सामाजिक परिवर्तन के 6 प्रमुख कारक और कारण | 6 Major Factors and Causes of Social Change in Hindi

सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख कारक और कारण :-

समाज गतिशील है और यह लगातार बदलता रहता है। जनसांख्यिकीय, तकनीकी, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षिक जैसे विभिन्न कारकों के कारण सामाजिक परिवर्तन होता है। ये कारक अक्सर एक साथ काम करते हैं जिसके परिणामस्वरूप या तो क्रमिक तरीके से या समानांतर में भी कुछ परिवर्तन होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है और समय के साथ के साथ एक समाज में परिवर्तन आते रहते हैं। सभी समाजों में हर समय परिवर्तन होता रहता है। कभी-कभी ये परिवर्तन अचानक होता है कभी कभी एक समाज में परिवर्तन धीरे -धीरे होता है जिसका अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है। जब पुरानी व्यवस्था को बदलने के लिए एक क्रांति होती है। सामाजिक परिवर्तन विभिन्न कारकों के कारण होता है। इन्हें मोटे तौर पर इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है।



 (I) अंतर्जात-आंतरिक कारकों को संदर्भित करता है, बुनियादी सुविधाओं को लोगों के बीच उनके वितरण और उन तक उनकी पहुंच को संदर्भित करता है।


(II) बहिर्जात: यह परिवर्तन के बाहरी कारकों को संदर्भित करता है। ये कारक मानव नियंत्रण से परे हो सकते हैं जैसे रोग और प्रौद्योगिकी में अप्रत्याशित परिवर्तन।सामाजिक परिवर्तन के लिए विभिन्न कारक उत्तरदाई है आइये इन कारकों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।

1. जनसांख्यिकीय कारक :-

जनसांख्यिकीय कारकों का मतलब उन कारकों से है जो जनसंख्या की संख्या और संरचना में परिवर्तन से जुड़े हैं। जनसंख्या के आकार में परिवर्तन का लोगों के आर्थिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है जो आगे चलकर जीवन के अन्य पहलुओं को प्रभावित कर सकता है।

जनसंख्या में वृद्धि बेरोजगारी, कुपोषण, गरीबी और आवास की समस्याएं पैदा करती है। इसलिए, किसी देश की जनसंख्या के आकार और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है। जब भी किसी देश की जनसंख्या में बढ़ोतरी होती है तो सामाजिक परिवर्तन आना सव्भाविक हो जाता है। भारत एक विशाल देश है और अगर जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो भारत दूसरा देश है जिसकी जनसंख्या सबसे ज्यादा है।

इसलिए अगर भारत को पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक देखें तो समाज में कई परिवर्तन सामने आते हैं। जब भी जनसंख्या में बदलाव आता है तो इसके साथ ही अन्य परिवर्तन भी सामने आते हैं। वेश भूषा, तरक्की, समाज में बुराइयां और अच्छाइयाँ समाज में जनसख्या के बदलाव से ही निर्भर करते हैं।


2. सामाजिक परिवर्तन के तकनीकी कारक :-

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज की बढ़ती हुई तकनीक ने भारत को हर पहलु में तरक्की की राह पर लाया है। तकनीकी उन्नति समाज में परिवर्तन के महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। तकनीकी रूप से अधिक उन्नत समाजों में सामाजिक परिवर्तन अधिक तेजी से होता है। 

अगर कोई भी देश तकनीकी रूप से आगे है तो इससे देश का विकास निश्चित होता है और देश उन्नति की रह पर चलता है। जब भी तकनीक विकसित होती है तो एक दम से देश में रोजगार के साधन आगे बढ़ते हैं और समाजिक परिवर्तन आते हैं ये सामाजिक परिवर्तन बहुत तेजी से होते हैं। 

