मज़दूर की जिंदगी पर लेख
भूमिका
समाज
मे
रहने
वाले
सभी
वर्ग
के
लोगों
को
अपनी
निजी
जिंदगी
जीने
का
हक़
होता
है
हाँ
मैं
इस
बात
को
मानता
हूँ
कि
ये
जिंदगी
देश
के
नियमों
और
कानूनों के
हिसाब
से
सही
होनी
चाहिए।
क्या
मैं
भी
उस
समाज
के
साथ
जी
सकता
हूँ
जो
बड़े
महलों
में
रहते
हैं।
क्या
मैं
भी
उस
समाज
के
साथ
जी
सकता
हूँ
जो
अपने
बच्चों
को
एक
अच्छी
शिक्षा
देते
हैं
और
पैसों
के
जोर
पर
अपने
बच्चों
का
भविष्य
बनाते
हैं।
क्या
मैं
भी
ऐसी
जिंदगी
जी
सकता
हूँ
की
अच्छे
होटलों
मैं
जाकर
एक
उस
समाज
के
दर्शन
करूँ
जो
जो
अपने
आप
को
समृद्ध
मानते
हैं।
तो शायद मेरी तरफ से एक ही जवाब होगा नहीं क्योकि मैं मजदूर मुझे देवो की बस्ती से क्या अर्थात मुझे बड़े महलों से क्या ? मेरी अपनी आत्मकथा है और मैं आज अपना नाम बताये बिना आज अपनी आत्मकथा बताता हूँ नाम जानने से कोई फायदा नहीं होने वाला क्योकि मेरा काम मेरी मजदूरी और मेहनत है जो करता हूँ।
| "मैं एक मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या" |
मैं एक मजदूर क्या है मेरा इतिहास ?
जब से इस धरती पर मनुष्य का अस्तित्व आया है या मनुष्य का वजूद आया है एक मजदूर नहीं था पर मैं एक मेहनती इंसान था और मेहनत करके अपना पेट भरता था। जब से इस धरती पर आग और पहिये की खोज हुई मैंने अपने अपने आप को एक इंसान के रूप में बदलना सीखा और अपने पालन पोषण करना सीखा। ये मेरे लिए जरूरी भी था उस वक्त मैंने अपने समाज को नहीं बांटा था। इससे पहले भी मुझे भोजन की तलाश इधर उधर घूमना पड़ता था।
प्राचीन युग में जैसे ही मनुष्य को वर्गों में बांटा गया उसके बाद मुझे एक मजदूर के नाम से जाना गया। उसके बाद आज तक मुझे मजदूरी करनी पड़ती है जिसे मैं बड़ी ही शोक से करता हूँ। हाँ मेरे कुछ साथियों इतिहास में मेरे वजूद और मेरे कार्य को चमकाने की कोशिश भी की और अपने अपने अधिकारों को लेकर आंदोलन भी किये पर आज भी मैं एक मजदूर हूँ और मेरा काम ही मेरी इज्जत है।
मैंने अपने बारे मैं कुछ अच्छा पढ़ना चाहा।
मैं एक मजदूर हूँ मेरी भी इच्छा होती है कि मैं अपने बारे मैं ऐसा पढूं जिससे ये पता लगे कि एक मजदूर के लिए आज अच्छी खबर पढ़ने को मिले। हाँ मुझे ये जरूर पढ़ने को मिलता है कि मजदूरों ने अपने हक के लिए लड़ाई लड़नी चाही पर उसे एक अच्छा मुकाम नहीं मिला। ये भी मैंने पढ़ा कि इस जगह पर एक स्लाइडिंग हुई या ब्लास्ट हुआ जिससे इतने मजदूर दब कर मर गए हैं और उनमे से कुछ ऐसे होते हैं जिनके घर में कमाने वाला वही होता है।
सुन के कभी कभी दुःख होता है और फिर दूसरे दिन अपने काम के लिए निकल जाता हूँ क्योकि दुःख करने से कोई फायदा नहीं होता है मेरा काम ही मेरी पूजा है और मैं 9 वजे 5 वजे तक सिर्फ काम करता हूँ और उन्ही से अपना पालन पोषण और पाने परिवार का पालन पोषण करता हूँ। हाँ एक बात जरूर सोचता हूँ कि कभी मेरे बारे मैं भी अच्छी खबर सुनने को मिले ताकि मेरे काम मैं और ज्यादा जोश पैदा हो और मैं अपने मालिक की बात सुन सकूं --- जल्दी काम कर तूने काम बिलकुल कम किया है।
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क्या है समाज में मेरा वजूद ?
