संत कबीर का जीवन परिचय | Biography of Sant Kabir in Hindi
| संत कबीर दास जी |
संत कबीर दास जी : जन्म | शिक्षायें | धार्मिक सोच प्रवचन | मृत्यु
संत कबीर दास का जन्म भारत की पवित्र धरती काशी में हुआ था। काशी संतों और पीर पैग़बरों की धरती मानी जाती है। संत जी जन्म संवत 1455 के ज्येष्ठ मास के दिन हुआ था उनके जन्म का प्रकाश धरती पर तब पड़ा जब पूर्णिमां वाला दिन था। उन्होंने कमल के पुष्प से जन्म लिया था या अवतरित हुए थे इसलिए उनके जन्म को जन्म और अवतार दोनों ही कह सकते हैं।
इस लिए उनके जन्म का संबंध किसी भी माता पिता से नहीं है पर वे धरती पर पाप और विनाश की बढ़ोतरी होती है तो सतलोक से इस धरती पर लोगों को मार्गदर्शन के लिए हमेशा अवतरित होते हैं। उन्हें बालक के रूप में लीलामय शरीर में एक पुष्प से अवतार लिया गया था। कबीर के जन्म पर ये कहा गया है।
सो तो एक कबीर हैं, जो जननी जन्या न माए।।"
व्याख्या :- कबीर प्रभु प्राप्ति पथ के पथिक हैं अर्थात एक राहगीर हैं। प्रभु कबीर ने सदैव अपने दोहों के माध्यम से प्रभु प्राप्ति और उन्हें सच्ची भावना से हासिल करने पर जोर दिया है। कबीर प्रभु अनुसार जीवन का अंतिम लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति ही है और प्रभु की प्राप्ति एक इंसान तब ही कर सकता है जब उसके अंदर सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो या सच्चे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हो। उन्होंने कहा था मनुष्य के अंदर अज्ञानता मिट जाएगी और तो उसके अंदर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होगा फिर उसे अपने अंदर के ईशवर की पहचान होगी और प्रभु प्राप्ति के राह पर चल पड़ेगा।
अगर कलयुग की बात करें तो कलयुग में परमात्मा कबीर का जन्म कबीर दास के रूप में प्रचलित हुआ। इन्होने आज के उत्तर प्रदेश के बनारस नामक स्थान के एक पवित्र स्थान काशी में उन्होंने एक जुलाहे के रूप में भूमिका निभाई और बाद में भगवान् का रूप लेकर इस धरती पर अवतरित हुए। उन्होंने अपने आप को एक दास शब्द के रूप में अवतरित करवाया। उनका नाम कबीर दास किसी व्यक्ति द्वारा नहीं रखा गया था पर उन्होंने अपने अवतार को लोगो को स्वयं परिचित और गायनित करवाया।
कबीर
दास
का
जन्म
1398 ई०
में
हुआ
था।
कबीर
दास
के
जन्म
की
बात
करें
तो
कुछ
लोगो
का
कहना
है
कि
उनका
जन्म
जो
है
वह
जगत
ग्रुरु
रामानंद स्वामी
जी
के
एक
आशीर्वाद से
जुड़ा
हुआ
है।
स्वामी
जी
ने
एक
विधवा
ब्राह्मणी को
आशीर्वाद दिया
था
और
उसी
आशीर्वाद के
कारण
संत
कबीर
जी
एक
तालाब
से
पैदा
हुए
थे।
पर
जिस
ब्राह्मणी ने
उसे
जन्म
दिया
था
उसे
उस
ब्राह्मणी ने
वहीं
छोड़
दिया
इसके
बाद
नीरू
नाम
का
एक
जुलाहा
वहां
से
गुजर
रहा
था
जिन्होंने उसे
उठाया
और
उसका
पालन
पोषण
कर
बड़ा
किया।
कुछ
लोग
ये
भी
कहते
हैं
कि
उनका
संबंध
एक
मुसलमान परिवार
से
हुआ
है।
“काशी में परगट भये ,रामानंद चेताये “ ये शब्द कबीर जी के अपने आप कहे हुए हैं इसलिए कुछ कबीरपंथी तो ये मानते हैं कि उनका जन्म एक कमल के फूल से हुआ था और कमल का फूल एक तालाब में खिला हुआ था। “पहिले दरसन मगहर पायो पुनि काशी बसे आई” ये शब्द भी कबीर जी के आप कहे हुए हैं व्याख्या से ये पता लगता है की उनका जन्म मगहर नामक स्थान पर हुआ था और ये स्थान उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है।
कबीर दास की शिक्षा और विवाहित जिंदगी
