भारत की आजादी की लड़ाई में बहुत से आजादी के योद्धाओं ने अपने जान का बलिदान दिया। महत्मा गांधी जिन्हे राष्ट्रपिता के नाम जाना जाता है। अपने प्रयासों से ब्रिटिश सरकार की जड़ों को हिला दिया था और उन्हें भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने देश में ऐसे आंदोलन किये जिन्हे आज भी भुला नहीं जा सकता है। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी का भारत की आजादी के लिए अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। आईये आज "हिंदी पुकार" में जानते हैं जानते हैं महात्मा गांधी के जीवन के बारे में और उनके इतिहास के बारे में।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी
महात्मा गांधी का जीवन परिचय | जन्म | परिवार | शिक्षा | नमक कानून तोड़ो अंदोलन | असहयोग आंदोलन | विभाजन भारत छोड़ो आंदोलन | गाँधीवादी सिद्धांत | धर्म के प्रति सोच | मृत्यु |
महात्मा गांधी का जीवन परिचय | Mahatma Gandhi Short Biography in Hindi
महात्मा गांधी का पूरा ---- नाम मोहनदास करमचंद गांधी
अन्य नाम---- राष्ट्रपिता
- पिता का नाम ---- करमचंद गांधी
- माता का नाम ---- पुतलीबाई
- जन्म दिनांक ---- 2 अक्टूबर, 1869
- जन्म स्थान ---- गुजरात, पोरबंदर
- पत्नी का नाम ---- कस्तूर बाई
- कुल संतानें ---- चार पुत्र
- बेटों का नाम ---- हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास
- राष्ट्रीयता ---- भारतीय
- प्रनुख सिद्धांत ---- सत्य और अहिंसा
- शिक्षा ---- बैरिस्टर और समाज सेवी
- मृत्यु की तारीख ---- 30 जनवरी सन 1948
- हत्यारे का नाम ---- नाथूराम गोडसे
- मृत्यु के वक्त उम्र ---- 78 साल 3 महीने, 28 दिन
महात्मा गांधी का जन्म भारत के गुजरात राज्य के पोरबंदर नामक स्थान प् हुआ था। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 में हुआ था। उनके पिता जी का नाम मोहन दास करमचंद गांधी था। मोहन दास करमचंद गांधी सनातन धर्म के पुजारी थे और उसमें पंसारी का काम करते थे। ब्रिटिश राज में पूरा देश रियासतों में बंटा हुआ था और महात्मा गांधी के पिता जी उस वक्त ब्रिटिश रियासत द्वारा बनाई काठियावाड़ रियासत के के दीवान या प्रधान मंत्री थे।
महात्मा गांधी की माता जी का नाम पुतलीबाई था। महात्मा गांधी के पिता के पुतलीबाई के साथ शादी से पहले तीन शादियां और हुई थी अर्थात मोहन दास करमचंद के जो बेटे महात्मा गांधी थे वे उनके चौथी पत्नी के बेटे थे। महात्मा गांधी जी के जीवन पर उनकी माता जी का गहरा प्रभाव था जो जैन धर्म पर ज्यादा विशवास करती थी। उनकी माता जी शुद्ध शाकाहारी जीवन व्यतीत करती थी और भगवान की भक्ति में हमेशा लींन रहती थी।
जब महात्मा गांधी जी का जन्म हुआ तब भारत में बाल विवाह की प्रथा प्रचलित थी इसी प्रथा के तहत उनके पिता जी ने उनकी शादी 1883 में 13 साल की उम्र में कस्तूर बाई से करवा दिया गया। उस सय गुजरात में ये प्रथा प्रचलित थी कि शादी बाल उम्र में करवा दी जाती थी पर उसके बाद जिस बेटी की शादी की होती थी उसे कुछ लम्बे समय के लिए अपने माता पिता के घर पर ही रहना पड़ता था। महात्मा गांधी जब 15 साल के थे तो उनको पहली संतान पैदा हुई पर कुछ दिनों के बाद उनकी मौत हो गई।
जब उनके बेटे की मृत्यु हुई उसके कुछ दिनों के बाद उनके सर से बाप का साया भी उठ गया और वे भी चल बसे। आगे चलकर महात्मा गांधी और कस्तूरबा को चार बच्चे हुए और चार ही पुत्र थे जिनका नाम हरीलाल गांधी , मणिलाल गाँधी, रामदास गांधी और देवदास गांधी था।
गांधी नाम का शाब्दिक अर्थ | Meaning of the name Gandhi)
