क्या है समाज ? समाज के विभिन्न प्रकार और रूप :-
समाज एक ऐसी इकाई है जिसमें कुछ नियम होते हैं और उन नियमों का पालन करना पड़ता है अर्थात एक मनुष्य के लिए बहुत जरुरी होता है। समाज में कई समूह और उपसमूह होते हैं जिससे समाज बनता है। अगर समज समाज की बात करें तो यह आज नहीं मनुष्य सभ्यता के सदियों के प्रयास से अस्तित्व में आया है। इस पोस्ट में हम जानने की कोशिश करेंगे की समाज क्या है समाज के प्रकार कौन-कौन से हैं अर्थात समाज के रूप कौन-कौन से हैं।
समाज क्या है ? What is Society ?
एक समाज सामान्य हितों, विश्वासों या पेशे के कारण एक साथ काम करने वाला या समय-समय पर मिलने वाला एक संगठित समूह है। इसमें स्थायी और सहयोगी सामाजिक समूह जिसके सदस्यों ने एक दूसरे के साथ बातचीत के माध्यम से संबंधों को स्थापित किया जाता है। एक समुदाय, राष्ट्र, या समान परंपराओं, संस्थानों और सामूहिक गतिविधियों और हितों वाले लोगों के व्यापक समूह को समाज कहा जा सकता है।
समाज समुदाय का एक हिस्सा जो विशेष उद्देश्य या जीवन स्तर या आचरण के मानकों से अलग एक इकाई है: एक सामाजिक मंडल या स्पष्ट रूप से चिह्नित पहचान वाले सामाजिक मंडल का समूह है जिसे समाज के रूप में देखा जा सकता है।
समाज के प्रकार | Samaj ke prakar
वैसे अगर समाज की बात करें तो समाज के कई रूप या प्रकार हैं। इस पोस्ट में हम समाज के रूप या समाज के प्रकारों की विवेचना वैदिक काल से करने की कोशिश करेंगे। .अगर आप सोचते हैं कि दुनिया में सबसे पुराणी सभ्यता कौन सी है और उससे ही समाज का निर्माण हुआ है तो सबसे पुराणी सभ्यता सुमेरी सभ्यता है।
हाँ इस बात को कहा सकता है कि सुमेरी सभ्यता में समाज कैसा था अर्थात मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी संपन्नता, शहरी जीवन, विशाल एवं समृद्ध साहित्य, गणित और खगोलविद्या के लिए जानी जाती थी। तो वक्त भी समाज को आर्थिक दृष्टि से बांटा गया था।
वैदिक काल में समाज के रूप या प्रकार :-
वैदिक काल में समाज के रूप या प्रकार :-
वैदिक काल में समाज चार भागों में बंटा हुआ था और इसके चार रूप या प्रकार थे जिन्हे व्यवसाय या आर्थिक दृष्टि से बांटा गया था। चार वर्ग थे ब्राह्मण , क्षत्रिय, वेश्या और शूद्र। चारो समाज के अपने काम थे। ब्राह्मण समाज का काम लोगों में Customs जैसे मन्त्र उच्चारण या फिर वेद की विधियों का प्रचलन करना था दूसरी और क्षत्रिय युद्ध कौशल के लिए, वेश्या समाज व्यापार के लिए और शूद्र वर्ग अन्य छोटे कामों के लिए जाने जाते थे। इस प्रकार वैदिक काल में समाज के चार रूप या प्रकार देखे जा सकता थे।
मध्यकाल में समाज के रूप प्रकार :-
अगर मध्यकाल के प्रकारों की बात करें तो समाज समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बंट चूका था। मध्यकाल में समाज का विकास हुआ और समाज के कई प्रकार समाने आये जैसे आर्थिक दृष्टि से कृषक समाज बना। राजनीतिक दृष्टि से राजनीतिक संगठन बने और सामाजिक सुधारों की दृष्टि से समाज के भी कई वर्ग सामने आये।
अगर मध्यकाल के प्रकारों की बात करें तो समाज समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बंट चूका था। मध्यकाल में समाज का विकास हुआ और समाज के कई प्रकार समाने आये जैसे आर्थिक दृष्टि से कृषक समाज बना। राजनीतिक दृष्टि से राजनीतिक संगठन बने और सामाजिक सुधारों की दृष्टि से समाज के भी कई वर्ग सामने आये।
इस समाज का निर्माण रोमन सभ्यता के पतन के बाद सामने आया। मध्य युग में समाज का एक ही रूप और प्रकार था उसका नाम था सामंतवादी समाज जिसमें सामाजिक प्रथा और अलग- अलग नियमों का आभाव था। मध्ययुगीन समाज मुख्य रूप से ईसाई, कृषि प्रधान और सामंती प्रकृति का था। जबकि चर्च ने समाज को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में निर्वाह खेती जीवन का एक प्रमुख तरीका था। इसके अलावा, समुदायों में एक सामंती सामाजिक पदानुक्रम भी मौजूद था।