आज अगर पश्चिम देशों की बात करें तो इन देशों में सामाजिक परिवर्तन बहुत तेजी से हुआ है और यह केवल तकनीक में विकास का कारण ही संभव हुआ है। तकनीकी नवाचार, खोज और प्रसार एक पारंपरिक समाज में सामाजिक परिवर्तन की गति को तेज करते हैं। समाज का तकनीकी कारक है जिसने विज्ञानं में रक्षा में और देश के अन्य पहलु में बदलाव ला दिया है।

3. सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारक :-

सामाजिक परिवर्तन के तकनीकी पहलु के उलट अगर सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक पहलु को देखा जाये तो इसमें परिवर्तन बहुत धीरे होता है। संस्कृति किसी भी देश की धरोहर होती है और संस्कृति में भी बदलाव या Change (परिवर्तन) आते रहते हैं। अगर हम भारत की बात करें तो इसकी संस्कृति में भी बदलाव धीरे धीरे हुए हैं। किसी भी देश की संस्कृति में बदलाव भौतिकवादी पहलु से बिलकुल अलग है। 

अर्थात ये परिवर्तन भोग विलास से नहीं जुड़े हुए हैं ये ही कारण है की सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक पहलु को धीमा कहा जाता है। हाँ समय के साथ सामाजिक परिवर्तन के इस पहलु में भी परिवर्तन आये हैं पर ये बदलाव क्रमिक हैं जो समय और जरूरत के हिसाब से बदले हैं। नए सांस्कृतिक मूल्य और विश्वास प्रणाली भी सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न कर सकते हैं। 

जबकि भौतिकवादी परिवर्तन, जैसे कि नई तकनीक, आसानी से अपनाए जाते हैं, लेकिन समाज के गैर-भौतिकवादी पहलुओं, जैसे संस्कृति, में परिवर्तन बहुत धीमी गति से होते हैं। प्रसार जनसंचार माध्यमों के माध्यम से भी होता है क्योंकि यह बड़ी संख्या में लोगों को सूचना प्रसारित और प्रसारित करता है। इसने व्यक्तिगत संस्कृतियों के तत्वों को दूर के लोगों तक फैलाकर परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज किया है और इस प्रकार सांस्कृतिक आधुनिकीकरण का एक रूप है।


3. प्रौद्योगिकी कारक या कारण :-

प्रौद्योगिकी और तकनीक में अंतर करें तो तकनीक चीजों को करने का एक तरीका या शैली है, जबकि तकनीक गैजेट के काम करने के पीछे वैज्ञानिक सिद्धांतों का अनुप्रयोग है। उपकरणों को स्मार्ट और अधिक कुशल बनाने के लिए प्रौद्योगिकी आगे बढ़ती रहती है। अलग-अलग लोगों के पास एक ही तकनीक का उपयोग करने की अलग-अलग तकनीकें होती हैं। किसी भी समाज में प्रौद्योगिकी कारकों के कारण भी परिवर्तन आते हैं। 

प्रौद्योगिकी में प्रगति के कारण, पारंपरिक समाजों में श्रम का सरल विभाजन श्रम विभाजन के जटिल रूप में बदल गया है। औद्योगीकरण के साथ, उत्पादन घरों से कारखानों में चला गया और कार्यबल की व्यावसायिक संरचना बड़े पैमाने पर कृषि से तेजी से बड़े औद्योगिक कार्यबल में बदल गई। प्रौद्योगिकी में विकास के कारण एक वह समाज जो पुराने क्रियाकलापों से जुड़ा हुआ होता है बदल जाता है। आज अगर देखा जाये तो प्रौद्योगिकी में विकास के साथ भारत में ही नहीं सभी देशों में सामूहिक परिवर्तन देखने को मिले हैं।


4. सामाजिक परिवर्तन के राजनीतिक कारक :-

देश चाहे कोई भी हो आदि काल से किसी भी समाज में राजनीतिक कारणों में समाज के क्रियाकलापों के निर्धारित किया है। राजनीति में बदलाव के कारण किसी भी समाज के आर्थिक और सामाजिक पहलु बदल जाते हैं। राजनीति में बदलाव के साथ कानून व्यवस्था में बदलाव आ जाता है और कानून में बदलाव के साथ सामाजिक परिवर्तन आ जाते हैं। पहले भारतीय राजनीती का स्वरूप कुछ और था पर समय के साथ आज राजनीतिक क्रम बदल चूका है। 

