Former Indian PM Atal Bihari Political Career in Hindi :- अटल बिहारी वाजपेयी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और देश के ऐसे नेता जिन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में में सेवा ही नहीं की थी पर वे एक ऐसे राजनयिक थे जिन्होंने अपने राजनैतिक सफर के टेढ़े मेढे सफर के साथ एक बार नहीं तीन बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। 25 दिसंबर में भरत के ग्वालियर में जन्में अटल बिहारी वाजपेयी ने आजादी की लड़ाई के बाद 1951 में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। आइये जानते हैं अटल बिहारी वाजपेयी का राजनितिक सफर कैसा रहा था।
भारत में भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अंदोलन में भाग लेने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी 1951 में हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन R. S.S में आये। हालाँकि आर एस एस को एक राजनितिक पार्टी या संस्था नहीं माना जाता है। 27 साल की उम्र में उन्होंने भारत में नवगठित पार्टी जनसंघ से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने पहले दिल्ली के उत्तरी क्षेत्र का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। अटल बिहारी वाजपेयी श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आदर्शों और नीतियों से बहुत प्रभावित थे इसलिए वे उनके अनुयायी और सहयोगी के रूप में सामने आये।
अटल बिहारी वाजपेयी 1952 में फेल लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। 1952 के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश के तीन लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए टिकट दी गई। ये तीन लोकसभा चुनाव लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र था। इन तीन लोकसभा चुनावों में उन्हें दो लोकसभा क्षेत्र लखनऊ और मथुरा से हार का सामना करना पड़ा और तीसरे लोकसभा क्षेत्र से बलरामपुर से उन्होंने इलेक्शन जीत लिया और भारत के निचले सदन के लिए चुनकर पहली बार भारत की संसद में कदम रखे। वे 1968 से लेकर 1973 तक भारत की दूसरी बड़ी पार्टी जनसंघ के अध्यक्ष पद पर बने रहे।
भारत में इंदिरा गाँधी के समय जब भारत के बड़े नेताओं को जेल में डाला गया था तो अटल बिहारी वाजपेयी भी अन्य नेतायों के साथ जेल में रहे। 1975 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आंतरिक आपातकाल के दौरान वाजपेयी को कई अन्य विपक्षी नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। 1977 में देश में आपातकाल की समाप्ति के साथ ही भारत में एक नई पार्टी का उत्थान हुआ और इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता कम हो गई परिणामस्वरूप भारत में एक नै पार्टी जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक विचारों को आगे बढ़ाया।
अटल बिहारी वाजपेयी के लोकसभा मेंबर के रूप की बात करें तो वे 1957 से लेकर 2009 तक वे पांच बार लोकसभा सदस्य बने। पहले उन्होंने 1957-1962 तक बलरामपुर बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र से और दूसरी बार 1967-1971 तक बलरामपुर से फिर से चुने गए। तीसरी बार वे 1971-1977 तक ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र से चुने गए। चौथी बार वे 1977-1984 तक नई दिल्ली से लोकसभा क्षेत्र के लिए चुने गए। पांचवां सफर उनका उत्तर प्रदेश के लखनऊ लोकसभा क्षेत्र में समाप्त हुआ जब वे 1991-2009 तक आठ साल के लिए लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से चुने गए।
1995 में लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे उन्होंने 1996 में होने वाले आम लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के लिए अटल बिहारी बाजपेयी का नाम घोषित कर दिया।1996 में भारत में भारत में आम लोकसभा के चुनाव हुए और 543 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 161 सीटें जीती और एक बड़ी पार्टी के रूप में सामने आयी। कुछ जानकार इस जीत को 1990 की बाबरी मजदीद के विध्वंश के बदले जीत का कारण बता रहे थे।
अटल बिहारी बाजपेयी का राजनैतिक सफर
अटल बिहारी वाजपेयी ने पहला चुनाव 1952 में लड़ा। दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद अटल बिहारी वाजपेयी को जनसंघ को आगे बढ़ाने का नेतृत्व दिया गया। 1968 में वे जनसंघ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए और अब अन्य नेता नानाजी देशमुख, बलराज मधोक और लालकृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर पार्टी को आगे बढ़ाने की जिमेवारी अटल बिहारी वाजपेयी के पास था।
भारत में इंदिरा गाँधी के समय जब भारत के बड़े नेताओं को जेल में डाला गया था तो अटल बिहारी वाजपेयी भी अन्य नेतायों के साथ जेल में रहे। 1975 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आंतरिक आपातकाल के दौरान वाजपेयी को कई अन्य विपक्षी नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। 1977 में देश में आपातकाल की समाप्ति के साथ ही भारत में एक नई पार्टी का उत्थान हुआ और इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता कम हो गई परिणामस्वरूप भारत में एक नै पार्टी जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक विचारों को आगे बढ़ाया।
1977 में भारत में पहली बार एंटी कांग्रेस सरकार बनी और भारत के प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई बने। अटल बिहारी वाजपेयी को मोरार जी देसाई ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया और उन्हें विदेश मंत्री का दाइत्व दिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी 24 मार्च 1977 से लेकर 28 जुलाई 1979 तक भारत के विदेश मंत्री रहे। अपने इसी कार्यकाल के समय अटल जी ने हिंदी में भाषण दिया था। ये भाषण उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिया था जो संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहला हिंदी में भाषण था।