आधुनिक युग में समाज के प्रकार :-
आधुनिक युग में समाज के प्रकार :-
आधुनिक युग में मनुष्य ने आर्थिक दृष्टि से दौड़ लगाना शुरू कर दिया और समाज के अलगअलग रूप समाने आने लगे। पश्चमी समाज जो विकास में आगे बढ़ा और उसे विकसित समाज का नाम दिया गया इसके बाद पूर्वी समाज जिसने विकास की दौड़ में कदम नहीं रखा और उसे विकासशील समाज का नाम दिया गया। विसकसित और विकासशील समाज में कई उप समूह सामने आने लगे जैसे कृषक समाज, शिक्षक समाज, औद्योगिक समाज, पशुपालक समाज, उद्यान समाज आदि।
कार्ल मार्क्स समाज के प्रकार :-
मार्क्स ने मुख्य तौर से समाज के 6 प्रकार बताएं हैं आदिम साम्यवाद समाज , दास समाज, सामंतवाद समाज , पूंजीवाद समाज , समाजवादी समाज और वैश्विक या राज्यविहीन साम्यवादी समाज।
स्पेंसर के अनुसार समाज के प्रकार :-
कार्ल मार्क्स समाज के प्रकार :-
मार्क्स ने मुख्य तौर से समाज के 6 प्रकार बताएं हैं आदिम साम्यवाद समाज , दास समाज, सामंतवाद समाज , पूंजीवाद समाज , समाजवादी समाज और वैश्विक या राज्यविहीन साम्यवादी समाज।
स्पेंसर के अनुसार समाज के प्रकार :-
स्पेंसर का वर्गीकरण हर्बर्ट स्पेंसर ने समाजों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत करने के लिए दो अत्यंत भिन्न प्रकारों का भी निर्माण किया था पहला उग्रवादी या सैन्य समाज और दूसरा औद्योगिक समाज। स्पेंसर के अनुसार पहले समाज में में विनियमन प्रणाली प्रमुख थी और समाज की दूसरी इकाई में में स्थायी प्रणाली पर जोर दिया गया था।
अगर समाज के सभी रूप और प्रकार की व्याख्या न की जाये तो समाज के मुख्य रूप से प्रकार ही समाने आते हैं उनमे हैं प्रारम्भिक समाज जब मनुष्य अस्तित्य में आया दूसरा विकासशील समाज और तीसरा समृद्ध और उन्नत समाज जिसकी व्याख्या निम्नलिखत दी गई।
अगर समाज के सभी रूप और प्रकार की व्याख्या न की जाये तो समाज के मुख्य रूप से प्रकार ही समाने आते हैं उनमे हैं प्रारम्भिक समाज जब मनुष्य अस्तित्य में आया दूसरा विकासशील समाज और तीसरा समृद्ध और उन्नत समाज जिसकी व्याख्या निम्नलिखत दी गई।
समाज के 3 प्रकार:-
1. प्राम्भिक समाज या पूर्व- विकासशील समाज :-जब मनुष्य धरती पर रहना शुरू किया उस वक्त के समाज को प्रारम्भिक समाज का नाम दिया जाता है। जब इंसान ने इस धरती पर रहने या फिर जीने के तरीके ढूंढ़ने की कोशिश की थी उस वक्त समाज का इतना विकास नहीं हुआ था। मानव भोजन की तलाश में इधर उधर घूमता था। उस वक्त को का समाज एक पाषाण समाज था अर्थात जंगली जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरता था। उस वक्त समाज की एक ही इकाई थी व था परिवार।
मनुष्य अपने परिवार में रहकर शिकार करके अपने भोजन की तलाश करता था। उस वक्त का समाज एक जटिल समाज नहीं था हाँ उस वक्त का समाज जटिल इस लिए नहीं था कि कोई ज्यादा नियम नहीं थे अगर आज के समाज की बात करें तो आज समाज में कई नियम हैं। प्रारंभिक समाज मुख्य रूप से दो भागों में बंटा हुआ था अर्थात दो ही रूप का प्रकार थे एक पुरुष समाज और दूसरा समाज स्त्री समाज। पुरुष समाज शिकार करता था और स्त्री समाज उसे पका कर परिवार रूपी समाज चलाते थे।
प्रारंभिक समाज के बाद मनुष्य ने खेती करना सीखा और समाज में विकास होने लगा जिससे समाज का नया रूप या प्रकार सामने आने लगा जिसे विकासशील समाज का नाम दिया गया।
2. विकासशील समाज:-
