जानिए भारत में पनपती सामाजिक बुराइयाँ के बारे में, हल करने के प्रयास जरूरी | Know about the social evils growing in India, Efforts are necessary to solve them in Hindi

भारतीय समाज में बढ़ती सामाजिक कुरीतियां, समाधान और कोशिश जरुरी  :- 

भारत एक विशाल देश है। भारत उप -महादीप खा जाये तो इसमें कोई भी शंका वाली बात नहीं होनी चाहिए। क्रमवार भारत में समय के साथ कई चुनौतियों को देकः है और उन चुनौतियों से लड़ते हुए उस पर विजय हासिल करके अपना नाम दुनिया में कमाया है। अगर भारत एक महान देश है तो उसमें रहने वाले नागरिकों को कई सामाजिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। भारत में कुछ समस्यायें ऐसी हैं जो मध्यकाल से Face करनी पद रही है कुछ ऐसी चुनौतियां है .

आज भी भारत में पनप रही हैं। भारत में पनप रही चुनौतियों और कुरीतियां का सामना करते हुए आज भारत में समाज आज भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। आज भारत एक लोकतंत्र देश होने के बावजूद, जहां लोगों की सरकार होती है विभिन्न सामजिक समस्यायों का सामना करना पड़ रहा है। आज हम इस पोस्ट में हिंदी पुकार में भारतीय समाज में जो भी समस्याएं हैं ौंके बारे में और उनपर कैसे काबू पाया जा सकता है उसके बारे में चर्चा करने की कोशिश करेंगे।

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 भारतीय समाज की बुराईयां और कुरीतियां 



क्या होती है सामाजिक बुराइयां ? अर्थ और परिभाषा

सामाजिक बुराइयाँ वे मुद्दे हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी समाज के सदस्यों को प्रभावित करते हैं और नैतिक मूल्यों के संबंध में विवाद या समस्या का विषय माने जाते हैं। सामान्य सामाजिक बुराइयों में शामिल हैं: जाति व्यवस्था, गरीबी, दहेज प्रथा, लैंगिक असमानता, निरक्षरता आदि। सदियों से समाज पर हावी होने वाली सामाजिक बुराइयों और अंधविश्वासों ने समाज और जनता के विकास के लिए सामाजिक सुधारों को अनिवार्य बना दिया। 

19वीं शताब्दी में, नव शिक्षितों ने कठोर सामाजिक परंपराओं और पुराने रीति-रिवाजों के खिलाफ तेजी से विद्रोह किया। वे अब तर्कहीन और अमानवीय सामाजिक प्रथाओं को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। इसके अलावा, भारतीय समाज की पिछड़ी विशेषताओं, जैसे कि जाति व्यवस्था या लिंगों की असमानता पर अतीत में धार्मिक प्रतिबंध थे। इसलिए, धार्मिक प्रथाओं में भी सुधार करना आवश्यक था।


1. भारत में पहली सामाजिक बुराई जातिवाद

हालाँकि हम सभी जानते हैं कि मनुष्य का जन्म होता है तो भगवान् से किसी जाति विशेष का ठप्पा साथ लेकर नहीं आता है वह जन्म के समय एक शिशु होता है और जो संस्कार जैसे सिखाया जाता है वही करता है। उसके बाद उसकी जाति उसे बता दी जाती है और जब भी भविष्य में उसके बारे में पूछा जाता है की ये लड़का या लड़की किसकी है तो उसके माँ बाप का नाम नहीं लिया जाता और उसकी जाति विशेष का नाम लिया जाता है चाहे अच्छा काम किया हो हो या फिर गलत। अब आप सोचते होंगे कि ये जाति बनाने वाला है कौन तो ये किसी पैगम्बर, गुरु या भगवान् ने नहीं बनाई है। 