महात्मा गांधी जी के नाम से गांधी शब्द उनके पिता जी से मिला था। उनका जन्म गुजरात में हुआ था और गुजराती में गांधी शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है पंसारी। अगर हिंदी भाषा में महात्मा गांधी जी के साथ जो गांधी शब्द जुड़ा है उसका अर्थ होता है फुलेच अर्थात फूल बेचने वाला। अंग्रेजी भाषा में गांधी शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है खुशबूदार अर्थात परफूमर।
महात्मा गांधी की शिक्षा दीक्षा | Mahatma Gandhi's education initiation)
महात्मा अंधी की शिक्षा की बात करें तो उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गुजरात के राजकोट से शुरू की। बचपन में वे पढ़ने में कुशल थे। अपनी पढ़ाई को जारी रखते हुए उन्होंने अपनी मिडल स्कूल और हाई स्कूल की शिक्षा हाई स्कूल राजकोट से पूरी की। मिडल स्कूल में उन्हें कुछ परिवारिक समस्या का सामना करना पड़ा। इन्ही कारणों से उन्हें मिडल स्कूल और हाई स्कूल अर्थात दसवीं की शिक्षा अच्छे मार्क्स में उत्तीर्ण नहीं की।
पर समस्याओं से निपटते हुए उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान भी वे समस्या से निपटते रहे। उनकी समस्या का कारण ये था कि उनके पिता जी उन्हें बेरिस्टर बनाना चाहते थे इसलिए उन्हें बेरिस्टर की योग्यता के साथ पढ़ाई को पूरा करना था। उन्होंने लगन से पढ़ाई की और अच्छे अंकों में परीक्षा पास की। उसके बाद वे 4 सितम्बर 1888 में लॉ की पढ़ाई पूरी करने के लिए लंदन चले गए।
इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने सदा जीवन व्यतीत किया और अपनी माता जी के दिए गए सिद्धांतों का पालन किया। हम पहले ही बता चुके हैं कि उनकी माता जी जैन धर्म से संबंध रखते थे। महात्मा गांधी जब बेरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड गए तो उन्होंने मांस खाने की अपनी सोच को पूरा बदल लिया और शाकाहारी जीवन व्यतीत किया।
इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने किसी भी धर्म को पूरी तरह से पढ़ने के लिए अपनी रूचि को सिरे से नकार दिया। वे हमेशा दूसरों को भी सन्देश देते थे कि वे शाकाहारी जीवन व्यतीत करें। अपनी मेहनत से उन्होंने बेरिस्टर की पढ़ाई पूरी की और भारत लोट आये। भारत आने के बाद उन्होंने प्रैक्टिस के तौर पर बॉम्बे से शुरू की पर किन्ही कारणों से उन्हें यहां पर सफलता नहीं मिली।
महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका में बिताये दिन | Mahatma Gandhi's days spent in South Africa
1893 में महात्मा गांधी जी को एक भारतीय फर्म से दक्षिण अफ्रीका में उन्हें वकालत करने का मौका मिला उन्होंने इसको स्वीकार कर लिया। उन्हें दक्षिण अफ्रीका के नेतान नामक स्थान वकालत मिला। उस वक्त दक्षिण अफ्रीका ब्रिटिशर का हिस्सा हुआ करता था। महात्मा गांधी को पहले दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए भेदभाव का सामना करना पड़ा था। जब वे अफ्रीका में ट्रैन की प्रथम श्रेणी में सफर कर थे उनके पास प्रथम श्रेणी की टिकट नहीं थी इसलिए उन्हें रेल कोच से बहार निकाल दिया गया था। उस वक्त अफ्रीका में श्वेत और कालों के बीच में भेदभाव किया जाता था।
उन्हें सफर को छोड़ कर होटलों और रेस्टोरेंटों में भी भेदभाव का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका में उन्हें भारतीयों से होने भेदभाव का अनुभव हुआ जिससे उन्हें भेदभाव के प्रति लड़ने की नई दिशा मिली। यहीं नहीं जब उन्होंने अपनी वकालत शुरू की तो नेतान के न्याय धीश ने उन्हें इस बात के आदेश दिए कि अगर वे वकालत करना चाहते हैं तो अपनी पगड़ी को उतार दें। भारत में आकर उन्होंने इस भेदभाव को सक्रियता से सामने लाया और सामाजिक बुराइयों से लड़े।
चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह में महात्मा गांधी का सहयोग | Mahatma Gandhi's cooperation in Champaran and Kheda Satyagraha
गांधी जी ने 1915 भारत आने का निश्चय कर लिया और वे भारत वापिस आ गए। भारत आने के बाद उन्होंने कांग्रेस के एक अधिवेशन में अपने दक्षिण अफ्रीका के सारे वृतांत को रखा। भारत में आते ही उन्हें गुजरात राज्य के खेड़ा जिले में एक किसान आंदोलन के बारे में पता चला। हम आपको बता दें ये किसान आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ था।
अंग्रेज किसानों से साल बाद किसान कर वसूला करते थे पर उस वक्त गुजरात में फसल ख़राब हो गई थी इसलिए वहां के किसानों ने अंग्रेजो के विरुद्ध कर न देकर असहयोग आंदोलन छेड़ दिया था। शायद भारत में होने वाला 1918 में यह पहला असहयोग आंदोलन था। महात्मा गांधी ने इस आंदोलन में किसानों का साथ दिया और अंग्रेजों द्वारा अपनाये दमनकारी नीति के खिलाफ आवाज उठाई।
गांधी जी ने दूसरा आंदोलन बिहार के चम्पारण जिले में किया। ये आंदोलन भी किसानो से संबंधित था। अंग्रेज अधिकारी बिहार में जबरदस्ती बिहार में नील की खेती करना चाहते थे। और इसके लिए उन्होंने दमनकारी भी अपनाई थी। चम्पारण जिले की धरती पर शायद महात्मा गांधी का सत्याग्रह और अहिंसा को लेकर ये पहला आंदोलन था। इस आंदोलन में राजेंद्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, मजहरूल हक, ब्रजकिशोर प्रसाद का महात्मा गांधी का साथ दिया। इनके इलावा महात्मा गांधी के साथ कुछ किसान मिले जिन्होंने महात्मा गांधी को अपने किसान नेता से मिलने की जिद्द की जिससे ये आंदोलन सफल हो सके। इस नेता का नाम राजकुमार शुक्ल था।
पहले उनके जिद्दी स्वभाव करके महात्मा गांधी ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया पर बाद में राजकुमार शुक्ल और महात्मा गांधी के प्रयासों से चम्पारण का आंदोलन कामयाब हुआ और अंग्रेजों की जबरदस्ती बिहार में नील की खेती का सपना अधूरा रह गया। इस आंदोलन के बाद ही बिहार के किसानों ने उन्हें महात्मा के नाम से पुकारा।
महात्मा गांधी और असहयोग अंदोलन | Mahatma Gandhi and the Non-Cooperation Movement)
भारत में रोलट एक्ट के कारण जो भारतियों के लिए एक दमन वाला एक्ट था देश पूरा विद्रोह पर उतारू था। इसी एक्ट के कारण अमृतसर में जलियावाला बाग़ का हत्या कांड भी किया गया था। भारत में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद का खत्मा करने की अपने मन सोच रखी थी।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक आंदोलन की शुरुआत की गई जिसका नाम था असहयोग आंदोलन। 4 सितंबर 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस के अधिवेशन में ये प्रस्ताव पारित किया गया कि महात्मा गांधी इस आंदोलन का नेतृत्व करेंगे और इसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं होगा। इस आंदोलन का एक प्रारूप था कि भारतीयों द्वारा अंग्रेजों के साथ किसी भी कीमत पर सहयोग नहीं करना।
महत्मा गांधी ने इस आंदोलन को सफल बनांने के लिए अहिंसा का सहारा लेते हुए प्रदर्शन किये। स्कूल और कॉलेज में शांतिपूर्ण धरने किये गए। दूसरी तरफ खिलाफत आंदोलन भी भारत में जोरों पर था इसलिए महात्मा गांधी ने उनके साथ हाथ मिला लिया। अब हिन्दू और मुसलमानों ने ब्रिटिश जड़ों को उखाड़ने की कसम खा ली थी। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार उस वक्त 7 लाख से भी ज्यादा लोग इस आंदोलन से जुड़े हुए थे।
