चक्रवर्ती सम्राट अशोक : कहानी, बायोग्राफी, इतिहास, कलिंग युद्ध | Chakravarti Emperor Ashoka Story | Biography | History | Kalinga War in Hindi

भारत में मौर्य समाज के संस्थापक चन्द्रपुप्त मौर्य को माना जाता है। उनके बाद मौर्य वंश के दूसरे शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र बिन्दुसार हुए उन्होंने भी मौर्य समाज या साम्राज्य के लिए बहुत काम किये। बिन्दुसार के बेटे सम्राट अशोक हुए। सम्राट अशोक को मौर्य वंश का महान शासक माना जाता है। अगर हम भारत के महान शाशकों को सूचि बनायें तो उनका नाम सबसे ऊपर ही नजर आता है। आज हम अशोक सम्राट के जीवन परिचय, जन्म, परिवार, इतिहास और उनके साम्राज्य विस्तार के बारे में नजर डालेंगे।


चक्रवर्ती सम्राट अशोक : जन्म | परिवार | शिक्षा | साम्राज्य विस्तार | कलिंग युद्ध | धर्म प्रचार | धम्म | धार्मिक सोच | शिलालेख | शिलालेखों की सूची | मौत

बायोग्राफी Ashoka The Great 
 

चक्रवर्ती सम्राट अशोक का इतिहास और कहानी | History and Story of Chakravarti Emperor Ashoka



चक्रवर्ती सम्राट अशोक जन्म और परिवारिक जिंदगी | Chakravarti Emperor Ashoka Birth and Family Life


अशोका दी ग्रेट का जन्म 304 ईसवी पूर्व में बिहार के पाटलिपुत्र नामक स्थान पर हुआ था आज पाटलिपुत्र बिहार का हिस्सा है। मौर्य वंश की स्थापना के बाद वे अपने पिता बिन्दुसार के बाद मौर्य वंश के तीसरे महान सम्राट माने जाते हैं। अशोका सम्राट ने पाटलिपुत्र से अपने राज्य का इतना विस्तार किया की पुरे भारत पर राज किया। उनके पिता जी का नाम बिन्दुसार था और माता जी का नाम सुभाद्रंगी था। 

ऐसा माना जता है कि बिन्दुसार की 100 से भी ज्यादा पत्नियां थी पर इसका उल्लेख श्रीलंका में किया गया है। अगर इतिहास की बात करें तो सही रूप से बिन्दुसार के तीन पुत्रों का ही उल्लेख होता है। उनमे सुसीम नाम का बीटा सबसे बड़ा, अशोक उससे छोटा और तिष्य नाम का बीटा सबसे छोटा था। ऐसा माना जाता है की अशोका के बहुत शोतेले भाई बहन थे इसलिए उन्हें हमेशा पर्तिस्पर्धा के जीवन को जीना पड़ा पर बिन्दुसार ने अपनी अपनी के इस बेटे आगे बढ़ाया और वह एक महान शासक बना।

अगर हम सही बात करें तो अशोक की चार पत्निया थी जिनका नाम देवी, कारुवाकी, पद्मावती, तिष्यरक्षिता था। और इन चार पत्नियों से उन्हें आगे जा जाकर चार पुत्र हुए जिनका नाम महेंद्र, संघमित्रा, तीवल, और कनाल था। चार पुत्रों के इलावा उनकी एक पुत्री भी थी जिसका नाम संघ मित्रा था।

Samrat Ashoka Family Tree in Hindi | चक्रवर्ती अशोक का परिवार


  • सम्राट अशोक के दादा जी का नाम ---- चन्द्रगुप्त मौर्य
  • पिता का नाम ---- बिन्दुसार
  • माता जी नाम ---- शुभाद्रंगी
  • अशोक की पत्नी का नाम ---- देवी,कारुवाकी, पद्मावती,तिष्यरक्षित,
  • बेटों का नाम ---- महेंद्र, तीवल, तिष्य और कनाल
  • अशोक की बेटी का नाम ---- संघमित्रा
  • बौद्ध साहित्य में महेंद्र का नाम ---- दीपवम्सा और महावम्सा
  • स्तंभ अभिलेख के अनुसार अशोक का पुत्र ---- राजकुमार तिवारा
  • अशोक के सगे भाइयों का नाम ---- सुशीम और तिष्य



