शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी :-
भारत की आज़ादी के लिए कई क्रांतीयक्रियाओं ने अपने जान की आहुति दी है। अगर हम भगत सिंह का नाम लें तो उन्होंने ब्रिटिश जी जड़ों को हिला दिया था। इसके इलावा भारत जब जंजीरों में जकड़ा हुआ था तब रानी लक्ष्मीबाई किसी वीरांगनाओं ने अपने भारत को आज़ाद करवाने के लिए अपने जान की परवाह नहीं की।
| कारगिल का शेरशाह कैप्टन विक्रम बत्रा |
कारगिल शूरवीर कैप्टन विक्रम बत्रा : जन्म, परिवार, मिलटरी कॅरिअर,
शहीद
कैप्टन विक्रम बत्रा कहां के रहने वाले थे ? उनके परिवार के बारे में
जानकारी
कैप्टन विक्रम बत्रा जन्म भारत के उत्तरी राज्य हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिला के पालमपुर तहसील के एक छोटे से गांव घुग्गर गांव में 9 सितम्बर 1974 में हुआ था। उनके पिता जी का नाम बिक्रम बत्रा गिरधारी लाल है जो पेशे से एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थे।
उनकी माता जी का नाम कमल कांता बत्रा है और वे भी पेशे से एक सरकारी स्कूल में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। कैप्टन विक्रम बत्रा इलावा उनकी दो बहनें हैं जिनका नाम सीमा और नूतन है। ये दोनों बहनें बिक्रम बत्रा से बड़ी हैं। बिक्रम बत्रा गिरधारी लाल के तीसरे पायदान के बच्चे थे। उनका एक भाई है जिसका नाम विशाल बत्रा है।
दोनों ही बाई लुक एक दूसरे से काफी मिलते जुलते हैं इसके पीछे कारण ये है कि दोनों का जन्म एक साथ हुआ है अर्थात बिक्रम बत्रा और उनके भाई जुड़वां हैं। अगर आप सोचते हैं कि विक्रम बत्रा और विशाल बत्रा में बड़ा कौन था तो हम बता दें विशाल बत्रा का जन्म विक्रम बत्रा से 14 मिनट बाद में हुआ था तो विक्रम बत्रा अपने भाई से बड़े थे। गिरधारी लाल और उनकी पत्नी समेत पूरा परिवार आज भी अपने बेटे की शाहदत को याद करता है और शान से अपने बेटे को हर साल श्रद्धांजलि देते हैं।
कैप्टन विक्रम बत्रा अपने परिवार में भाई बहनो में बहुत प्यारे थे। कैप्टन विक्रम बत्रा अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने पैतृक गांव के DAV स्कूल शुरू की। अपनी पांचवीं की शिक्षा DAV स्कूल से ग्रहण करने के बाद उन्होंने आगे की शिक्षा के लिए के केंद्रीय विद्यालय में दाखिला लिया। केंद्रीय विद्यालय से ही उनका आर्मी का सफर शुरू हो गया था उसके पीछे कारण ये था कि ये स्कूल एक सैन्य छावनी में था इसलिए विक्रम बत्रा का रुझान आर्मी की तरफ चला गया अर्थात उनके अंदर देश प्रेम की भावना उमड़ पड़ी थी।
हालाँकि, वे अकादमिक पढ़ाई में mediocre स्टूडेंट थे पर अगर उनकी शारीरिक और खेल प्रतिस्पर्धा की बात करें तो वे टेनिस में सबसे पहले दर्जे के खिलाडी थे। अपने स्कूली करीयर में उन्होंने NCC को ज्वाइन किया था और लगातार सामाजिक कार्यों में लगे रहते थे।बचपन में उनके पिता जी उन्हें हमेशा धार्मिक शिक्षा का ज्ञान देते थे और रामचरित मानस के अध्याय सुनाया करते थे। 12 वीं की परीक्षा पास करने के बाद वे अगली पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ चले गए और वहां से उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की।
कैप्टन विक्रम बत्रा के मन कब आया आर्मी ज्वाइन करने का विचार | When did Captain Vikram Batra come to his mind to join the Army?
शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा जब चंडीगढ़ में स्नातक की शिक्षा हासिल कर रहे थे तो उस समय वे सांस्कृतिक प्रोग्राम में हमेशा एक्टिव रहा करते थे। उन्होंने NCC में रहते हुए एक अच्छे केडिट के तौर पर कई समाजिक कार्य किये इसके लिए उन्हें बेस्ट केडिट का अवार्ड भी मिला था। एक दिन वे गणतंत्र दिवस के मोके पर उन्होंने ये मन बना लिया था कि वे देश सेवा में कार्यरत होंगे और देश के वीर सिपाही के रूप में काम करेंगे।
हालाँकि ये बात भी है कि उन्हें स्नातक की पढ़ाई के बाद एक मर्चेंट नेवी में भी सेलेक्ट कर लिया था पर अपने होंसले को बुलंद रखते हुए उन्होंने सी डी एस की तैयारी रखी और भारतीय आर्मी में एक मेधावी आर्मी मैन बने।
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कैप्टन विक्रम बत्रा स्कूल से लेकर आर्मी के का सफर | Journey of Captain Vikram Batra from School to Army
कैप्टन विक्रम बत्रा ने 1992 में अपनी 12 वीं की पढ़ाई के बाद चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में मेडिकल साइड से दाखिला लिया था। 1992 में उन्होंने NCC को ज्वाइन उन्हें अच्छी सेवाओं के लिए NCC के उत्तरी जोन के लिए एयर विंग के लिए कैडिट चुना गया। उन्होंने NCC में रहते हुए "C" लेवल का सर्टिफिकेट हासिल किया।
जब वे 1995 में स्नातक की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तो उन्होंने अपना मन आर्मी ज्वाइन करने का बनाया। उन्होंने अपनी इस इच्छा को अपने पेरेंट्स के साथ साँझा किया। उनकी सास भी इंडियन आर्मी में काम कर चुकी थी इसलिए परिवार वालों ने उनके फेसले का स्वागत किया। हालाँकि इस दौरान उनकी सिलेक्शन हांगकांग में मर्चेन्ट नेवी हो चुकी थी पर उनके भारतीय आर्मी में सेवा करने के जनून ने इसे भी ठुकरा दिया था।
स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने आगे अपनी पढ़ाई को नहीं छोड़ा और अंग्रेजी विषय में मास्टर डिग्री के लिए दाखिला लिया पर इसके साथ उन्होंने "Combined De fence Services" (C. D. S) की तैयारी शुरू की और मेहनत करना जारी रखा। 1996 में उन्होंने Combined De fence Services की परीक्षा दी और उसमे उनका नाम पहले 35 कैंडिडेट्स में आया। उन्होंने यूनिवर्सिटी को 1996 में छोड़ दिया और आर्मी ज्वाइन का ली।
1996 में C. D. S की परीक्षा पास बाद विक्रम बत्रा ने मानेकशा बटालियन (J K राइफल) की तेहरवीं बता बटालियन के लिए 19 महीनों के लिए देहरादून में अपनी टर्निंग की। इस ट्रेनिंग के बाद उन्होंने डायरेक्ट लेफ्टिनेंट के पद के लिए कमीशन दिया कमीशन के बाद उन्हें मध्यप्रदेश के जबल पुर में एक महीने के लिए ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। अपनी एक महीने की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें पहली पोस्टिंग के लिए जम्मू कश्मीर के सोपोर इलाके में कार्यरत किया गया।
कुछ समय के लिए उन्होंने जम्मू कश्मीर के सोपोर जो बारामुला जिले का हिस्सा है मिलिटेंट्स के साथ लड़ते हुए सेवा निभाई। 1999 में उन्हे फिर से मध्यप्रदेश में भेजा गया अब उन्हें एक डिफेन्स अकेडमी में नए सैनिकों को ट्रेनिंग देनी थी। 1999 में फिर से उन्होंने बटालियन में प्रवेश किया। अपने आर्मी कॅरियर में जे के राइफल के लिए वे दो बार कमांडों कोर्स के लिए जा चुके थे उन्होंने भारत से बहार वेल्जियम में भी कमांडों कोर्स किया था।
कारगिल युद्ध से पहले विक्रम बत्रा के वे याद भरे लम्हे | Those memorable moments of Vikram Batra before the Kargil warकपतान विक्रम बत्रा अक्सर अपने पैतृक गांव पालमपुर आते तो वे न्युगल कैफ़े जो जो पालमपुर में स्थित है में कॉफी का सेवन किया करते थे। 1999 में वे होली मनाने के लिए छुट्टी आये थे तब अचानक ये सन्देश मिला कि भारत और पाकिस्तान कारगिल युद्ध हुआ है वैसे तो हालत का जायजा उन्हें पहले से ही था। उन्होंने अपने घर से मार्च महीने 1999 में श्रीनगर के लिए कूच कर दिया।