1920 और 1921 के दौरान पुरे भारत में लगभग महात्मा गांधी के नेतृत्व में 390 से भी ज्यादा हड़तालें की गई। भारत में स्वराज प्राप्ति को लेकर 1857 की आजादी की लड़ाई के बाद ये दूसरा बड़ा आंदोलन था जिसने अंग्रेजी सरकार की जड़ों को हिला दिया था।
चोरा -चोरी की घटना और महात्मा गांधी का असहयोग अंदोलन वापिस लेना | Gandhi's withdrawal of non-cooperation movement)
महत्मा गांधी जी ने पहले ही ये साफ किया था कि इस आंदोलन का मकसद ब्रिटिश उपनेवश को हिलाना है न की हिंसा का सहारा लेकर निहथे लोगों पर अत्याचार करना। पर संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले में फ़रवरी 1922 में घटना इसके उलट हो गई और किसानों के इक समूह ने उन्होंने
चोरा - चोरी नामक स्थान पर एक पुलिस ठाणे में आग लगा दी और इसमें 88 से भी ज्यादा
पुलिस कर्मियों
को अपनी परिवार सहित इस घटना का शिकार होना पड़ा।
महात्मा गांधी को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने अपना असहयोग अंदोलन वापिस ले लिया। इस तरह महात्मा गांधी का सफल होने वाला असहयोग आंदोलन ख़त्म हो गया। महात्मा गांधी को गिरफ्दार कर लिया गया और उनके ऊपर देशद्रोह का मुकदमा चला और उन्हें 8 साल की सजा सुनाई गई।
गांधी जी द्वारा चलाया गया सविनय अवज्ञा अंदोलन और नमक कानून तोड़ो अंदोलन | Civil Disobedience Movement launched by Gandhiji and Break the Salt Law Movement)
महात्मा गांधी
की
विचार
धारा
और
गर्म
दल
के
नेताओं
का
एक
ही
मकसद
था
भारत
की
आजादी
या
स्वराज
प्राप्ति। पर
महात्मा गांधी
और
गर्म
दल
के
नेताओं
जैसे
भगत
सिंह,
राजगुरु, सुभाष
चंद्र
बोस
आदि
के
आजादी
प्रप्ति के
ढंग
अलग
थे।
महात्मा गांधी
ने
1920 में
दोनों
कॉग्रेस पार्टी
और
स्वराज
पार्टी
के
बीच
के
मतभेद
को
मिटाने
की
कोशिश
भी
की
थी।
महात्मा गांधी ने युवा नेताओं की इस मांग को जायज ठहराया और उनकी इस मांग का प्रोत्साहन किया कि भारत को बिना किसी शर्त पर आजाद किया जाये। महात्मा गांधी ने अपनी मांगों को दो साल के लिए रोक दिया और ब्रिटिश इष्ट इण्डिया से कहा कि भारत की स्वराज की मांग पर वे विचार करे। पर अंग्रेजी सरकार का कोई जवाब नहीं मिला।
जब 26 मार्च 1930 को भारतीय आजादी का झंडा फेहराया गया उसके बाद महात्मा गांधी ने 1930 में एक नए आंदोलन का आगाज किया उसका नाम था नमक तोड़ो कानून। उन्होंने १२ मार्च से ६ अप्रेल तक नमक कानून के तहत नया चक्रव्हु चलाया। इस अंदोलन का मकसद दांडी जाकर नमक बनाना था। इस आंदोलन में सरोजनी नायडू जैसी नेता ने साथ दिया।
महात्मा गांधी दांडी के लिए मार्च
महात्मा गांधी ने गुजरात के एहमदबाद से दांडी के लिए मार्च शुरू कर दिया। उन्होंने पैदल यात्रा का फैसला किया। महात्मा गांधी ने इस क़ानून को तोड़ने के लिए हजारों लोगों के साथ 400 किलोमीटर का रास्ता पैदल तय किया। इस यात्रा का सभी लोगों ने साथ दिया और अंदोलन को सफल बनाने के लिए जेलों की सेर भी की।
पूरा देश दूसरे विश्व युद्ध की आग से जल रहा था तब अंग्रेजों ने भारतीयों का इस युद्ध में साथ माँगा। महात्मा गांधी ने अहिंसा का सहारा लेते हुए अंग्रेजों का पक्ष लिया। इसका परिणाम ये हुआ कि कांग्रेस सरकार दो धड़े में बंट गई और महात्मा गांधी अलग - थलग पड़ गई। कांग्रेस के सभी सदस्यों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। महात्मा गांधी के बाद कांग्रेस में दूसरे पायदान पर जवाहरलाल नेहरू थे उन्होंने भी ये स्पष्ट कर दिया कि बिना आजादी प्राप्त किये वे अंग्रेजों का किसी भी कीमत पर साथ नहीं देंगे। 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी जी ने अंग्रेजो के समक्ष "भारत