1971 में भारत में आम लोकसभा चुनाव हुए और इस चुनाव में उन्होंने मध्यप्रदेश के ग्वालियर से चुनाव लड़ा जोर इस इलेक्शन में वे जीत गए। देश में आपातकाल की समाप्ति के बाद वे दिल्ली संसदीय क्षेत्र से चुने गए थे। 1979 में देसाई और वाजपेयी ने इस्तीफा दे दिया दोनों नेताओं के इस्तीफे के बाद जनता पार्टी का पतन हो गया। 1980 में जनसंघ के पतन के बाद भारत में एक नै पार्टी का निर्माण हुआ और भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हुआ।
1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद भारत में इंदिरा गाँधी के बाद उनके बेटे राजीव गाँधी को इंडियन नेशनल कांग्रेस को नेता के रूप में स्वीकारा गया। 1984 में फिर से उन्होंने मध्यप्रदेश के ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा पर इस चुनाव में उन्हें हार का सामान करना पड़ा और इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेता माधो राव सिंधिया ने उन्हें लगभग पोने दो लाख मतों से हरा दिया। ऐसा माना जाता है कि अटल जी ने माधो राव सिंधिया से ये पूछा था कि अगर वे इस चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं तो वे चुनाव नहीं लड़ेंगे। पर अंतिम समय में उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया और अटल उनसे ये इलेक्शन हार गए।
अटल बिहारी वाजपेयी के लोकसभा मेंबर के रूप की बात करें तो वे 1957 से लेकर 2009 तक वे पांच बार लोकसभा सदस्य बने। पहले उन्होंने 1957-1962 तक बलरामपुर बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र से और दूसरी बार 1967-1971 तक बलरामपुर से फिर से चुने गए। तीसरी बार वे 1971-1977 तक ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र से चुने गए। चौथी बार वे 1977-1984 तक नई दिल्ली से लोकसभा क्षेत्र के लिए चुने गए। पांचवां सफर उनका उत्तर प्रदेश के लखनऊ लोकसभा क्षेत्र में समाप्त हुआ जब वे 1991-2009 तक आठ साल के लिए लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से चुने गए।
अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्री राजनीतिक सफर और 13 दिन और 13 महीने की सरकार
भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया और अटल जी ने सरकार बनाई भी पर ये सरकार उनकी मात्र 16 दिन तक चली और उन्हें 1 जून 1996 में प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। वे पहली बार 10 वे भारत के प्रधानमंत्री बने।
1996 और 1998 के बीच संयुक्त मोर्चा की दो सरकारें बनी और इन्दर कुमार गुजराल और देवगौड़ा भारत के दो प्रधानमंत्री बने। पर ये दोनों भी प्रधानमंत्री पद के लिए विश्वाश मत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद 1998 में फिर से आम चुनावों की घोषणा हुई और भाजपा एक बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई। लोकसभा भंग कर दी गई और नए सिरे से चुनाव हुए।
1996 और 1998 के बीच संयुक्त मोर्चा की दो सरकारें बनी और इन्दर कुमार गुजराल और देवगौड़ा भारत के दो प्रधानमंत्री बने। पर ये दोनों भी प्रधानमंत्री पद के लिए विश्वाश मत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद 1998 में फिर से आम चुनावों की घोषणा हुई और भाजपा एक बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई। लोकसभा भंग कर दी गई और नए सिरे से चुनाव हुए।
1998 के आम चुनावों ने फिर से भाजपा को फिर से 545 सीटों में 182 सीटों पर जीत मिली। पूर्ण बहुमत भाजपा के पास नहीं था पर उन्होंने N.D.A सरकार का गठबंधन किया और अटल दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। पर ये सरकार भी उनकी जयादा दिन नहीं चल सकी और साउथ की बड़ी पार्टी अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने भाजपा से समर्थन वापिस ले लिया। इस प्रकार अटल दूसरी बार 13 महीने के लिए भारत के प्रधानमंत्री बने।
मई 1999 के कारगिल युद्ध को कौन भूल सकता है ये कारगिल की लड़ाई तब हुई थी जब अटल 13 महीने के लिए भारत के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने अपने अटल विश्वाश से इस युद्ध में विजय हासिल की। इसका परिणाम ये हुआ कि 1999 में हुए आम लोकसभा चुनावों में N.D,A गठबंधन को एक स्थाई सरकार मिली जब NDA नेब 543 लोकसभा सीटों में से 303 सीटों पर विजय हासिल की और अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने।
मई 1999 के कारगिल युद्ध को कौन भूल सकता है ये कारगिल की लड़ाई तब हुई थी जब अटल 13 महीने के लिए भारत के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने अपने अटल विश्वाश से इस युद्ध में विजय हासिल की। इसका परिणाम ये हुआ कि 1999 में हुए आम लोकसभा चुनावों में N.D,A गठबंधन को एक स्थाई सरकार मिली जब NDA नेब 543 लोकसभा सीटों में से 303 सीटों पर विजय हासिल की और अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने।
इस प्रकार उनका राजनीतिक सफर डेढ़ा मेढ़ा रहा पर एक नेता के रूप में आज भी उनकी छवि एक अच्छे नेता के रूप में झलकती है। 2004 के आम चुनाव के बाद एनडीए को व्यापक रूप से सत्ता बरकरार रखने की उम्मीद थी। लेकिन भाजपा इस चुनाव में बहुमत शामिल नहीं कर पाई। 2009 में अटल जी ने 85 साल की उम्र में सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया था उनका राजनीति से सन्यास लेने का कारण स्वास्थ्य का सही न रहना था। 93 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया।
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