सर्वपल्ली राधाकृष्णन के 10 दार्शनिक विचार | Philosophical thoughts of Sarvepalli Radhakrishnan in Hindi

राधा कृष्णन के दार्शनिक विचारों पर एक नजर | A view at the Philosophical Thoughts of Radha Krishnan

भारत के पूर्व राष्ट्रपति देश के प्रसिद्ध राजनेता एक अध्यापक और विचारों के धनी थे। उन्होंने अपनी शिक्षा से देश को आजादी के बाद जागृत और उत्साहित किया। ये ही नहीं उसके बाद सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक स्वच्छ राजनीति का चित्रण भारत के राजनीतिज्ञों के सामने लाया। एक अध्यापक, एक राजनेता होने के साथ -साथ वे एक प्रसिद्ध दार्शनिक भी थे जिन्होंने ने अपने दर्शन शास्त्र से दर्शन शास्त्र के लिए आजादी के बाद एक नई नीवं रखी। आईये नजर डालते हैं राधा कृष्णन दार्शनिक विचार (Radha Krishnan Philosophical Thoughts) के क्या थे ?



सर्वपल्ली राधाकृष्णन के दार्शनिक विचार :- 


1. राधाकृष्णन एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने ने पूर्वी और पश्चिमी विचारों को एक साथ लाने का प्रयास किया, पश्चिमी दार्शनिक और धार्मिक विचारों को एकीकृत करते हुए, बेहिचक पश्चिमी आलोचना के खिलाफ हिंदू धर्म का बचाव किया।


2. डॉक्टर राधाकृष्णन जी ने दूसरे धर्मों की आलोचना किये बिना नव-हिंदूवाद, हिंदू सार्वभौमिकता जैसे शब्दों से भारत में हिंदू आधुनिकतावाद का प्रारंभ जिसे हिन्दू आधुनिकतावाद के नाम से जाना जाता है। शब्द "नियो-वेदांत" जर्मन इंडोलॉजिस्ट पॉल हैकर द्वारा "पारंपरिक" अद्वैत वेदांत से आधुनिक विकास को अलग करने के लिए एक अपमानजनक तरीके से गढ़ा गया था।


3. राधाकृष्णन के लिए धर्मशास्त्र और पंथ बौद्धिक सूत्रीकरण के साथ-साथ धार्मिक अनुभव या धार्मिक अंतर्ज्ञान के प्रतीक हैं। राधाकृष्णन ने विभिन्न धर्मों को धार्मिक अनुभव की उनकी व्याख्या के अनुसार वर्गीकृत किया, जिसमें अद्वैत वेदांत सर्वोच्च स्थान पर था।


4. डॉक्टर राधाकृष्णन अद्वैत वेदांत को सर्वोपरि मानते थे वे गुरु शंकराचार्य के इस वेदांत के अनुसार ये मानते थे कि संसार में ब्रह्म ही सत्य है, जगत् मिथ्या है, जीव और ब्रह्म अलग नही हैं। जीव केवल अज्ञान के कारण ही ब्रह्म को नहीं जान पाता जबकि ब्रह्म तो उसके ही अंदर विराजमान है। उनके अनुसार अद्वैत सिद्धांत चराचर सृष्टि में भी व्याप्त है। जब पैर में काँटा चुभता है तब आखों से पानी आता है और हाथ काँटा निकालने के लिए जाता है ये अद्वैत का एक उत्तम उदाहरण है।

5.उन्होंने जो किताबें लिखी थी उसके बाद उन्हने वेदांत का जहां अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि वेदांत, उच्चतम प्रकार का धर्म है क्योंकि यह सबसे प्रत्यक्ष सहज अनुभव और आंतरिक अनुभूति प्रदान करता है। उन्होंने द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, केवलाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि सभी विचारधाराओं का अध्ययन किया उसके बाद वेदांत ही उच्चतम धर्म है।


6. उनके दार्शनिक विचारों से ये पता चलता था कि वे किसी धर्म के विरुद्ध नहीं थे। पश्चिमी संस्कृति और दर्शन से परिचित होने के बावजूद, राधाकृष्णन इसके आलोचक थे। उन्होंने कहा कि, निष्पक्षता के अपने दावों के बावजूद, पश्चिमी दार्शनिक अपने ही समाज के धार्मिक प्रभावों से प्रभावित थे। हर धर्म अपने विचारों से प्रभावित होता है ऐसी उनकी सोच थी।


7. वे मानते थे कोई भी आजादी तब तक परिपूर्ण नहीं होती है जब तक इंसानों को विचार प्रकट करने की आजादी प्राप्त न हो। विचारों की अभिवक्ति ही पूर्ण आजादी का दूसरा रूप है। विचार प्रकट करके ही इंसान एक सच्चे दर्शन शास्त्र की और जा सकता है।


8. हिन्दू धर्म के बारे में वे सोचते थे हिंदू धर्म सिर्फ एक आस्था नहीं है। यह अंतर्ज्ञान का मिलन है जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता है लेकिन केवल अनुभव किया जा सकता है। बुराई और त्रुटि अंतिम नहीं हैं अर्थात बुराई और त्रुटि के बाद भी इंसान धर्म की और अग्रसर हो सकता है। ऐसा कोई स्थान है जहां भगवान नहीं है।


9. यह भगवान नहीं है जिसकी पूजा की जाती है बल्कि वह समूह या अधिकार है जो उसके नाम पर बोलने का दावा करता है। पाप सत्यनिष्ठा का उल्लंघन नहीं अधिकार की अवज्ञा बन जाता है।


Rakesh Kumar

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