छोडो" आंदोलन का प्रस्ताव रखा।
इसके बाद उन्होंने इस आंदोलन को तेज कर दिया। पुरे देश में यह आंदोलन व्यापक स्तर पर चला और महात्मा गांधी ने आंदोलन कारियों से ये आग्रह किया कि वे तब तक भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन करें जब तक उन्हें आजादी प्राप्त नहीं हो जाती। पुरे भारत में अंग्रेजों द्वारा व्यापक स्तर पर दमन कारी नीति अपनाई गई। आंदोलनकारियों को जेलों में बंद कर दिया गया। भारत छोड़ो अंदोलन "करो या मरो" की
राह पर आ गया और आंदोलनकारियों ने आंदोलन और तेज़ कर दिया।
महात्मा गांधी जी को और उनके साथ सदस्यों को अंग्रेजों द्वारा पकड़ कर जेल में बंद कर दिया गया। महात्मा गांधी को आगा खान जेल में बंद कर दिया गया और वे इस जेल में दो साल तक बंद रहे। इन दिनों उनकी पत्नी का देहांत हो गया। कांग्रेस के सदस्य महात्मा गांधी को जेल में दम तोड़ते हुए नहीं देखना चाहते थे इसलिए आंदोलन थोड़ा ठंडा पड़ गया। भारत छोड़ो आंदोलण ने अंग्रेजी साम्राज्य को ये एहसास करवा दिया कि वे भारतीय अब आजदी हासिल किये बगैर नहीं रहेंगे अंग्रेजों ने औपचारिक घोषणा की कि वे भारत को सत्ता हस्तांतरित कर उन्हें आजादी दे दी जाएगी। भारतियों को जेल से रिहा कर दिया गया।
महात्मा गाँधी ने लिखी हैं ये नौ पुस्तकें
महात्मा गांधी और देश का विभाजन | Mahatma Gandhi and the partition of the country
आजादी के बाद भारत में गठित मुस्लिम लीग ने एक अलग देश की मांग को रखा। इस मांग को लेकर देश को व्यापक हिंसा का सामना करना पड़ा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता था कि पार्टी में महात्मा गांधी की स्थिति मजबूत थी। बलभ भाई पटेल देश का बंटवारा नहीं चाहते थे। दूसरी तरफ महात्मा गांधी को मुहमंद अली जिन्हा के दवाब में आ गए और उन्होंने उनके दूसरे देश के निर्माण के प्रस्ताव का समर्थन किया।
बलभ भाई पटेल ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि वे मुस्लिम लीग का समर्थन न करें। पर महात्मा गांधी आजादी पर हिंसा कभी नहीं देखना चाहते थे। महात्मा गांधी जी ने इस हिंसा से परेशान होकर अहिंसात्मक गतिविधि अपनाते हुए आमरण अनशन शुरू कर दिया। बाद में हिन्दू, मुस्लिम और सिख नेताओं ने उन्हें ये विश्वास दिलाया कि वे अहिंसा छोड़ कर शांति से इस समस्या का समाधान करेंगे। सभी नेताओं ने उन्हें जूस पिलाकर उनका आमरण अनशन तुड़वा दिया। पर जिन्हां की जिद्द की वजह से भारत के दो टुकड़े हो गए एक तरफ भारत और दूसरा पाकिस्तान।
गाँधीवादी सिद्धांत | Gandhian doctrine
सत्य ही जीवन है :-- गांधी जी ने जिंदगी की बुराइयों से लड़ने के लिए हमेशा सत्य का सहारा लिया ,उन्होंने ये कहा था अगर आपके अंदर किसी भी किस्म का भय पैदा होता है तो तो आपके असत्य के कारण होगा। उन्होंने ये बात जिंदगी में स्पष्ट कर दी थी कि सत्य की प्राप्ति से आप परमेशवर की प्राप्ति कर सकते हो और अगर आपने झूठ का सहारा लिया तो आपके अंदर एक प्राकृतिक डर और भय की भावना पैदा होगी
अहिंसा से जीत -- उन्होंने किसी भी कार्य को परिपूर्ण करने के लिए इस बात पर जोर दिया कि हिंसा से किसी बात का हल नहीं किया जा सकता है। महात्मा गांधी जी ने अपनी पुस्तक
"The Story of My Experiments with Truth" अहिंसा और सत्य के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने ने ये भी कहा था "मरने
