सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन का राजनीतिक करियर | Political Career of Sarvepalli Doctor Radhakrishnan in Hindi

सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन एक नेता थे अध्यापक थे और इन सभी के साथ एक अच्छे राजनीतिज्ञ भी थे जिन्होंने अपने अध्यापन के कार्य में महारत हासिल करने के बाद भारत के लिए एक निष्पक्ष और ईमानदार नेता के रूप में कार्य किया। भारत में दो बार उप-राष्ट्रपति पद के लिए और एक बार राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित होने के बाद उन्होंने एक अच्छे राजनीतिज्ञ का परिचय भारत को दिया था। आइये जानते हैं सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन के राजनीतिक सफर के बारे में, उन्होंने कहां से राजनीति शुरू की थी और कहां तक उनका राजनीतिक जीवन रहा था।





सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन का राजनीतिक करियर | Political Career of Sarvepalli Doctor Radhakrishnan


वैसे तो सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन राजनीति की नजरों में एक अच्छे राजनीतिज्ञ के रूप में अपने शिक्षण के करियर में आ गए थे जब उन्होंने 1928 में दक्षिण भारत में आंध्र महासभा में भाग लिया था। यहां पर इस महासभा में रहते हुए उन्होंने बड़े बड़े राजनीतिक दिगज्जों के सामने मद्रास प्रेसीडेंसी रायलसीमा के सीडेड डिस्ट्रिक्ट्स डिवीजन का नाम बदलने के विचार की वकालत की थी और पहली बार एक राजनीतिज्ञ होने का परिचय दिया था।


इसके बाद उन्हें 1931 मेंभारत में बौद्धिक सहयोग के लिए लीग ऑफ नेशंस कमेटी में नियुक्त किया गया, जहां उन्हें भारतीय विचारों पर एक हिंदू विशेषज्ञऔर पश्चिमी दृष्टि में समकालीन समाज में पूर्वी संस्थानों की भूमिका के एक विश्वसनीय अनुवादक के रूप में जाना जाने लगा।


आजादी के बाद सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन ने एक अच्छे राजनीतज्ञ के रूप में भूमिका निभाई जब उन्हें 1946 से लेकर 1951 तक नवगठित यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) के सदस्य के रूप में काम करने का मौका मिला और इस संगठन में रहते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन में भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र के लिए कर्म निष्ठां से अपना दायित्व निभाया।


भारत में आजादी के बाद सविंधानिक सभा का निर्माण किया गया था जिसमें उन्हें दो साल के लिए भारतीय संविधान सभा के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया। इस सदयस्ता में भारत के सविंधान निर्माण के लिए उन्होंने देश के लिए काम किया। विश्वविद्यालय आयोग की मांगों और ऑक्सफोर्ड में स्पैल्डिंग प्रोफेसर के रूप में उनकी निरंतर जिम्मेदारियों को राधाकृष्णन की यूनेस्को और संविधान सभा के प्रति प्रतिबद्धताओं के खिलाफ संतुलित करना था। 


जब 1949 में विश्वविद्यालय आयोग की रिपोर्ट पूरी हुई उसके बाद राधाकृष्णन को तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा मास्को में भारतीय राजदूत नियुक्त किया गया और वे अपने राजनैतिक सफर में एक स्वच्छ राजदूत भी रहे। जब भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद बने तब उन्हें भारत का पहला उप - राष्ट्रपति नियुक्त किया गया। पांच के लिए 13 मई 1952 से लेकर 12 मई 1957 उपराष्ट्रपति पद पर रहने के बाद उन्हें फिर दूसरी बार 13 मई 1957 से लेकर 12 मई 1962 तक दूसरी बार भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में अपनी सेवा निभाने का मौका मिला। 


एक स्वच्छ के रूप में डॉक्टर ने उप - राष्ट्रपति पद पर रहते हुए 9 साल और 364 दिन के लिए काम किया। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद वे पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री कार्यकाल में भारत के राष्ट्रपति 1962 में चुने गए और भारत के राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने 13 1962 से लेकर 13 मई 1967 तक पुरे पांच साल के लिए पद भार संभाला। इस राजनीतिक सफर के बाद उन्होंने 1967 में राजनीति को अलविदा कह दिया और 1967 से लेकर 17 अप्रैल 1975 तक उनकी मृत्यु तक शांतमई ढंग से जीवन व्यतीत किया।


कार्यालय में रहते हुए डॉक्टर राधाकृष्णन के सराहनीय कार्य :- 


कार्यालय में अपने समय के दौरान, राधाकृष्णन ने विश्व शांति और सार्वभौमिक फैलोशिप की बढ़ती आवश्यकता को देखा। इस आवश्यकता के महत्व को राधाकृष्णन ने वैश्विक संकट के रूप में सामने आने के रूप में देखा था। कोरियाई युद्ध पहले से ही पूरे जोरों पर था जब उन्होंने उपराष्ट्रपति की भूमिका ग्रहण की इसलिए इस पद पर रहते हुए उन्होंने विश्व शांति का प्रयास किया। 


राधाकृष्णन के राष्ट्रपति पद पर 1960 के दशक की शुरुआत में चीन के साथ राजनीतिक संघर्षों का बोलबाला था, इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुताएं थीं भारत के इन पड़ोसी देशों के साथ उन्होंने मित्रता पूर्ण सबंध स्थापित करने की कोशिश की। इसके अलावा, शीत युद्ध ने पूर्व और पश्चिम को विभाजित कर दिया था जिससे प्रत्येक रक्षात्मक और एक दूसरे से सावधान हो गया। 


राधाकृष्णन ने सवाल किया कि लीग ऑफ नेशंस की विभाजनकारी क्षमता और प्रमुख चरित्र जैसे स्व-घोषित अंतरराष्ट्रीय संगठनों के रूप में उन्होंने क्या देखा। इसके बजाय, उन्होंने अभिन्न अनुभव की आध्यात्मिक नींव पर केंद्रित एक अभिनव अंतर्राष्ट्रीयवाद को बढ़ावा देने की वकालत की जिससे संस्कृतियों और राष्ट्रों के बीच आपसी समझ और सहिष्णुता को बढ़ावा मिला।


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Rakesh Kumar

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