जातिवाद जो आज भारत में एक सामाजिक बुराई है उसे इंसान ने ही ने ही बनाया है। समाज चार वर्गों में कब बंटा था अर्थात वर्ण व्यवस्था भारत में कब आई थी, इसका सीधे से एक ही जवाब होगा कि भारत में जाति को चार भागों में वैदिक काल में बांटा गया था। जिसमें चार वर्ण। वेस्य, शूद्र, क्षत्रिय और ब्राह्मण थे। और इसका बंटवारा किसी आरक्षण या भेदभाव के नाम पर नहीं किया गया था पर समय के साथ समाज में जाति के नाम पर कई बुराइयां सामने आने लगीजाति वाद ने मध्यकाल में भारत में इतने पैर पसार लिए कि जाती वाद ने एक दानव का रूप धारण कर लिया और जाति को छोटी और बड़ी कहा जाने लगा। भारत में 1950 जारी किया गया,कि जिसमें भारत के 29 राज्यों में कुल 1108 जातियाँ हैं। ये सरकारी आंकड़ा है इसके इलावा भारत में जाति में जाती निकलना कोई बड़ी बात नहीं है।


भारत में जातिवाद एक सामाजिक बुराई क्यों ?

जाति का होना एक बुराई नहीं है हर वर्ग की जाति होती है पर भारत में जातिवाद शब्द एक बुराई बन चुकी है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में जातिवाद को रोकने के लिए कई नियम बनाये गए हैं पर आज भी भारत में जातिवाद एक बुराई है क्योकि आज भी भारत के हर राज्य में जाति के नाम पर वोट मांगे जाते हैं, एक विशेष जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों के साथ समाजिक गतिविधियों में भाग नहीं लेते हैं इसलिए आज भी भारत में जातिवाद जैसे शब्द ने विकराल रूप धारण किया हुआ है।


क्या हल हो सकता है?

वैसे तो सदियों से चली आती हुई इस प्रथा का हल ढूंढ़ना मुश्किल सा प्रतीत होता है। इसके पीछे कारण ये भी हो सकता है कि जो उच्च जाति के लोग हैं वे अपनी जाति को विशिष्ट मानते हैं और जो दूसरे वर्ग के लोग हैं वे इस बात पर अड़े हुए हैं कि जाति के नाम पर हमें भारतीय सविंधान ने कुछ अधिकार दिए हुए है ,जो आर्थिक रूप से वर्गों का विभाजन किया गया था वह आज एक सामाजिक बुराई बनी हुई है। है इसका एक हल हो सकता है कि जाति शब्द को छोड़ कर भारतीय नागरिकों को शिक्षित किया जाये और जागृत किया जाये या फिर भारत के नागरिकों को आर्थिक रूप से मजबूत होने के तरीके बतायें जायें। ऐसा होगा तो भारत में जातिवाद जैसी महामारी का विनाश हो सकता है।


2. नशा भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ी चुनौती :-


वैसे नशे की बात करें तो नशे कई किस्म के होते हैं ज्यादा बोलनी का नशा, ज्यादा खाने का नशा किसी को निचा दिखाने का नशा, जुआ खेलने का नशा। पर आज आज जो भारतीय युवा में ही नहीं बल्कि आज सभी वर्ग में शराब,स्मैक, चरस गांजा जैसे पनप रहे हैं वह भारत के लिए बहुत बड़ी समस्या और एक सामाजिक बुराई बानी हुई है। 

मदिरापान का नशा तो आजकल आम सा हो गया है। दुःख के समय शराब पी लो क्योकि दुःख है, सुख के वक्त मदिरा पी लो क्योकि आज ख़ुशी थी इस लिए पी ली। पर जब ये शराब एक भयंकर रूप धारण के लेता या दानव रूप धारण कर लेता है तो परिवार और पुरे समाज के लिए दानव बन जाता है। शराब का सेवन आज आम सा हो गया है। जब इसके इलावा चरस और, स्मैक और अन्य छोटे नशे करने वालों की संख्या दिन वदीन बढ़ती जा रही है। 

जब आज के युवाओं के पास पैसे की कमी होती है तो फिर छोटे नशे की और अग्रसर होता है। भारत ने नशे ने इतने पैर पसार रखे हैं कि आज का ुये हो नहीं सभी वर्ग इसकी चपेट में हैं जो आज समाजिक बुराई ही नहीं बलिक भारत के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।