प्रारंभिक समाज के बाद मनुष्य ने खेती करना शुरू कर दिया और एक अब मनुष्य ने इधर- उधर घूमने की वजाये एक जगह पर छत बनाकर रहना शुरू क्र दिया। विकासशील समाज वह होता है जिसमें विकास की और मनुष्य अग्रसर होता है पर संसाधनों की कमी से वह विकास नहीं कर पता है। विकासशील समाज में इंसान ने कृषि, पशुपालन और वागवानी जैसे व्यवसाय को ज्यादा महत्ता दी। विकाशसील समाज में कृषि का मुख्य उद्देश्य व्यापार नहीं था बल्कि अपना गुजारा करना ही होता था।
प्रारंभिक समाज के बाद मनुष्य ने खेती करना शुरू कर दिया और एक अब मनुष्य ने इधर- उधर घूमने की वजाये एक जगह पर छत बनाकर रहना शुरू क्र दिया। विकासशील समाज वह होता है जिसमें विकास की और मनुष्य अग्रसर होता है पर संसाधनों की कमी से वह विकास नहीं कर पता है। विकासशील समाज में इंसान ने कृषि, पशुपालन और वागवानी जैसे व्यवसाय को ज्यादा महत्ता दी। विकाशसील समाज में कृषि का मुख्य उद्देश्य व्यापार नहीं था बल्कि अपना गुजारा करना ही होता था।
अब मनुष्य ने शिकारी समाज को छोड़ कर कृषक समाज का गठन का निर्माण किया था। इस प्रकार समाज का नया रूप या प्रकार सामने आया था जिसे कृषक समाज का नाम दिया गया। अगर आज के समाज की बात करें तो पूर्वी समाज को विकसित समाज या विकसशील समाज की संज्ञा दी जा सकती है और पशचमी समाज एक विकसित समाज के रुओ में देखा जा सकता है।
3. उन्नत समाज या विकसित समाज (एडवांस्ड सोसाइटी) :-
विकासशील समाज के बाद उन्नत समाज का विकास हुआ। उन्नत समाज कृषि में, स्वास्थय में, सुचना और संचार में, वास्तुकला में, शिक्षा में, परिवहन में और अन्य क्षेत्र में विकास के बाद अस्तित्व में आया। अगर उन्नत समाज को परिभाषित करने की कोशिश करें तो उन्नत समाज वह है जिसमें जटिल कार्य होते हैं, जिसने वास्तुकला और कृषि जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। एक उन्नत समाज में अपने रहने वालों के लाभ के लिए कुछ निर्दिष्ट और कुछ हद तक स्थिर शासन और वैज्ञानिक क्षेत्र में एक शक्ति प्राप्त होती है।
विकासशील समाज के बाद उन्नत समाज का विकास हुआ। उन्नत समाज कृषि में, स्वास्थय में, सुचना और संचार में, वास्तुकला में, शिक्षा में, परिवहन में और अन्य क्षेत्र में विकास के बाद अस्तित्व में आया। अगर उन्नत समाज को परिभाषित करने की कोशिश करें तो उन्नत समाज वह है जिसमें जटिल कार्य होते हैं, जिसने वास्तुकला और कृषि जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। एक उन्नत समाज में अपने रहने वालों के लाभ के लिए कुछ निर्दिष्ट और कुछ हद तक स्थिर शासन और वैज्ञानिक क्षेत्र में एक शक्ति प्राप्त होती है।
समाजशास्त्र में आर्थिक और भौतिक व्यवस्था के अनुसार समाज के प्रकार | Types of society according to economic and physical system in sociology
पाषाण युग और मध्यकाल काल को छोड़कर आज अगर समाज के रूप या समाज के प्रकारों की बात करें तो मानव समाज या 195 देश दो समज या दो प्रकार के समाज में बंट चूका है और वे समाज आर्थिक दृष्टि से बंटे हुए हैं जिसके नाम हैं पूंजीवाद समाज और समाजवादी समाज। जिन्हे निम्नलिखत तरीके से elaborate किया जा सकता है। हालाँकि इन दोनों समाज में कहीं न कही किसी न किसी परिश्थिति में अंतर जरूर आया है।
1. पूंजीवादी समाज:-
पूजीवादी समाज एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें उत्पादन के साधनों का निजी स्वामित्व होता है। उत्पादन के माध्यम से, हमारा मतलब हर चीज से है- भूमि, उपकरण, प्रौद्योगिकी, इत्यादि- जो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लिए आवश्यक है।
1. पूंजीवादी समाज:-
पूजीवादी समाज एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें उत्पादन के साधनों का निजी स्वामित्व होता है। उत्पादन के माध्यम से, हमारा मतलब हर चीज से है- भूमि, उपकरण, प्रौद्योगिकी, इत्यादि- जो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लिए आवश्यक है।