सम्राट अशोक की शिक्षा - दीक्षा | Emperor Ashoka's education - initiation


सम्राट अशोक एक महान शासक ही नहीं थे पर एक महान ज्ञानी के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने अपने बचपन में गणित का अध्ययन किया था। गणित के अध्ययन का प्रसार और विस्तार उन्हें उन्हें उनकी विरासत में मिला था। कौटिल्य जो उनके दादा जी के गुरु जी थी एक गणितिज्ञ और महान अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते थे। 

 

 

इसलिए उनके पिता जी ने उनकी पढ़ाई के लिए और उनकी शिक्षा के लिए अर्थशास्त्र और गणित पर जोर दिया था। बाद में सम्राट अशोक ने अर्थशास्त्र और गणित में अच्छी शिक्षा ग्रहण की। अपनी शिक्षा के साथ - साथ उन्होंने बिहार में शिक्षा का विस्तार और प्रसार किया। इसके इलावा अशोक महान संस्कृत भाषा के बारे में भी जानते थे।




सम्राट अशोक साम्राज्य का विस्तार | Expansion of Emperor Ashoka's Empire



सम्राट अशोक को अगर चक्रवर्ती सम्राट कहा जाये तो इसमें कोई गलती नहीं होगी। उन्होंने भारत में एक महान शासक के रूप में काम किया था। उन्होंने 269 ईसा पूर्व से लेकर 232 ईसा पूर्व तक लगभग 38 साल तक मौर्य वंश में राज किया जो अपने में एक रिकॉर्ड था। उन्होंने अपने साम्राज्य विस्तार के कारन ही चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि धारण की। 

 

चक्रवर्ती सम्राट का अर्थ होता है जिसने चारों ओर अपने साम्राज्य का विस्तार किया हो और राज किया हो। उनका साम्रज्य उत्तर में हिन्दुकुश पर्वत से लेकर तक्षशिला की पहाड़ियों तक फैला हुआ था और दक्षिण में उन्होंने अपने साम्राज्य के विस्तार गोदावरी नदी तक फैलाया हुआ था। उस वक्त बांग्लादेश भी अखंड भारत का हिस्सा था तो पूर्व में उनका साम्रज्य बांग्लादेश से सुवर्णगिरी पहाड़ियों तक फैला हुआ था। उनके साम्रज्य विस्तार में पश्चमी क्षेत्र भी अछूता नहीं था। 

 

उन्होंने पश्चिम में भी अफगानिस्तान से लेकर बलूचिस्तान तक अपने साम्राज्य को फैलाया हुआ था। तो अगर उनके साम्राज्य विस्तार की बात करें तो उन्होंने पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था जो लगभग 10 लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा के क्षेत्र में फैला हुआ था। अपने साम्रज्य विस्तार में अशोक को कुछ अपने ही सेज सम्बन्धियों अर्थात शोतेले भाइयों का सामना करना पड़ा और कलिंग चल गया था जो बाद में किलंगा के युद्ध के नाम से जाना गया।




अशोक और कलिंग का युद्ध | Ashoka and the war of Kalinga



कलिंग के युद्ध को भारतीय इतिहास का सबसे भयानक युद्ध माना जाता है। यह युद्ध अशोक द्वारा 261 ईसा पूर्व में लड़ा गया एक निर्णायक और अंतिम युद्ध था। अगर इस युद्ध के कारणों की बात करें तो ये युद्ध अशोक द्वारा अपने साम्राज्य विस्तार के लिए लड़ा गया था। इस युद्ध के लिए उन्होंने कम से कम आठ वर्षों तक इंतजार किया। अर्थात जा उनका राजयभिषेक हुआ था उसके बाद उन्होंने आठ वर्ष बाद इस युद्ध में भाग लिया और उसके बाद उन्होंने कभी भी युद्ध नहीं किया। 

 

 

अशोक के दादा जी ने पुरे भारत पर अपना अधिपत्य जमाया हुआ था पर उन्होंने कलिंग पर कभी भी आक्रमण नहीं किया हुआ था। अपने साम्राज्य विस्तार के उदेश्य से अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था। कलिंग पर उनके पिता जी बिन्दुसार भी कभी कब्ज़ा नहीं कर पाए थे और कलिंग पहले से ही मगध के अधीन था। अब अशोक के लिए मौर्य वंश के विस्तार के लिए ये युद्ध अनिवार्य था क्यूंकि मगध मौर्य वंश के लिए और उसके साम्राज्य के लिए खतरा बनता जा रहा था। 

 

 