कैसे काबू पाया जा सकता है भारत में नशे पर :- 

भारत में नशे के खात्में के लिए कई सेमिनार लगाए जाते हैं दूसरी तरफ नशे के ठेकेदार नशे का उत्पादन ज्यादा से ज्यादा कर रहे हैं ऐसे में नशे पर काबू कैसे पाया जाये। इसका एक ही हल है कि भारत के युवा को ही नहीं सभी वर्ग विशेष को नशे के कुप्रभावों से जानूं करवाया जाये। दूसरी तरफ अगर कोई नशा करता है तो उसके नशा करने वाले कारणों का पता लगाकर उसे व्यस्त रखने के प्रयास किये जाएँ। इसा सरकार ही नहीं एक परिवार भी कर सकता है। नशा एक आदमी तभी छोड़ सकता है जब उसे लगे की नशा परिवार के लिए, नशा देश के लिए और पुरे समाज के लिए खतरा है।


3. भारत में बाल श्रम एक कुरीति और बुराई :-

बाल वह होता है जो छोटा होता है अर्थात जिसे अपने भविष्य का कोई भी पता नहीं होता है। और वलयकाल में ही अर्थात बचपन से ही उसे आर्थिक रूप से मजबूत करने की कोशिश की जाती है और पैसे कमाने के लिए अग्रसर किया जाता है तो उसे बाल मजदूरी कहा जाता है। और आप सोच सकते है कि गर एक बच्ची या बच्चे को छोटी उम्र में पढ़ाई करवाने या शिक्षित करने की वजाये मजदूरी करने के लिए मजबूर किया जाये तो वह जब एक नागरिक बनेगा तो वह शारीरिक रूप से, शिक्षा के क्षेत्र में और समाजिक रूप से कितना पिछड़ जायेगा तो इसे समाजिक बुराई नहीं कहा जाये तो और क्या कहा जा सकता है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है भारत सरकार ने इससे निपटने के लिए कई कानून बनाये है पर इसका असर बहुत ही कम देखने को मिलता है।


बाल मजदूरी के कारण :- भारत में बाल मजदूरी के कारण सीधे तौर से आर्थिक रूप से पिछड़ापन और बढ़ती हुई आबादी और नागरिकों का अशिक्षित होना हो सकता है।


बाल मजदूरी को कम करने के उपाए :- 

जब आर्थिक रूप से कोई पिछड़ जाता है और गरीबी किसी को सताने लगती है तो तो पेट भरने के लिए हर परिवार कोई न कोई दाव पेंच लगाता है पर बाल मजदूरी तभी कम हो सकती है अगर परिवार के सदस्य हौसला करें और अपने बच्चे को इतना शिक्षित करें की वह कमाई के उचित ढंग देख सके। जब एक बच्चा बालिग हो जाता तो उसके बाद वह आर्थिक पक्ष की और मजबूत हो जायेगा। मजदूरी करना कोई गतल बात नहीं है पर इसके लिए उचित समय का इंतजार करें हो सकता है इससे कोई बाल एक उच्च अधिकारी बन जाये।



4. अनपढ़ता या असाक्षरता :- 

साक्षर व्यक्ति ही एक समाज का विकास और देश का विकास कर सकता है। अगर किसी भी देश का नागरिक सकसर है तो वह देश के सामने या समाज के सामने जो भी चुनौतियां या समस्याएं हैं उनका हल वह आसानी से कर सकता है। भारत के राष्ट्रीय साक्षरता सर्वे के अनुसार भारत की कुल साक्षरता डॉ लगभग 77 प्रतिशत है और अगर उज्बेकिस्तान की साक्षरता दर पहले नंबर पर है और 99. 99 है। भारत के पहले 10 साक्षर देशो में भी नाम नहीं आता है। इसलिए भारत के समक्ष ये भी एक भी एक सामाजिक बुराई या चुनौती के साथ सामने है। 


जहां भारत ने शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने के लिए कई कानून बनाये हैं वहीँ कुछ राज्यों में आज भी शिक्षा का स्तर बहुत दयनीय है। लड़कियों को शिक्षा ग्रहण नहीं करवाई जाति है और उन्हें दूसरे घर का गहना माना जाता है। अनपढ़ता भारत के लिए एक अभिशाप की तरह है। कोई भी अनपढ़ व्यक्ति अपने या देह के भविष्य का सही फैसला नहीं ले सकता है।