वैसे तो मैं आपको एक बात बता दूँ कि मेरे पास इतना समय नहीं है कि मैं भौतिक वादी समाज में रूचि रखूँ और हमेशा किसी की निजी जिंदगी की बात करूँ पर एक तो पक्की है कि मैं रो अपने समाज स जरूर रु - ब - रु होता रहता हूँ। सुबह जब घर से निकलता हूँ तो पहले तो काम कहां पर हैं उस हिसाब से अपना समय निर्धारित करना पड़ता है और देखना पड़ता है कि समय पर उस जगह पर पहुँच पाउँगा के नहीं।
अगर गलती से मजद्दूरी कहीं दूर मिली हो तो पहले एक घंटा निकलना पड़ता है। साइकल या पैदल यात्रा का आरम्भ होता है और अपने मुकाम पर पहुंचना पड़ता है। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि पिछले दिन थके हुए कारण सुबह जल्दी उठ नहीं सकता तो लेट हो जाता हूँ जिससे एक ही बात सुननी पड़ती है दिहाड़ी काट ली जाएगी। अब किसी को कोई क्या कहे वैसे तो मजदूर जागरूक हो गया है अगर काम नजदीक हो, अपने रिश्तेदार के घर हो या फिर गांव मैं हो तो ये कहा जाता है कि सुबह जल्दी आना ये काम बहुत जरूरी हैं।
और जब शाम को अगर काम बच्च गया हो तो ये कहा जाता है कि थोड़ा सा काम बचा है इसे भी कर लो मेरा नुक्सान हो रहा है। यहां पर बात रिश्तेदार या नजदीकी की नहीं है पर बात ये है कि मेरे मैं और दूसरे मजदूर में क्या अंतर है। और एक बात का एहसास और हुआ है कि कड़ी मेहनत के बाद जब अपने कमाई लेने का समय आता है तो बड़े ही विनम्र स्वभाव से ये कह दिया जाता है कि अभी एक तारीख को तनखाह पड़ेगी तो पैसे मिल जायेंगे। बात करें समाज मैं एक मजदूर की प्रतिष्ठा की तो उसका कोई हिसाब नहीं, जब पूछा जाता है कि क्या करता है वह तो बड़े ही अंदाज से कह दिया जाता है मजदूरी करता है और क्या करता है।
तो मैं उनसे ये पूछता हूँ क्या मजदूरी करना गुनाह है तो कहां का गुनाह है। जबकि समाज के दूसरे लोगों जो समाज मैं काम करते है उन्हें बड़े ही प्यार से कह दिया जाता है इतने पैसे कमाए है पर इस बात का अंदाजा नहीं होता कमाए हैं तो कैसे कमाए हैं। तो आप समाज में मेरी छवि देख सकते हैं।
कौन - कौन सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है मुझे ?
मुश्किलें तो मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं मौसम चाहे कोई भी हो मुझे गर्मी में भी काम करना पड़ता है और सर्दियों में भी मुझे काम करना पड़ता है। इसके बीच अगर ऐसा हो तो घर का कोई सदस्य बीमार हो जाये भी तो मुसीबतों का सोने पर सुहागा हो जाता है उसी वक्त सैलरी बंद हो जाती है और घर के लिए दौड़ना पड़ता है।
गरीबी तो मेरी दोस्त बन चुकी है जिसे मैंने बड़े ही प्यार से अपने गले लगाया हुआ है। अपनी मजदूरी से मैंने अपने ऊपर अभिशाप जो गरीबी है उसे भी काबू पाने की कोशिश की पर नहीं कर पाया किउंकि जरूरतों और महंगाई ने मुझे ऐसा जकड लिया है कि अगर पैसा कमा के कोई और काम करूँ तो खर्चा कहां से चले। आज तक किस ने ये नहीं कहा कि ये काम करों बेटा हम आपके साथ हैं। इज्जत की बात करना तो दूर की बात है।
हाँ पढ़ा लिखा जरूर हूँ पर बेरोजगारी भी मेरे लिए एक अभिशाप बना हुआ है। समाज ने मुश्किलों से घेरा हुआ है। अपर मैं एक सच्चा मजदूर हूँ और मेहनत मेरा पेशा है मैं काम करता रहूँगा जब तक एक मुकाम को हासिल नहीं करता हूँ।
निष्कर्ष
दोस्तों इस पोस्ट के माध्यम से मेरा ये मकसद नहीं है कि मैं अपने जीवन और अपने काम के जरिए दूसरे लोगों के चित्र को सामने लाने की कोशिश क्र रहा हूँ पर मेरा मकसद ये है कि एक मजदूर को किन किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और और समाज मजद्दूर के बारे में क्या सोचता है है हाँ इस बात की जरूरत है कि एक मजदूर को समाज मैं इज्जत दी अजय काम तो काम होता है किसी को गली निकल कर और किसी की आलोचना करने से कोई फायदा नहीं हाँ जरूरत है तो ये कि समाज के सभी वर्गों को समान रूप में देखा जाये और जब किसी भी मजदूर को जरूरत पड़े तो उसकी सहायता करनी चाहिए तभी एक अच्छे समाज का सृजन होगा। धन्यवाद