पूंजीवाद का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य व्यक्तिगत लाभ की खोज है। व्यक्ति अपने स्वयं के धन को अधिकतम करने की कोशिश करते हैं, समग्र रूप से समाज को लाभ होता है। माल का उत्पादन होता है, सेवाएं प्रदान की जाती हैं, लोग उन वस्तुओं और सेवाओं के लिए भुगतान करते हैं जिनकी उन्हें आवश्यकता और इच्छा होती है, और अर्थव्यवस्था और समाज समग्र रूप से समृद्ध होता है।
यूएसए, ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, इटली, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, ग्रीस, पाकिस्तान और तुर्की मुख्य पूंजीपति देश हैं जो पूंजीवाद समाज का निर्माण करते हैं।
2. समाजवादी समाज:-
2. समाजवादी समाज:-
पूंजीवादी समाज के विपरीत समाजवादी समाज का सबंध उन लोगों के विपरीत हैं जिन्हें सिर्फ पूंजीवाद के लिए सूचीबद्ध किया गया है और कार्ल मार्क्स द्वारा सबसे प्रसिद्ध रूप से लिखा गया था। समाजवाद एक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें उत्पादन के साधन सामूहिक रूप से स्वामित्व में होते हैं, आमतौर पर सरकार के पास। जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में कई एयरलाइन हैं जो एयरलाइन निगमों के स्वामित्व में हैं, एक समाजवादी समाज में एक सरकारी स्वामित्व वाली एयरलाइन हो सकती है।
समाजवाद का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य व्यक्तिगत लाभ की खोज नहीं है, बल्कि सामूहिक भलाई के लिए काम करना है: समाज की जरूरतों को व्यक्ति की जरूरतों से ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण, व्यक्ति लाभ के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं करते हैं; इसके बजाय वे सभी की भलाई के लिए मिलकर काम करते हैं। यदि पूंजीवाद के तहत सरकार को अर्थव्यवस्था को अकेला छोड़ देना चाहिए, तो समाजवाद के तहत सरकार अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है। चीन, क्यूबा, लाओ, वियतनाम, अल्जीरिया, पुर्तगाल , उत्तरी कोरिया जैसे देश समाजवादी समाज का निर्माण करते हैं।
निष्कर्ष :- हालाँकि समाज एक ऐसी धारणा है जिसके प्रकारों को जानना और उसका विभाजन करना मुश्किल है क्यों कि आगे समाज और उप समाजों में बंटा हुआ है। साधारण रूप से देखा जाये तो समाज के के रूपों को हंटिंग सोसाइटी, कृषक समाज, ओद्योगिक समाज, शिक्षक समाज, वैज्ञानिक समाज, विद्यार्थी समाज भी अन्य उप समाजों में बांटा जा सकता है।
समाजवाद का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य व्यक्तिगत लाभ की खोज नहीं है, बल्कि सामूहिक भलाई के लिए काम करना है: समाज की जरूरतों को व्यक्ति की जरूरतों से ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दृष्टिकोण के कारण, व्यक्ति लाभ के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं करते हैं; इसके बजाय वे सभी की भलाई के लिए मिलकर काम करते हैं। यदि पूंजीवाद के तहत सरकार को अर्थव्यवस्था को अकेला छोड़ देना चाहिए, तो समाजवाद के तहत सरकार अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है। चीन, क्यूबा, लाओ, वियतनाम, अल्जीरिया, पुर्तगाल , उत्तरी कोरिया जैसे देश समाजवादी समाज का निर्माण करते हैं।
निष्कर्ष :- हालाँकि समाज एक ऐसी धारणा है जिसके प्रकारों को जानना और उसका विभाजन करना मुश्किल है क्यों कि आगे समाज और उप समाजों में बंटा हुआ है। साधारण रूप से देखा जाये तो समाज के के रूपों को हंटिंग सोसाइटी, कृषक समाज, ओद्योगिक समाज, शिक्षक समाज, वैज्ञानिक समाज, विद्यार्थी समाज भी अन्य उप समाजों में बांटा जा सकता है।