांच सिपाही अर्जुन राम, भीका राम, भंवर लाल बगरिया, मूला राम और नरेश सिंह की हत्या कर दी और भारत को उनके शव सौंप दिए।
कैप्टन कालिया के छोटे भाई वैभव कालिया जुबानी सौरभ कालिया की शहादत की कहानी
कैप्टन कालिया के छोटे भाई का नाम वैभव कालिया है जो अपने भाई की शहादत और दर्द भरी कहानी अपने आप बताते हैं उनका कहना था कि जब उन्होंने आर्मी में ज्वाइन किया तब उनके परिवार वालों ने उन्हें वर्दी में सामने से भी नहीं देखा था।
उनके परिवार वालों के साथ उनकी बात सिर्फ चिट्टी के जरिये होती थी। ये बात तो सही है जब सौरभ कालिया की शहादत हुई तब फ़ोन का प्रचलन इतना अधिक नहीं था। सोरभ कालिया की शहादत या फिर उनके पाकिस्तान के कब्जे होने की खबर उनको एक महीने बाद एक अखबार के जरिये हुई थी।
सौरभ कालिया को कैसे मिली कारगिल में पाकिस्तान घुसपैठ की खबर :-
अब सभी के प्रश्न के उत्तर की तलाश में रहते हैं की कारगिल में घुसपैठ की खबर कैसे मिली। तो इसके पीछे एक चरवाहा का नाम है जिसका नाम ताशी नामग्याल था और उसने ही कारगिल में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की वार्ता को भारतीय सेना को 3 मई 1999 में दी थी। जब भारतीय आर्मी को इस घुसपैठ की खबर मिली तो उन्होंने सौरभ कालिया को इस मिशन के लिए अप्पोइंट किया था।22 साल के सौरभ कालिया थे कारगिल के पहले शहीद :-
जब भारतीय सेना को कारगिल घुसपैठ की खबर मिली तो उसके बाद कप्तान सौरभ कालिया को 14 मई 1999 को बजरंग नामक ऊँची चोटी पर रेकी करने के लिए अप्पोइंट किया गया उनके साथ पांच जवान और भी थे जिनके नाम अर्जुन राम, भीका राम, भंवर लाल बगरिया, मूला राम और नरेश सिंह था। 14 मई 1999 को उन्होंने कारगिल की ऊँची चोटी बजरंग चोटी पर पहुंचे और देखा कि वहां पर बहुत सारे पाकिस्तानी सेना के जवान भारी गोला बारूद के साथ हाजिर थे।
कप्तान सौरभ कालिया ने बड़ी ही बहादुरी से 14 मई को पाकिस्तानी सेना के साथ मुकाबला किया पर उन्हें पाकिस्तानी सेना ने कब्जे में ले लिया और बंदी बना लिया। सोरभ कालिया ही कारगिल युद्ध के पहले शहीद थे जिन्होंने 22 साल की उम्र में इंडियन आर्मी ज्वाइन की थी और 22 दिन के बाद गंभीर टार्चर के बाद उनके शव को भारतीय सेना को वापिस किया गया था जिनके शरीर पर इतने जख्म दिए गए थे जिसको पहचानना भी मुश्किल था। ऐसे पहले कारगिल युद्ध के जवान को शत शत नमन।
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