लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का जीवन परिचय, जन्म, परिवार, शिक्षा, योगदान, मृत्यु | Lokmanya Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi

“स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और में इसे हासिल करके रहूँगा।”

भारत की आजादी के लिए बहुत से योद्धाओं ने अपनी कुरबनियाँ दी हैं पर अगर भारत के आंदोलन की शुरुआत की बात करें तो लाल, बाल, पाल को कौन भूल सकता है। इन तीनों में एक बाल गंगा धर तिलक जिसे एक महान स्वतंत्रता संग्रामीं के रूप में देखा गया गया है और भारत ने इनके स्वतंत्रता की लड़ाई को महसूस भी किया है वे एक महान सवतंत्रता सेनानी ही नहीं थे पर उसके साथ एक अच्छे लीडर और शिक्षक भी थे। 

 

कौन भूल सकता है उनके उन नारे की जिन्होंने छाती ठोक के कहा था "स्वराज मेरा सिद्ध अधिकार है और में इसे पाकर ही रहूँगा"। उन्होंने भारत की आजादी के लिए जोर, शोर दोनों का प्रयोग किया था। आज हम "हिंदी पुकार" में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के जीवन परिचय इतिहास और क्रांतिकारी गतिविघियों पर नज़र डालेंगे।

 

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का जीवन परिचय | परिवार | शिक्षा | इतिहास | डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी राजनीति में योगदान | निबंध 


लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का जीवन परिचय | Biography of Lokmanya Bal Gangadhar Tilak in Hindi)


1. पूरा नाम --- केशव गंगाधर तिलक


2. जन्म तारीख
--- 23 जुलाई सन 1856


3. जन्म स्थान
--- भारत , महाराष्ट्र, रत्नागिरी जिला


4. पिता का नाम
--- गंगाधर रामचंद्र तिलक


5.  माता का नाम
--- पार्वती बाई गंगाधर


6. पत्नी का नाम
--- सत्यभामा


7.  कुल बच्चे 
--- तीन लड़के


8. लड़कों का नाम
--- रामभाऊ बलवंत तिलक, विश्वनाथ बलवंत तिलक और श्रीधर बलवंत तिलक


9.  मृत्यु तारीख
--- 1 अगस्त सन 1920


10.  मृत्यु का स्थान
--- मुंबई


11. मृत्यु के वक्त उम्र 
---  64 साल


12. राजनैतिक पार्टी का नाम
--- इंडियन नेशनल कांग्रेस



 

बाल गंगाधर तिलक का जन्म और परिवारिक जिंदगी | Birth and family life of Bal GangadharTilak



1857 का विद्रोह को कौन भूल सकता है भारतीय स्वतंत्रता सेनानी का जन्म भी 1857 के विद्रोह के समय से एक साल पहले हुआ था अर्थात 23 जुलाई 1856 को हुआ था। उनका जन्म ब्रिटिश भारत के वर्तमान महाराष्ट्र राज्य के एक छोटे से जिले में हुआ था इस जिले का नाम रत्नागिरी जिला था जो आज भी एक दुर्ग के रूप में जाना जाता है। रत्नागिरी जिले में उनके पैतृक गांव का नाम चिखली है। उनके पिता जी का नाम गंगा धर तिलक था जो एक अध्यापक थे और संस्कृत के अध्यापन का काम करते थे। 


उनकी माता जी का नाम पार्वती बाई गंगाधर था जिन्होंने शिक्षा तो कम ग्रहण की थी पर वह एक कुशल ग्रहिणी थी और धार्मिक विचारधारा रखने वाली स्त्री थी। बाल गंगाधर तिलक परिवार में ये घटना एक साल घटी थी जब वे 1871 में 16 साल के थे तब उनके पिता की मृत्यु हुई थी। इसके साथ उनकी शादी कुछ समय पहले हुई थी। उनकी शादी सत्यभामा बाई नामक लड़की से हुई थी जब वे 16 साल के थे। शादी के बाद उन्हें दोनों दम्पति को तीन बच्चे हुए थे और तीनो ही लड़के थे। उनका नाम रामभाऊ बलवंत तिलक, विश्वनाथ बलवंत तिलक और श्रीधर बलवंत तिलक था। 

 

 

बाल गंगाधर तिलक की शिक्षा का सफर | Education Journey of Bal Gangadhar Tilak

 