कलिंग का अधिपत्य हिन्द महासागर से लेकर पूर्वी तट पर था। इसलिए मौर्य समाज की अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव पड़ता था। इसलिए अगर इस युद्ध की बात करें तो ये युद्ध दोनों ही पक्षों राजनीतिक पक्षों और आर्थिक पक्षों के हिसाब से अशोक के लिए बहुत जरूरी था।



कलिंग में एक भयानक युद्ध हुआ और ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में भारी जान माल का नुकसान हुआ इस युद्ध में तेरहवें शिलालेख के अनुसार इस युद्ध में एक लाख और चालीस हजार सैनिकों को बंदी बनाकर छोड़ दिया गया और एक लाख से भी ज्यादा लोग इस युद्ध में मारे गए थे। इस युद्ध में केवल सैनिकों का नरसंहार नहीं हुआ पर और भी आम नागरिक मारे गए थे। 

 

 

ऐसा भी माना जाता है कि इस युद्ध के बाद अशोक अपने आप इस तरह से दयालु हो गया था कि उसने उसके बाद अपने सैनिकों को कभी युद्ध लड़ने के आदेश दिये थे। इस युद्ध के घाटक परिणामों के बाद अशोक ने कभी 40 साल तक युद्ध नहीं लड़ा और एक साधारण जीवन बिता के आम जनता की सेवा की।


कलिंग के युद्ध के बाद बौद्ध धर्म का प्रचार | Propagation of Buddhism after the Battle of Kalinga


हम पहले ही बता चुके हैं कि कलिंग के युद्ध के बाद अशोक का मन युद्ध से उठ चूका था और उन्होंने कभी युद्ध लड़ने की कसम खाई थी। इस युद्ध के बाद उन्होंने बौद्ध ध्रर्म को अपना लिया था। उन्होंने महात्मा बुद्ध के उपदेशों का पालन करना शुरू किया और शांति के दूत बन गये और हिंसा का साथ सदा के लिए छोड़ दिया था। वहां तक कि उन्होंने मनुष्यों को तो दूर की बात अपने साम्राज्य में जानवरों के मारने पर भी रोक लगा दी थी। 

इसके कलिंग के युद्ध के बाद उन्होंने अपने साम्राज्य को समृद्ध करने के लिए कई काम किये जैसे गरीब लोगों को दान देना, सन्यासियों को दान देना और ब्राह्मणों को दान देकर उनके लिए कल्याणकारी कार्य करना।  

अब वे जनकल्याण के लिए काम करते थे अर्थात सड़क निर्माण करना, स्कूलों का निर्माण करवाना और हस्पतालों का निर्माण करवाना। उन्होंने श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, मिस्र तथा यूनान में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने राजदूत भेजे थे। अपने पुत्र महिंद्र को श्रीलंका और अपनी पुत्री को उन्होंने श्रीलंका में इस धर्म के प्रचार के लिए भेजा था जिसका नाम संघमित्रा था। उन्होंने कलिंग के युद्ध के बाद कई धार्मिक उपदेश दिए और लोगों की सेवा की। 


एच. जी. वेल्स के अनुसार अशोक का चरित्रइतिहास के स्तम्भों को भरने वाले राजाओं, सम्राटों, धर्माधिकारियों, सन्त-महात्माओं आदि के बीच प्रकाशमान है और आकाश में प्रायः एकाकी तारा की तरह चमकता है।"

अशोक का धम्म क्या था ?



कुछ लोगों का मानना है कि अशोक का धम्म का सिद्धांत बौद्ध धर्म के से सम्बंधित था पर ऐसा नहीं था अशोक के शिलालेखों से ये पता चलता है ही कि ये एक सर्वमान्य नैतिक सिद्धांत था जिसमें ये बताया गया था पाप का सहारा नहीं लेना, लोगों के लिए कल्याणकारी कार्य करना, किसी प्रकार की हिंसा में भाग नहीं लेना, मधुरता से बोलना, बड़ों का आदर करना, मित्र साथियों और साधुओं को दान देना और उनकी सेवा करना, माता पिता का आदर करना और बुढ़ापे में उनकी सेवा करना आदि। 

 

अशोक के धम्म के प्रधान लक्षण थे पापहीनता, बहुकल्याण, आत्मनिरीक्षण, अहिंसा, सत्य बोलना, धर्मनुशासन, धर्ममंगल, कल्याण, दान, शौच, संयम, भाव शुद्धि, कृतज्ञता, सहिष्णुता, बड़ों का आदार करना, नैतिक आचरण, दया, करूणा, क्षमा, नैतिकता, अपशब्द बोलना आदि। तो संक्षपित में कहें तो अशोक के धम्म को हम बौद्ध धर्म से नहीं ले सकते हैं पर इसको छोड़कर हम इसे आम आदमी के लिए आम सिद्धांत भी कह सकते हैं।