वे जब भी नई जगह पर पोस्टिंग के लिए जाते थे हमेशा अपने माता पिता से जरूर बात करते थे। उन्होंने अपने माता से 29 जून 1999 को अंतिम बार बात की थी और अपनी माँ को ये कहा था कि अब वे एक लेफिटनेंट है और जल्द ही कप्तान बन कर वापिस आएंगे। प् पर वक्त और भारत माता की रक्षा करते हुए ये महान योद्धा शहीद हो जायेगा ये तो उनके परिवार वालों को भी पता नहीं था।
विक्रम बत्रा में कारगिल फतेह की कहानी | Story of Kargil Fateh in Vikram Batra
शहीद विक्रम बत्रा ने देश की सेवा करते हुए 5140 चोटी पर और 4875 वाली संकरी चोटी पर जीत हासिल की थी आईये जानते हैं उनके विजय गाथा की कहानी कैसे उन्होंने इन चोटियों पर फतेह हासिल की थी।
विक्रम बत्रा ने की 5140 चोटी पर फतेह की कहानी
कारगिल युद्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को फतेह करने का कार्यभार कैप्टन विक्रम बत्रा की सैन्य टुकड़ी को सौंपा गया जो श्रीनगर-लेह मार्ग पर स्थित है और एक ऊँची चोटी है। विक्रम बत्रा ने ये निश्चय कर लिया था कि वे जरूर इस चोटी पर फतेह हासिल करेंगे। उन्होंने पाकिस्तान आर्मी से बिना डरे उन्हें सामने से लड़ने के लिए प्रेरित किया ये स्थति 20 जून 1999 की थी जब उन्होंने पाकिस्तान आर्मी का निडरता से सामना किया और पाकिस्तानी आर्मी के 6 जवानों को मौत के घाट उतार दिया।
उनके और टुकड़ी के होंसले बुलंद थे बस विक्रम बत्रा के सर पर एक ही मकसद था 5140 चोटी को पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुक्त करवाना। इस चोटी का पूर्वी क्षेत्र और पश्चमी क्षेत्र बेहद ही मुश्किल था। अपनी वीरता का और सहस का परिचय देते हुए विक्रम बत्रा ने और उनके साथियों ने 20 जून की सुबह साढ़े तीन वके के करीब इस चोटी पर फतेह हासिल कर ली। जब उन्होंने ये खबर एक रडियो के जरिये साँझा की तो भारत में ख़ुशी की लहर दौड़ गई और उन्हें शेरशाह की उपाधि से जाना जाने लगा।
विक्रम बत्रा ने तोलोलिंग की फतेह के बाद लिखी थी छोटे भाई को चिट्ठी
22 जून को जब विक्रम बत्रा ने 5140 की संकीर्ण चोटी पर कब्ज़ा किया था तो इसकी ख़ुशी की लहर भारत में फैल गई थी। विक्रम बत्रा भी इस विजय से बहुत खुश थे इसलिए उन्होंने अपने छोटे भाई को यहां से 23 जून 1999 को चिठ्ठी लिखी थी जिसमें उन्होंने अपनी जे के राइफल की वीरता और विजय गाथा सुनाई थी। उन्होंने बड़ी ख़ुशी से अपने भाई से को चिठ्ठी में ये कहा था कि हमने तोलोलिंग पर कब्ज़ा कर लिया है इसके बाद उन्होंने ये लिखा था कि अपनी विजय गाथा का वर्णन मैने अपने पिता और माता जी को फ़ोन के जरिये दे दिया हैं।
4875 वाली संकरी चोटी पर विजय और विक्रम बत्रा की शहादत
अब जे के राइफल के इस वीर सपूत को 4875 की ऊँची चोटी को दुश्मनों से आजाद कराने का जिम्मा मिला था। इसके लिए उन्होंने अपने साथियों को संगठित किया और इस चोटी पर फतेह के लिए कूच कर दिया इस चोटी पर फतेह करना थोड़ा मुश्किल था इसलिए उन्होंने यहां पर अपना पूरा दम ख़म दिखाया और अपने शौर्य का परिचय दिखाते हुए पाकिस्तानी सेना के पांच सैनिकों को मार गिराया।
इस चोटी पर फतेह करने के लिए विक्रम बत्रा ने सात जुलाई 1999 को धावा बोला था। सात जुलाई को पाकिस्तानी सेना ने ये देखा की विक्रम बत्रा उनके लिए एक मुशीबत बनते जा रहे हैं इसलिए उन्होंने उन्हें टारगेट किया और पकिस्तानी सेना ने एक कोड वर्ड के जरिये उन्हें शेरशाह का नाम दिया। शत्रु से लड़ते हुए सात जुलाई वाले दिन भारी गोलाबारी के बीच वे रेंगते हुए दुश्मन का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहे।
सात जुलाई वाले दिन ही उनके सीने और उनकी छाती पर गोली लगी जिसके कारण भारत का वीर योद्धा भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गया आज भी ऐसे वीर योद्धा को असंख्य बार नमन।
कैप्टन विक्रम बत्रा को परमवीर चक्र कब मिला ?
कैपटन विक्रम बत्रा भारत में एक अनुशासित और कर्मठ फौजी के रूप में अपनी सेवा करते हुए सात जुलाई को शहीद हुए थे। भारत में शहीद फौजी को उनके मरणोपरांत एक सम्मान से नवाजा जाता है जिसका नाम परमवीर चक्र है। विक्रम बत्रा को उनकी शहादत के लिए मरणोपरांत 15 अगस्त 1999 में स्वतंत्रता दिवस के मोके पर पर परमवीर चक्र दिया गया था। इसे वीर, साहसी और [पराक्रमी योद्धा के लिए अगर हम और भी जितने शब्द लिखे वे कम पड़ जायेंगे।