बाल गंगाधर तिलक की आरम्भिक शिक्षा उनके पैतृक गांव में शुरू हुई। अपनी दसवीं की शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने आगे की शिक्षा पुणे के एक प्राइवेट स्कूल से प्राप्त की थी। अगर उनके क्रन्तिकारी सफर की बात करें तो उनका क्रन्तिकारी सफर कॉलेज की शिक्षा से आरम्भ हो गया था। उन्होंने स्नातक की शिक्षा ग्रहण की और स्नातक की शिक्षा हासिल करने के बाद 1877 में मैथेमेटिक्स पढ़ाना शुरू कर दिया था। 


 

उन्होंने अपने साथियों के साथ क्रांति के बारे में शिवर लागना आरम्भ किये। वे पढ़ने में बहुत होशियार थे और अपनी पढ़ाई को उन्होंने वहीँ पर नहीं छोड़ा 1879 में उन्होंने क़ानून की पढ़ाई भी पूरी कर ली। स्कूल की सफलता ने उन्हें 1884 में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना के लिए एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली शुरू करने के लिए प्रेरित किया जिसने भारतीय संस्कृति पर जोर देते हुए युवा भारतीयों को राष्ट्रवादी विचारों को पढ़ाया। बाल गंगाधर तिलक ने अपनी पढ़ाई को सुचारु रूप से पूरा किया।


 

बाल गंगा धर तिलक का आगे का पढ़ाई के बाद का करियर | Further post-study career of Bal Ganga Dhar Tilak)

 

 

उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद राजनैनिक गतिविधियों में तो हैं पर अपना क्रन्तिकारी कैरियर शुरू कर दिया था। देश में चलने वाली क्रन्तिकारी गतिविधियों से वे आहत थे और उन्होंने समाज को जागृत करने के लिए गणित के अध्यापक का व्यवसाय छोड़ दिया और एक कुशल पत्रकार के रूप में सामने आये। यहां पर भी बल गंगाधर तिलक आलोचना के शिकार हुए। 

 

इस बात का ब्रिटिश सरकार को पता लग चुका था कि वे अपने तीसरे नेत्र के माध्यम से देश के युवाओं को जागृत कर सकते हैं इसलिए ब्रिटिशर ने उन्हें टारगेट किया और उनके प्रचार को देश की संस्कृति के लिए खतरा बता दिया इससे वे बहुत आहत हुए और उन्होंने ये सोचा किउं न देश को जागृत करने के लिए कोई और माध्यम अपनाया जाये। पत्रकार के फैसले को भी उन्होंने छोड़ दिया और इसके बाद फिर अध्यापन का सहारा लिया ताकि देश को जागृत किया जाये।

 

 

बाल गंगाधर तिलक ने की डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी | Bal Gangadhar Tilak founded Deccan Education Society)


 

अब उनका एक ही उदेश्य था वह था देश की शिक्षा में सुधार करना और देश के युवाओं को अंग्रेजी शिक्षा के बराबर करना या उच्च अंग्रेजी शिक्षा हासिल करवाना। उन्होंने अपने दोस्त के साथ मिलकर इसके बारे में विचार किया। जिन दोस्तों ने उनका साथ दिया उनका नाम था विष्णुशास्त्री चिपलूनकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गोपाल गणेश आगरकर। इन तीनों ने मिलकर एक नए इंग्लिश स्कूल की स्थापना की "डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी " रखा। 

 

इस सोसाइटी के लिए उनके साथ और भी उनके कुछ दोस्त मिले और उन्होंने इस सोसाइटी को और ज्यादा मजबूत किया। 1880 में इस कॉलेज की स्थापना की गई थी और इसमें शिक्षा का माध्यम रखा गया अंग्रेजी और हिंदी दोनों। ये स्कूल उस वक्त के मद्रास प्रेसीडेंसी में काम करने वाले अंग्रेजी स्कूल में एक था। 1885 में इस कॉलेज में कुछ परिवर्तन किये गए और इसका नाम फर्ग्यूसन कॉलेज रखा गया जो उस वक्त के मद्रास प्रेसिडेंक्सी के नाम पर रखा गया था। इस कॉलेज में शिक्षा का कार्यभार भी गोपाल कृष्ण गोखले जैसे क्रांतिकारियों को दिया गया था।



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बाल गंगाधर तिलक एक न्यूज़ रिपोर्टर के रूप में | Bal Gangadhar Tilak as a Newsreporter)



