भारतीय राष्ट्रपति की शक्तियां | Powers of President of India in Hindi

Indian President Powers in Hindi :- 

आजादी से आज तक भारत में 15 चुनाव हो चुके हैं। 14 वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल जुलाई 2026 में पूरा होगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत एक प्रजातंत्रीय देश है जहां सभी शक्तियां चुने हुए प्रतिनिधि के पास होती हैं पर इसके साथ भारत एक गणतंत्रीय देश है जिसमें एक मुखिया चुना जाता है और ये मुखिया भारत का राष्ट्रपति होता है। 

भारत का राष्ट्रपति एक नाममात्र मुखिया होने के बावजूद भारत के राष्ट्रपति के पास कुछ शक्तियां होती हैं जो किसी आम नागरिक के पास नहीं होती हैं।आइये भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों में जानते है भारत के राष्ट्रपति की वैधानिक, कार्यकारी, वित्तीय, न्यायक, क्षमा और डिप्लोमैटिक और न्यायिक शक्तियों के बारे में और इन शक्तियों का भारतीय सविंधान में क्या प्रावधान है। 



भारत के राष्ट्रपति की शक्तियां :-

भारत के राष्ट्रपति की कार्यपालिका, विधायी, न्यायिक, सैन्य, वित्तीय, वीटो और आपातकालीन शक्तियां | Executive, Legislative, Judicial, Military, Financial, Veto and Emergency Powers of the President of India


1. राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां | Legislative Powers of the President of India in Hindi

भारत की संसद का मुख्य कार्य या फिर मुलभुत काम देश के लिए किसी विधि या कानून का निर्माण करना होता है। निर्माण भारत के दोनों सदनों द्वारा किया जाता है। कानून या फिर विधि निर्माण के लिए प्र्ताव सबसे पहले देश के निम्न सदन लोकसभा में पेश किया जाता है। 

लोकसभा में पेश होने के बाद ये प्रस्ताव राज्य सभा में पेश किया जाता है अगर राज्य सभा से पास कर देता है तो बिल देश के मुखिया अर्थात राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है और राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद ये बिल एक कानून का रूप धारण करता है इसे राष्ट्रपति की विधायी शक्ति कहते हैं। जानते हैं डिटेल से।

1. भारत की विधायी शक्ति संवैधानिक रूप से भारत की संसद में निहित है। भारत के सविंधान के अनुच्छेद 78 और 86 में भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों का प्रावधान दिया गया है इन अनुच्छेदों के अनुसार भारत के राष्ट्रपति के पास ये विधायी शक्ति होती है कि वह संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्य सभा का सत्र बुला सकता है और लोक सभा को भंग करने का अधिकार भी राष्ट्रपति के पास होता है अगर उसे लगे तो।

2. भारत के सविंधान के अनुच्छेद 87(1) के अनुसार भारत के राष्ट्रपति के पास ये विधायी शक्ति होती है कि वह हर वर्ष संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्य सभा का सत्र शुरू होने से पहले दोनों सदनों का सत्र बुला सकता है और इसमें भारत का राष्ट्रपति का उदेश्य भारत के लिए कानून की रूपरेखा तैयार करना होता है।


3. जब एक आम बिल लोकसभा में पास होने और अप्पर सदन राज्य सभा में पास हो जाता है तो सूए भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो भारत के सविंधान के अनुच्छेद 111 में भारतीय राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद एक आम बिल कानून का रूप धारण करता है। 

भारत के सविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार भारत के राष्ट्रपति के पास ये विधायी शक्ति होती है कि वह राष्ट्रपति अंतिम निंर्णय लेता है कि ये आम बिल पास करने योग्य है या नहीं अगर आम बिल लोक हित में नहीं हो तो राष्ट्रपति इस बिल के अनुमोदन के लिए इंकार भी कर सकता है और ये बिल फिर से लोकसभा में अनुमोदन के लिए भेजा जाता है। पर जब दोनों सदनों में जब इस बिल में संसोधन किया जाता है उसके बाद राष्ट्रपति इस बिल को रोक नहीं सकते हैं।

4. भारत के राष्ट्रपति को ऐसा लगे की उसने जो बिल दुबारा अनुमोदन के लिए भेजा था और वह बिल बिना अनुमोदन के फिर से पेश किया गया है तो वह भारत के सविंधान धारा 74 के तहत इस बिल पर अपनी विधायी शक्ति का प्रयोग करते हुए तब तक रोक लगा सकता है जब तक वह दोनों सदनों में फिर से अनुमोदन के लिए पेश नहीं किया जाता है।


5. इसके इलावा भारतीय सविंधान के अनुच्छेद 368 धारा 2 के तहत राष्ट्रपति के पास ये शक्ति होती है कि अगर उसे लगे संसद द्वारा पेश किया गया बिल सविंधान के अनुसार वैध नहीं है तो उसके पास ये अधिकार होता है कि मामले की संवैधानिक वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श कर सकता है।