वैसे तो कबीरदास बचपन से ही कुशाग्र और तीब्र बुद्धि वाले थे उनका परिवार बहुत गरीब था इस लिए उनके मन में ये हमेशा ये विचार आता था कि उनका परिवार घर का दिन भोजन तक नहीं चला सकते तो वे पढ़ने की बात मन में भी नहीं ला सकते है। इस अवस्था में में भी उनके परिवार ने उन्हें मदरसे में भेजने की बात सोची पर दास जी ने इसे नाकार दिया और जब उनके सामने पढ़ाई की बात आती तो हमें उनका ये दोहा याद आता है।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।"
इसका अर्थ क्या था :- कबीर जी कहते थे बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में पता नहीं कितने ही लोग मौत के दरवाजे पर पहुंच गए हैं पर उनमे कोई भी विद्वान नहीं बन सका यहां पर पंडित शब्द विद्वान् के लिए use किया गया है , तो संत जी कहते थे कि अगर जो व्यक्ति इन पोथियों अर्थात किताबों को छोड़कर प्यार से किसी से बोल लेता है इससे बड़ा गया किसी को प्राप्त नहीं हो सकता है।
कबीर दास का वैवाहिक जीवन | Marital life of Kabir Das in Hindi
कबीर दास की शादी वनखेड़ी बैरागी की पालिता कन्या ‘लोई’ के साथ हुआ था। उनके विवाह के बाद उन्हें दो संताने हुए एक बेटा और दूसरी बेटी बेटे का नाम कमाल था और बेटी का नाम कमाली था। पर अगर कबीर पंथ की बात करें तो उनके ग्रन्थ में कबीर जी के जीवन को एक सम्पूर्ण ब्रह्मचार्य के रूप में दर्शाया गया है। तो फिर कमाल और कमाली कौन थे तो इस पंथ में कमाल का नाम कामात्य बताया गया है जो कबीर के शिष्य थे और कमाली और लोई उनकी शिष्या थी।
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कबीर दास और स्वामी रामानंद
वैसे तो कबीरदास जी अपने में किसी भी को गुरु नहीं मानते थे पर उनकी जिंदगी में स्वामी रामानंद जी का बहुत प्रभाव था। उनके धर्म के बारे में हम कोई बात नहीं कर सकते कुछ उन्हें मुसलमान मानते थे और कुछ उन्हें सतगुरु मानते थे। पर जब वे स्वामी रामानंद जी के प्रभाव में आये तो उनके विचारों से वे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपना शिष्य मानना शुरू कर दिया।
एक बात की घटना है स्वामी रामानंद जी गंगा स्नान के लिए जा रहे थे तो गंगा में सीढियाँ उतरते समय उनका पैर कबीर के शरीर से टकरा गया और स्वामी जी मुहं से "राम" शब्द निकला इस शब्द से वे बड़े प्रभावित हुए उसके बाद कबीर जी ने स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु मान लिया और उन्ही से शिक्षा दीक्षा लेना शुरू कर दिया। हालाँकि इसके बाद उन्होंने अपने उन विचारों को छोड़ दिया की वे हिन्दू धर्म को मानते हैं और उन्होंने सभी धर्म के लोगों के साथ रहन सहन शुरू कर दिया सत्संग भी किया और सभी धर्मों से अच्छे ज्ञान की प्राप्ति की तभी तो संत जी कहा करते थे।
संत कबीरदास जी की शिक्षाएं
संत कबीर जी ने प्रभु की भक्ति को ही अपना सच्चा भबवान और गुरु माना है उनकी नजरों में सभी धर्म एक समान थे दुनिया में कोई भी धर्म किसी से बड़ा है हैं।
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार"
कबीर जी कहते हैं कि इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता। पर अगर मानव जाति के लिए उनके योगदान की बात करें तो उन्होंने मानव जाति के लिए बहुत योगदान दिया था। उनकी कुछ प्रमुख शिक्षाएं जो मानव जाति के लिए थी वे निम्न लिखित हैं।
कबीर साहेब जी द्वारा लिखे छह ग्रंथ
वैसे तो अगर कबीर जी बात करें तो उनके धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों को चारों धर्मों में पढ़ा जा सकता है।
- हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रन्थ यजुर्वेद के अध्याय 29 मन्त्र 25 में ये लिखा है "समिद्धोऽअद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः। आ
च
वह मित्रामहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः।" इसका अर्थ ये है कि जिस समय भक्त समाज से शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण या पूजा आचरण कराया जा रहा होता है। उस समय कबीर परमेश्वर तत्वज्ञान को प्रकट होते हैं।
- मुस्लिम धर्म के पवित्र कुरान शरीफ सूरत फुरकान 25 आयत 52 से 59 में कहा गया है कि "तुम काफिरों का कहा न
मानना क्योंकि वे कबीर को अल्लाह नहीं मानते। कुरान में विश्वास रखो और अल्लाह के लिए संघर्ष करो और उस अल्लाह की बड़ाई करो।
- ईसाईयों के पवित्र ग्रथ बाइबल के अध्याय 3 के 3:8,3:9,3:10 में भी कबीर के बारे में बताया गया है कि कबीर परमात्मा रूप है।
- सिखों के पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में भी कबीर की व्याख्या की गई है।
कबीर सागर-- यह ग्रन्थ हमें परमात्मा के बारे विस्तार से जानकारी देता है और इसे सूक्षम वेद के रूप में भी देखा गया है।
कबीर साखी -- इस ग्रन्थ में कबीर ने अपनी साखियों के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के अपने सुमेल को समझाया है।
कबीर ग्रंथावली-- इस ग्रंथ में कबीर साहेब जी के पद व दोहे राग असावरी, राग सोरठी, राग रामकली को सम्मलित किया गया है।
कबीर बीजक -- यह कबीर का चौथा ग्रन्थ है जिसमें पद्य भाग को सम्मलित किया गया है।
कबीर शब्दावली -- इस ग्रन्थ में कबीर जी के उन अनमोल शब्दों को बताया गया है जिससे आत्मा और परमात्मा का आपस में वर्णन किया गया है।
कबीर दोहावली -- इस ग्रन्थ में कबीर के वे दोहे हैं जिन्हे सुन के इंसान मन्त्र मुग्ध हो जाता है।
कबीर साहेब जी की धार्मिक सोच
कबीर किसी भी धर्म पर विश्वास नहीं करते थे उनका ये सोचना था कि सभी धर्म बराबर होते हैं हालाँकि कलयुग में बहुत बड़े बड़े उनके सत्संग सुनने आते थे। कबीर जी बहुत काम पढ़े लिखे थे। वे सिर्फ ईश्वर को मानते थे और संसार की मोह माया से परे थे उन्होंने कभी कलम नहीं पकड़ी थी पर उन्होंने अपने मौखिक दोहों से सभी को ज्ञान दिया था। वे एक ईशवर पर विशवास रखते थे और परमात्मा के अस्तित्व पर विशवास रखते थे। हिन्दू धर्म की मूर्ति पूजा, व्रत,मुस्लिम धर्म के, रोजा नवाज, और मंदिर मस्जिद पर वे अपना मोक्ष कभी लेकर नहीं आते थे।
उस समय दोनों धर्मों के लोग बाबा साहेब के परवचनो पर विश्वास नहीं करते थे कियोकि वे अपनी वाणी में दोनों धर्मों की व्याख्या और व्याख्यान किया करते थे। कबीर जी का एक ही धर्म था वह था मानव जाति से प्यार करना।
"बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥ "
कबीर दास जी की मृत्यु
कबीर जी हमेशा वहम और भरमों से दूर रहते थे इसलिए जब उनकी मौत का समय नजदीक आया तो उन्होंने ये बात याद की कुछ लोगों का ये कहना है कि मगहर में अगर किसी की मौत होती है उसे स्वर्ग नसीब नहीं होता है पर कबीर जी इस वहम को दूर करना चाहते थे और दुनिया को ये सन्देश देना चाहते थे कि ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिए जब उन्हें पता लगा कि उनके अंतिम दिन आ गए हैं तो उन्होंने काशी जैसी पवित्र स्थान से अपना स्थान बदलने का फैसला किया। “जौ काशी तन तजै कबीरा तो रामै कौन निहोटा।” 1518 में संत कबीर जी की मृत्यु हो गई।