सम्राट अशोक की धार्मिक सोच



कलिंग के युद्ध के बाद अशोक एक महान धार्मिक सहिष्णु शासक बन गए थे। उन्होंने हिंसा का सहारा केना छोड़ दिया था उनके लिए सभी धर्म बराबर थे। वे हमेशा इस सोच से दूर रहते थे कि करो या मरो पर वे हमेशा अब इस सोच पर चलते थे की जीओ और जीने दो। उन्होंने सभी धर्मों को बराबर समझकर लगभग उत्तर भारत में सभी देशों में जाकर धार्मिक सहिष्णुता का प्रचार और विस्तार किया। 

 

उन्होंने बाद में अपने आप ही नहीं अपने पुत्र और पुत्रियों को भी धार्मिक कटटरता छोड़ने के लिए प्रेरित किया और सभी धर्मों को बराबर और आदर करना सिखाया। ये बात सही है कि उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार किया था पर धार्मिक कटटरता उनके दिमाग में अब कहिं भी नहीं थी।



सम्राट अशोक मौर्य के शिलालेख | Inscriptions of Emperor Ashoka Maurya


कलिंग के युद्ध के बाद महान अशोक ने बौद्ध धर्म और अहिंसा का रास्ता अपनाया और अपने जीवन में कई शिलालेख बनवाये जो आज भी विद्यमान हैं उन्होंने इन शिलालेखों में मौर्य धर्म और बुद्ध धर्म की एक अलग ही छाप छोड़ी हुई है। उन्होंने ये शिलालेख ईरानी शासक की प्रेरणा और सहायता से खुदवाये थे। उनके शिलालेख भारत में ही नहीं भारत के बहार के देशों में भी मिलते हैं जिनमे अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, वर्तमान बांग्लादेश थाईलैंड और पाकिस्तान में भी मिले हैं अगर अशोक के कुल शिलालेखों की गिनती करें तो ये 40 से भी ऊपर हैं। इन शिलालेखों की लिस्ट निचे दी गई है।


अशोक के शिलालेखों की सूची | List of Inscriptions in Hindi

  • रूपनाथ शिलालेख ---- मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में स्थित है।
  • दिल्ली शिलालेख ----  दिल्ली में अमर कॉलोनी में स्थित है।
  • बैराट शिलालेख ----  राजस्थान के जयपुर ज़िले में स्थित है।
  • अहरौरा शिलालेख ---- उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित है।
  • मस्क शिलालेख ---- कर्नाटक के रायचूर जिले स्थित है।
  • एरागुडि शिलालेख ---- आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित है।
  • जौगढ़ शिलालेख  ---- उड़ीसा के गंजाम जिले में स्थित है।
  • जटिंगा रामेश्वर शिलालेख  ---- कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थित है।
  • धौली शिलालेख  ---- उड़ीसा के पूरी जिले में स्थित है।
  • सिद्धपुर शिलालेख ---- कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थित है।
  • सहसराम शिलालेख  ---- बिहार के शाहबाद जिले में स्थित है।
  • गुजर्रा शिलालेख  ---- मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित है।
  • पल्किगुंडु शिलालेख ---- कर्नाटक के रायचूर जिले में स्थित है।
  • राजुलमंडगिरि शिलालेख ----  कर्नाटक के बलारी जिले में स्थित है।
  • शिलालेख  ----  कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थित है।
  • गाधीमठ शिलालेख ---- कर्नाटक के रायचूर जिले में स्थित है।
  • शाहबाज गढ़ी ---- पाकिस्तान में स्थित है।
  • सोपारा शिलालेख ---- महाराष्ट्र के पालघर जिले में है।
  • गिरनार शिलालेख ---- यह काठियावाड़ में जूनागढ़ के पास है।


सम्राट अशोक की मृत्यु | Death of Emperor Ashoka



इतिहास कार ऐसा मानते हैं कि अशोक ने कलिंग के युद्ध के बाद अपना जीवन बिहार के पाटलिपुत्र में बिताया। पाटलिपुत्र में रहते हुए उन्होंने 40 साल लगभग यहां बिताये और 232 ईसवी पूर्व में उनकी मृत्यु हो गई। आज भी भारतीय इतिहास में अशोक महान को याद किया जाता है।




Rakesh Kumar

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