असाक्षरता के कारण :- भारत में असाक्षरता के कारण और कोई नहीं स्वय परिवार होते हैं। जब भी किसी के साथ शिक्षा उच्च शिक्षण की बात की जाती है तो परिवार के सदस्यों द्वारा ये कहा जाता है कि पढ़ लिख कर बेरोजगार ही रहेगा। ये ही कारण है कि भारत में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। दूसरा कारण ये भी हो सकता है कि भारत सरकार ने जो भी नियम बनाये हैं उनका सही तरीके से पालन नहीं किया जाता है।

क्या हो सकते हैं उपाए :- भारत में शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने का हल ये हो सकता है कि बच्चे के माता -पिता या अभिवावकों के बीच सही वार्तालाप हो सके या पजीर उनमे सही उन्हें शिक्षा के मूल्यों से वकीप करवाया जाये। दूसरा शिक्षा के लिए भारत में बने कानूनों का सही तरिके से पालन किया जाये। भारत के सभी वर्ग को शिक्षा जरुरी विषय के रूप में समझाया जाये।


5. घरेलू हिंसा:-

घरेलु हिंसा भारत का ही ही नहीं पुरे विश्व का विषय है। हमेशा घर में छोटी सी बात को लेकर बड़ी बात हो जाती है पर या छोटी सी हिंसा बड़ा रूप धारण कर लेता है और परिवार विखर जाते हैं जिससे समय के साथ पैसों की भी बर्वादी होती है। भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा अत्यधिक प्रचलित है; लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, तीन विवाहित किशोरियों में से एक ने अपने पति से शारीरिक हिंसा का अनुभव किया है। 15-49 आयु वर्ग की 83,000 से अधिक महिलाओं के सर्वेक्षण से पता चला है कि 34% ने शारीरिक हिंसा का सामना किया था - जिसमें थप्पड़ मारने, मुक्का मारने और हाथ घुमाने से लेकर जलने, गला घोंटने या हथियारों से हमले जैसे गंभीर हमले शामिल थे। इसके अलावा, लगभग 15% ने भावनात्मक और 9% यौन हिंसा का अनुभव किया है। 


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का कहना है कि 2012 में देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की कुल 244,270 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि 2011 में 228,650 की तुलना में 6.4% की वृद्धि हुई थी। आज ये मामले और भी पढ़ते जा रहे हैं।

क्या है घरेलू हिंसा का हल :- घरेलू हिंसा वह समाजिक बुराई है जो एक घर में छोटी सी बात को लेकर बड़ी समस्या का बनना है। ये आज भारत में एक समाजिक बुराई बन चुकी है। घरेलू हिंसा को रोकने के लिए हालाँकि सरकार ने भी कानून बनाये हैं पर इसका हल ये ही कि एक दूसरे की समस्या को नजदीकी से समझा जाये और छोटी सी बात को लेकर घर में क्लेश न पैदा किया जाये। जो भी अगर घरेलू हिंसा करता है उसे अपने समाज में बैठ कर सुलझाया जाये।


7. भारत में कन्या भ्रूण हत्या एक गंभीर सामाजिक बुराई :-

भारत में आज भी खोख में ही नवजात शिशु की हत्या क्र दी जाति है जब किसी को इस बात का एहसास होता है कि वे एक लड़की है। नवजात कन्या की जानबूझ कर हत्या करने को कन्या भ्रूण हत्या कहा जाता है। हमारे समाज की पितृसत्तात्मक प्रकृति ने इस बुराई को सदियों से जारी रखा है। इंडिया टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान राज्य में हर दिन कन्या भ्रूण हत्या या कन्या भ्रूण हत्या के लगभग 2500 मामले होते हैं। 

यह महिलाओं के रहने के लिए एक भयावह स्थिति है, घूंघट अभी भी वहां महिलाओं के लिए एक परंपरा है और महिलाओं को कब्रों में दफनाया जाता है। दाइयों का कहना है कि लड़कियों को बेरहमी से प्रताड़ित किया जा रहा है. इस जघन्य अपराध में डॉक्टर भी शामिल हैं। कन्या भ्रूण हत्या भारत में एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है।

कन्या भ्रूण के कारण :- सही बात कही जाये तो कन्या भ्रूण हत्या के पीछे ये कारण हैं कि लोग ये सोचते हैं कि लड़का होने से हमारा कुल या वंश चलता रहेगा। दूसरा कारन ये भी हो सकता है कि हे कोई ये ही सोचता है कि बीटा या लड़का होने से वह उनका बुढ़ापे का सहारा बनेगा जबकि ये सब गलत है जहां आजकल लड़कियां अपने माँ बाप का शर बने हुए हैं वहीँ लड़के अपने बुजुर्गों को प्रताड़ित ही क्र रहे हैं।