बाल गंगाधर ने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी का निर्माण किया और उसे सुचारु रूप से चलाया पर उन्हें इस बात का पूरा अनुभव था कि जब तक देश के लोगों तक क्रांति की आवाज नहीं पहुँचती है देश जागृत नहीं होंगे। इसी उदेश्य को लेकर उन्होंने 1886 में "केसरी" अखबार नाम का समाचार पत्र प्रकाशित किया जो मराठी भाषा में था और आज भी एक स्वच्छ समाचार पत्र के रूप में काम कर रहा है। 

 

केसरी समाचार पत्र की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक द्वारा 4 जनवरी 1881 में की गई थी। यहीं नहीं उनका ये उदेश्य था कि जो अंग्रेजी नहीं पढ़ सकते उनके लिए अंग्रेजी में भी समाचार पत्र की जरूरत है जो एक निष्पक्ष आवाज के रूप में काम करे इसलिए उन्होंने मह्रात्ता नामक अखबार भी निकाला ताकि अंग्रेजी भाषा में भी अखबार का उन्मूलन हो सके। 

 

अब इस बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्होंने इन समाचार पत्रों को क्यों प्रकाशित किया था इसमें सीधे एक ही मकसद था कि लोगों तक अंग्रेजी सरकार की नीतियों का खुलाशा हो सके। और समाचार पत्रों से उन्होंने किया भी ऐसा ही जिससे लोग जागृत हुए और देश में क्रांति की लहर आगे बढ़ी।


 

बाल गंगाधर तिलक राजनीति और स्वदेशी आंदोलन में योगदान | Bal Gangadhar Tilak's contribution to politics

 

बाल गंगाधर तिलक में क्रन्तिकारी गतिविधियां पहले से ही थी और उन्होंने राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से 1890 में भाग लिया जब उंहोने भारती राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यशैली पर विश्वास किया। ये बात ठीक है कि उन्होंने महात्मा गाँधी की विचारधाराओं को अपनाया था और उनपर विश्वास भी करते थे। पर महात्मा गाँधी और उनकी विचारधारा में एक ही फर्क था कि वे देश की आजादी के लिए दोनों हो पक्षों को अपनाते थे चाहे वे हिंसा हो या अहिंसा हो। 

 

 

उनका ये विश्वास था कि अगर देश को आजाद करवाने के लिए विरोध प्रदर्शन भी करना पड़े तो जरूरी है। अपने क्रन्तिकारी तेवर उन्होंने 1897 में दिखाने शुरू कर दिए थे जब उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध भाषण दिया था। इस भाषण के जुर्म में उन्हें अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था वे जानते थे कि आजादी इस तरह से प्राप्त नहीं होगी और आजादी के लिए लड़ना पड़ेगा। वे देश के लिए लगभग 18 महीने तक जेल में रहे। अब उन्होंने राजनीति में एक मुकाम हासिल कर लिया था और ब्रिटिशर भी उनकी क्रांतिकारी चेतना से होशियार हो गए थे। अंग्रेज उन्हें अशांति का दूत कहकर पुकारने लगे थे।


जब भारत में स्वदेशी आंदोलन आया तो उन्होंने स्वदेशी आंदोलन से लोगो को सचेत करवाया। उनके पास लोगों को जगाने का एक ही साधन था वह था अखबार उन्होंने अपनी दैनिक और साप्ताहिक पत्रिकाओं में लोगों को विदेशी वश्तुएँ वरतने और स्वदेशी वस्तुओं को प्रयोग में लाने के लिए अभियान चला रखे थे। 


1909 में पुरे देश में मिंटो मार्ले का विरोध चल रहा था इसके चलते उनके दो दोस्तों ने लाला लाज पतराये, और विपिन चंद्र पाल ने उनसे आग्रह किया कि वे मार्ले मिंटों के विरोध में अपने अखबार में लिखे। उन्होंने वही किया और उनके ऊपर ब्रिटिशर ने देश द्रोह का मुकदमा चलाया। इस जुर्म में उन्हें फिर से जेल जाना पड़ा।

 
बाल गंगाधर तिलक मृत्यु (Death)


बाल गंगा धर तिलक स्वराज के लिए लड़ते रहे और भारत का सपूत एक अगस्त 1920 को 64 साल की उम्र में इस दुनिया को छोड़कर चले गए। आज भी ऐसे क्रांतिकारियों को देश याद करता है। वे एक क्रन्तिकारी ही नहीं थे उसके साथ एक सच्चे अध्यापक भी थे।


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Rakesh Kumar

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