के लिए मैरे पास बहुत से कारण है किंतु मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है। " उन्होंने हिंसा और डरपोक पर वयंग्य करते हुए ये स्पष्ट किया था कि अगर मेरे को हिंसा और डरपोक में से दोनों को चुनना हो तो मैं डरपोक बनना पसंद करूंगा और हिंसा को नकार दूंगा।
अश्पृश्यता एक सामाजिक बुराई :-- महात्मा गांधी छुआछूत और अश्पृश्यता को एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई मानते थे। उन्होने ने ये कहा था मनुष्य भगवान् का दिया हुआ रूप है मनुष्य तो मनुष्य होता है चाहे वह किसी भी जाति का हो। इस लिए उन्होंने अछूत शब्द का वहिष्कार किया था और निम्न जाति के लोगों के लिए "हरिजन"
शब्द का प्रयोग किया था। हरिजन का अर्थ होता है भगवान् का इंसान।
शाकाहारी सोच -- महात्मा गांधी हमेशा शाकाहारी सोच के थे। उनका कहना था। किसी की हत्या कर के उसे खाना घोर अपराध है। मांस खाने से इंसान के दिमाग के अंदर वह सोच नहीं आती जो शाकाहारी में होती है।
महात्मा गाँधी की धर्म के प्रति सोच
गाँधी जी के लिए धर्म प्रबल था और उन्होंने अपनी युवावस्था में वर्षों तक तुलनात्मक धर्म का अध्ययन करने में काफी समय बिताया था। उनके लिए जो धर्म के लिए सही दृष्टिकोण रखता है और सही तरीके की तलाश में रहता है उसे ही धार्मिक इंसान कहते हैं। फिर भी ये स्पष्ट था कि उन्होंने धर्म के लिए क्या खोजने की कोशिश की।
उन्होंने धर्म के अंदर ज्ञान, संकीर्णता और रूढ़िवाद से मुक्त एक जिज्ञासु खुले दिमाग को बनाने का प्रभाव डाला। वह किसी भी विश्वास के लिए बहुत कुछ मानने के लिए तैयार था, वह केवल उन लोगों के प्रति सहिष्णु था जो भगवान के उपासक थे। उनके लिए धर्म सभी मामलों की जड़ था, और सफलता या असफलता केवल इस बात पर निर्भर हो सकती है कि व्यक्ति का विश्वास कितना जीवंत और सक्रिय है। व्यक्ति का व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक जीवन सुपरिभाषित सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होना चाहिए।
उन्होंने तपस्या को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि एक समय की आवश्यकता के अनुसार अपने साथी प्राणियों की सेवा करते हुए उन्हें योग्यता और तृप्ति का सिद्धांत दिया। उनका अपना जीवन भी इस प्रकार निर्देशित और समर्पित था। उनकी उपलब्धियों पर चर्चा किए बिना, यह निश्चित रूप से सच है कि उन्होंने धर्म में अपने गहरे विश्वास से प्रेरित निरंतर आधार पर अपने आचरण का मॉडल तैयार किया था ।
यह धार्मिक सिद्धांतों में विश्वास है जिसने उन्हें गांधीवादी तरीके से प्रचारित करने में मदद की "" मतलब धर्म बन गया, हालांकि "अंत आवश्यक और व्यावहारिक हो सकता है। क्योंकि वह अनिवार्य रूप से धर्म के हिस्से के रूप में सत्य में विश्वास करते थे, इसलिए उनके लिए अपने स्वयं के स्पष्ट रूप से स्वीकार करना संभव था चाहे इस में गलतियां, दोष और अवगुण भी हो।
महात्मा गांधी जी की मृत्यु | Death of Mahatma Gandhi
भारत में जिसे राष्ट्रपिता के नाम से जाना जाता है और जिन्होंने देश की आजादी के लिए बहुत सहयोग दिया था उनकी मृत्यु 30 जनवरी सन 1948 को की गई। उनकी मृत्यु नहीं हत्या नाथूराम गोडसे द्वारा की गई थी। उनके शरीर के अंदर तीन गोलियां दागी गई थी। जब उन्होंने अंतिम साँस ली तो उनके मुख से हे राम शब्द निकला था। इस पर शोक जताते हुए एक अंग्रेज अधिकारी ने ये कहा था कि जिस गांधी को हमने इतने वर्षो कुछ नहीं होने दिया उन्हें आजाद भारत एक साल भी भी नहीं संम्भाल सका।
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