क्या हैं कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के उपाए :- कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए परिवार के सभी सदस्यों का जागरूक होना बहुत जरुरी है। लड़का और लड़कियों को एक समान समझा जाये और उन्हें समान अवसर दिया जाये। दूसरा जो भी डॉक्टर इस समाजिक बुराई के साथ जुड़े हुए हैं वे इस जघन्य अपराध में शामिल न होकर सभी लोगों को सही सलाह दे।


8. भारत में दहेज प्रथा एक गंभीर सामाजिक बुराई :-

हम सभी जानते हैं जब भी लड़की की शादी पर कोई धन राशि या कोई कीमती वस्तु देता है या लड़को द्वारा मांग की जाती है तो उसे दहेज प्रथा कहते हैं। भारत में ये बहुत बड़ी बुराई बन के निकली है। हालाँकि राजा राम मोहन राय जैसे महान विचारकों ने इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रयास किये हैं पर फिर भी इसका प्रचलन जारी है। आये दिनों दहेज प्रथा संबधी कोई न कोई घटना सामने आती है। कहीं ख़ुशी से दहेज दिया जाता है और कहीं इसकी मांग की जाती है पर यह गरीब आदमी के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप बन चूका है। 

समाज की सबसे गहरी जड़ वाली बुराई लड़कियों की हत्या उनके परिवारों द्वारा दूल्हे के परिवार को दहेज नहीं देने के कारण की जाती है। दहेज की मांग और स्वीकृति जैसी कुरीतियां पुरे भारत में व्यापक रूप से फैली हुई हैं। दहेज के भुगतान की प्रथा मध्यवर्गीय समाज में अधिक प्रचलित है। यहां तक ​​कि प्रतिष्ठित संस्थानों की उच्च शिक्षित महिलाओं की भी उनकी मर्जी के खिलाफ अजनबियों से शादी कर दी जाती है। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के साथ, ओडिशा दहेज से होने वाली मौतों में चार्ट में सबसे ऊपर है, जिसमें दिखाया गया है कि ओडिशा ने दहेज रोकथाम अधिनियम के तहत 1,487 मामले दर्ज किए हैं, जो 2012 के दौरान देश में दर्ज किए गए कुल मामलों का 16.5 प्रतिशत है। भारत में दहेज प्रथा के कुल मांमले एनसीआरबी से प्राप्त जानकारी के अनुसार, दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत 2018, 2019 और 2020 के दौरान दर्ज मामलों की संख्या क्रमशः 12826, 13307 और 10366 है।

दहेज प्रथा रोकने के उपाय :- लड़कियों की शिक्षा में विस्तार किया जाए ताकि वे आत्म निर्भर हो सके और आर्थिक रूप से मजबूत हो सके जिससे दहेज की मांग में कमी हो सकती है। दूसरा अगर प्रेम विवाह जो है तो गलत पर अगर स्वीकृति दी जाए तो भी दहेज प्रथा समाप्त हो सकती है। लड़कों को भी आत्म निर्भर किया जाये ताकि वे धन अर्जित करे वे दूसरों की तरफ न देखे और दहेज की मांग में कमी आयेगी। दहेज़ मांगने वालों को हो नहीं दहेज प्रथा को प्रोत्साहन देने वालों को भी कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए।


9. इंटरनेट का अनावश्यक प्रयोग भी ले रहा है सामाजिक बुराई का रूप :- 

पिछले दो दशकों से भारत में मोबाइल और इंटरनेट का प्रयोग बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है। मोबाइल एक ऐसी डिवाइस है जिसका प्रयोग पहले सदेश भेजने और प्राप्त करने के लिए किया जाता था। समय के साथ इंटरनेट की दुनिया ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। और अज्ज देकः जाये तो हर वक्त हर कोई बच्चे से लेकर बूढ़े तक मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में व्यस्त है यह एक नशे की तरह फैला हुआ है। हाँ इंटरनेट की दुनिया ने दुनिया को एक कर दिया है पर इसका ज्यादा प्रयोग आज भारत के लिए समस्या बनी हुई है। 