आजादी के बाद जहां उत्तर प्रदेश में 1 दिन के मुख्यमंत्री बनाये गए वहीँ अटल बिहारी वाजपेई को 13 दिन के भारत की कुर्सी को संभालना पड़ा। कहीं भारत में दक्षिण भारत से चुने गए प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव हैं वही उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश की राजनीती ने भारत को 9 प्रधानमंत्री दिए हैं। इसी राजनितिक फेर बदल के साथ हर समाज में सामाजिक परिवर्तन आते रहते हैं। राजनीतिक कारक जैसे चुनाव, विधान और जनमत आदि भी सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

कानून समाज में सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन के एक साधन के रूप में कार्य करते हैं। हालाँकि, अकेले कानून किसी दिए गए समाज में लंबे समय से स्थापित विश्वास प्रणालियों और परंपराओं को नहीं बदल सकते हैं। कानूनों के प्रभावी होने के लिए जनमत को लामबंद करना भी आवश्यक है।


5. आर्थिक कारक या कारण :-

सामाजिक परिवर्तन किसी भी समाज में आते रहते हैं और आर्थिक पहलु किसी भी समाज में सामाजिक परिवर्तन का बेजोड़ पहलु है। अगर कोई भी समाज या देश अगर आर्थिक रूप से मजबूत है तो उसके सांस्कृतिक और सामाजिक पहलु मजबूत होते हैं। आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ देश या फिर समाज अन्य किसी भी समाज के पहलु को आगे लेकर नहीं ले जा सकता है। आर्थिक कारक सामाजिक परिवर्तन की मात्रा और दिशा को भी प्रभावित करते हैं। 

कार्ल मार्क्स का मानना ​​था कि सामाजिक परिवर्तन बुर्जुआ और सर्वहारा वर्ग के वर्ग संघर्ष का परिणाम है। मार्क्स का विचार था कि पूंजीपतियों के खिलाफ श्रमिकों द्वारा की गई क्रांति पूंजीवाद की बुराइयों को समाप्त कर देगी और एक समाजवादी समाज की स्थापना की ओर ले जाएगी। औद्योगीकरण और हरित क्रांति का भी समाज में दूरगामी प्रभाव पड़ा। 

हाँ किसी भी समाज में सामाजिक परिवर्तन उसके आर्थिक पहलु को तभी छूटा है जब उस समाज में आर्थिक पक्ष को देखा जाये अगर आज विश्व की बात करें तो पूरा समाज दो आर्थिक रूप से पहलु सामने लेकर आया है एक पूँजीवाद और दूसरा समाजवाद। पहलु चाहे कोई भी पर समाज का आर्थिक कारक एक समाज में समाजिक परिवर्तन का जरूरी कारक या कारण बना हुआ है।

6. सामाजिक परिवर्तन के शैक्षिक कारक :- :

किसी भी समाज में जब भी परिवर्तन आता है तो उसके पीछे शिक्षा का भी बहुत योगदान है। एक शिक्षित समाज समाज में सामाजिक परिवर्तन लाता है। शिक्षित समाज ही समाज के विभिन पहलुओं जैसे संस्कृति, कला और ज्ञान में अपनी भूमिका निभाता है। शिक्षित समाज ही समाज के उच्तर मूल्यों को आगे लेकर जाता है। और अगर शिक्षित समाज के विचार उच्च हैं तो वे विचार समाज में नए मूल्यों का सृजन करते हैं। 

शिक्षा में परिवर्तन और सुदृढ़ता लेकर ही किसी भी समाज में एकता का नया रूप सामने आता है और किसी भी देश में शिक्षित समाज की वजह से सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण होता है। शिक्षा के कारण ही एक अच्छे नागरिक का निर्माण भो होता है।
Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

Please Select Embedded Mode To Show The Comment System.*

और नया पुराने