अब आप सोचते होंगे इंटरनेट का प्रयोग समाजिक बुराई कैसे है तो आज इंटरनेट की दुनिया में इतनी वेबसाइट हैं कि बच्चे को इस बात का पता नहीं होता है कि किस वेबसाइट का प्रयोग सही है और किसका गलत है एक डिजिट चेंज करने से गलत वेबसाइट खुल जाती है जिससे बच्चे उसी वेबसाइट को फॉलो करते हैं। और इसका परिणाम यह निकलता है कि समाज में कुरीति फैलती है। समाज में चोरी के, नशे या किसी को ब्लैकमेल करने के तरीके सीख लिए जाते हैं परिणाम स्वरूप समाज कोई इसका सामना करना पड़ता है।




क्या है सामाजिक बुराई का हल :- अगर युवा पीढ़ी के लिए Special Counseling करके इस बात को उनके ध्यान में लाया जाये कि इंटरनेट के लाभ और हनिया क्या है तो कुछ control हो सकता है। या फिर इंटरनेट का पैकेज ही इतना महंगा हो जाये कि इसकी उपयोग केवल अच्छी और उपयोगी काम के लिए किया जाये।


11. भारत में बढ़ता भ्र्ष्टाचार भी एक गंभीर सामाजिक बुराई :- 

भारत में बढ़ता हुआ भ्र्ष्टाचार भी एक भारत में बहुत बड़ी बुराई के रूप में सामने बनकर आई है। जिसे देखो , जिस भी विभाग में देखो हेरा फेरी चली हुई है। आज भारत को भर्ष्टाचार ने इतना ज्यादा घेर लिया एक कि इससे मुक्ति पाना मुश्किल सा प्रतीत होता है। जो भी है अपना घर भरने में लगा हुआ है। बड़ी कुर्सी बड़ा भ्र्ष्टाचार ये भारत में एक रिवाज सा बना हुआ है क्या आप जानते हैं भारत में 2022 तक भ्र्ष्टाचार के कितने मामले हैं। 

तो आज तक भारत में 180 से अधिक मामले, जो भ्र्ष्टाचार के बड़े मामले हैं वे उनकी सुनवाई भारत की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में की गई है। इसको छोड़ आप इस बात का अंदाजा लगा सकते है भारत में छोटी अदालतों में कितने मामले होंगे।


क्या है इस सामाजिक बुराई का :- भारत में ईमानदारी से काम करने वालों को बढ़ावा देने वालों को प्रोत्साहित करके ही इस सामाजिक बारे पर काबू पाया जा सकता है। या फिर भ्र्ष्टाचारी को कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए।



11. बढ़ता हुआ फेशन भी भारत में सामाजिक बुराई के रूप में :- इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि फेसन करना किसी भी व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत आजादी है। पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि बढ़ते हुए फेसन ने अपने पैर इस कदर पसार लिए हैं कि अब ये भारत में अन्य समाजिक बुराइयों को प्रोत्साहन दे रहा है। 

एक विद्यार्थी से लेकर शिक्षार्थी तक सभी समाज में जीने के मूल्यों को भूल चुके जिससे समाज द्वारा निर्मित मूल्यों का हनन हो रहा है। हाँ जहाँ फेसन की जरूरत है वहां करें पर किसी भी चीज में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी समाज के लिए खतरा साबित हो सकता है।


क्या है हल :- बढ़ते हुए फेसन को बिलकुल नहीं रोका जा सकता है पर हाँ ऐसा हो सकता है कि कब कैसे समय के साथ फेसन की दुनिया में जाना है इस बात को अपना कर फेसन को एक बुराई के रूप में उभरने से रोका जा सकता है।

निष्कर्ष :- भारत में और भी कई सामाजिक बुराइयां है जैसे क्षेत्रवाद, झूठ बोलना बड़ों का आदर नहीं करना छोटों से प्यार नहीं करना आदि। बड़ी बात ये है अगर हम ऊपर लिखी हुई सामाजिक बुअराइयों को रोकने का प्रयास करेंगे तो अन्य बुराइयां समाज के साथ खत्म हो जाएगी। प्रयास सभी का होना चाहिए। धन्यवाद ,

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

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