6. कभी - कभी ऐसा भी होता है कि संसद के दोनों सदनों में कोई भी लोकसभा और राज्य सभा सत्र में नहीं है या सत्र नहीं बुला सकते हैं और सरकार को तत्कालीन कार्यवाही महसूस करती है तो सविंधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार के अनुसार ये शक्ति होती है कि विधायी शक्तियों के तहत जरूरत मंद अध्यादेशों को अधिनियमित कर सकते हैं हाँ राष्ट्रपति द्वारा अधिनियमित किया गया बिल लगभग छह सप्ताह तक वैध माना जाता है। छह सप्ताह के बाद संसद अगर सत्र में आती है तो उसे जारी रखना संसद के अधीन होता है।

7. कुछ ऐसे भी अध्यादेश होते हैं जो भारतीय संसद दुआरा निर्धारित समय से पहले अनुमोदित नहीं किये जाते हैं और बिल सविंधान के नियमों पर खरे उतरते हैं तो राष्ट्रपति के पास ये शक्ति होती है एक उसे वह संसद को राष्ट्रपति इस बात का एहसास करवाए की ऐसा बिल पास करना संसद की एक नैतिक जिमेवारी थी। 

अध्यादेशों के रूप में कानून लाना सरकार और राष्ट्रपति के लिए बेशक एक मामला बन गया है, लेकिन धारा 123 के प्रावधानों का उद्देश्य उन असामान्य परिस्थितियों को कम करना है जहां कानून के मौजूदा प्रावधान अपर्याप्त होने पर तत्काल कार्रवाई अपरिहार्य है। संसद के दोनों सदनों द्वारा निर्धारित समय के भीतर अनुमोदन प्राप्त करने में विफल रहने के बाद एक अध्यादेश को फिर से लागू करना राष्ट्रपति का एक असंवैधानिक कार्य है।

2. भारत के राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियां | Executive Powers of the President of India

भारत के राष्टपति का पास वैधानिक शक्तियों के इलावा कुछ कार्यकारी शक्तियां भी होती हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में भारत का राष्ट्रपति एक नाममात्र का मुखिया होता है और वह भारत की संसद की सलाह के वगैर कोई भी काम नहीं कर सकता है। 

दूसरे शब्दों में कहें तो वह अपने फैसले के लिए अपने मंत्रियों की सलाह के लिए वाध्य होता है इसके विपरीत अमेरिका में राष्ट्रपति किसी भी सचिव को किसी भी समय हटा सकते हैं पर भारत में ऐसा करने का अधिकार भारत के राष्ट्रपति के पास बिलकुल नहीं है। फिर भी भारत के राष्ट्रपति के पास कुछ कार्यकारी शक्तियां हैं जो निम्नलिखित दी गई हैं। :-





1. भारत के सविंधान के अनुच्छेद 53 में भारत के राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियां निहित हैं। इस अनुच्छेद के अनुसार भारत का राष्ट्रपति लोकसभा के चुनाव के बाद भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए चुने गए प्रधनमंत्री की न्युक्ति करता है और उसे शपथ ग्रहण करवाता है इसके साथ प्रधान मंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति और शपथ ग्रहण भी राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियां में ही आता है। 

कार्यकारी शक्तियाँ का इस्तेमाल कर के भारत का राष्ट्रपति बड़े पदधिकारियों का भी चयन करता है जैसे भारत के महान्यायवादी, भारत के महानियंत्रक भारत के महालेखा परीक्षक, भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत वित्त आयोग के अध्यक्ष, भारत के राजयं के राज्यपाल, यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन के अध्यक्ष, अनुसूचित जाति के अध्यक्ष, अनुसूचित जनजाति के अध्यक्ष और अन्य पिछड़ा वर्ग के अध्यक्ष।

2. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह पर अन्य मंत्रियो की नियुक्ति करता है। राष्ट्रपति द्वारा देश के  बड़े पदाधिकारियों  नियुक्त किया जाता है इनमे शामिल हैं महान्यायवादी, महानियंत्रक, महालेखाकार, चुनाव आयुक्त,  फाइनेंस आयोग के अध्यक्ष भारत के सभी राज्यों कर यूटी के राजयपाल। इन सभी पदाधिकरियों के इलावा भारत का राष्ट्रपति SC,ST और अन्य जनजाति के लिए आयोग की नियुक्ति करता है।  


भारत के कार्यकारी शक्तियों में या कर्तव्य में भारत के सविंधान के अनुच्छेद 74 (2 ) में ये निहित है कि भारत का राष्ट्रपति वह भारत के राष्ट्रपति को सलाह या फिर परामर्श दी सकता है उस परामर्श को मानना या फिर न मानना उनके ऊपर depend करता है।


3. भारत के राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियां | Financial Powers of the President of India in Hindi



भारतीय संविधान का अनुच्छेद 110 धन विधेयक प्रदान करता है। मनी बिल वित्तीय मुद्दों जैसे कराधान, सरकारी खर्च आदि से निपटते हैं। U. P. S. C भारतीय राजनीति और शासन पाठ्यक्रम में धन विधेयक शामिल है। साधारण विधेयकों के विपरीत, धन विधेयक केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर लोकसभा में पेश किए जाते हैं, जो अनिवार्य है। धन विधेयक या फिर मनी बिल को राष्ट्रपति की सिफारिश से ही संसद में पेश किया जा सकता है। भारत के राष्ट्रपति के पास ये शक्ति होती है कि वह इस बिल का वार्षिक विवरण अपने पास रख सकता है। 

केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण की सिफारिश करने के लिए राष्ट्रपति हर पांच साल में एक वित्त आयोग का गठन करता है। हाल ही में 2017 में इस तरह का आयोग गठित किया गया था। अनुच्छेद 267 के अनुसार भरत के राष्ट्रपति के पास आकस्मिक निधि (Contingency fund) भारत के राष्ट्रपति के पास होती हैं।

4. भारत के राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियां या क्षमा शक्तियां | Judicial Powers or Pardoning Powers of the President of India in Hindi


भारत के राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियां विवरण भारत के सविंधान के अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति के पास ये न्यायिक शक्ति है कि वह केंद्रीय कानून के उल्लंघन, मार्शल कोर्ट की सजा, या मौत की सजा के लिए सजा के खिलाफ माफी देने का अधिकार रखता है। संविधान का अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को उन व्यक्तियों को क्षमा प्रदान करने का अधिकार देता है, जिन पर किसी अपराध का मुकदमा चलाया गया है और उन्हें दोषी ठहराया गया है। 

भारत में राष्ट्रपति की न्यायिक शक्ति किसी भी न्याय पालिका के कानून या फैसले से सवतंत्र होती है वह चाहे तो एक उस अपराधी को क्षमा कर सकते हैं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराया हो पर ऐसा कम ही होता है। भारत के राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियों को भारतीय सविंधान का अनुच्छेद 60 ऐसा करने से रोकता है जो राष्ट्रपति शपथ के समय

राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार किया जाता है इसमें ये अनुच्छेद कहता है कि "राष्ट्रपति को भारतीय संविधान और कानून की रक्षा, सुरक्षा और बचाव करना चाहिए।"

राष्ट्रपति की न्यायिक शक्ति में भारतीय न्यायाधीशों की नियुक्ति करना


मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। यूनियन ऑफ इंडिया बनाम ज्योति प्रकाश मित्तर के मामले में इसकी पुष्टि हुई थी। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 217(3) की व्याख्या करनी पड़ी, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की उम्र के बारे में किसी भी विवाद का निपटारा करेगा। 

क्योंकि संविधान उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वतंत्रता पर इतना अधिक मूल्य रखता है, इस प्रावधान की व्याख्या यह सुझाव देने के लिए की गई थी कि राष्ट्रपति को व्यक्तिगत रूप से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की उम्र के प्रश्न पर विचार करना चाहिए और निर्णय लेना चाहिए।


इसके बाद अनुच्छेद 217(3) के अनुसार भारत के उच्च न्यायालय के न्याय धीशों की आयु निर्धारित करने के लिए राष्ट्रपति के कार्य को इस मामले में न्यायिक माना गया था। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार: आम तौर पर, न्यायिक शक्ति का प्रयोग उस प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए जिसमें वह शक्ति निहित है। लेकिन अनुच्छेद 217(3) के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की आयु के प्रश्न पर निर्णय लेने की शक्ति का प्रयोग भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद किया जाना है।

5. भारतीय राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियां  | Military Powers of the President of India in Hindi





भारत का राष्ट्रपति भारतीय सशस्त्र सेना बलों का सर्वोच्च कमांडर होता है। अगर भारत के राष्ट्रपति को ऐसा लगे की भारत की भारत की अखंडता पर कोई आंच आ रही है तो वह प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर युद्ध की घोषणा कर सकता है या फिर युद्ध के समय शांति बहाल कर सकता है। भारत के पास ये सैन्य शक्ति होती है कि वह तीनो सेनाओं थल सेना, जल सेना और वायु सेना के प्रमुख कमांडरों की नियुक्ति कर सकता है। 

भारत का कोर्ट मार्शल एक एक ऐसी न्याय पालिका है जो भारत के अंदर सेना की तीनों शाखाओं के सैन्य क्रिमिनल के न्याय का फैसला करता है। अगर कोर्ट मार्शल का दोषी भारत के राष्ट्रपति के पास अपनी सजा के लिए क्षमा याचना का आवेदन करता है तो भारत का राष्ट्रपति उसे क्षमा दान कर सकता है। ऐसा क्षमा दान भारत का राष्ट्रपति भारत के सविंधान के अनुच्छेद 72 के अधीन करता है।

6. भारत के राष्ट्रपति की कुटनीतिक शक्तियां | Diplomatic powers of the President of India in Hindi

वैसे तो किसी भी देश की कुटनीतिक शक्तियां देश के विदेश मंत्री पर निर्भर करती हैं कि उसने दूसरे देशों के साथ कैसे कूटनीतिज्ञ संबंध बनाये हैं और भारत में भारत का विदेश मंत्री ही कुटनीतिक संबंधों को स्थापित करता है। कुटनीति में सभी अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों पर बातचीत और निष्कर्ष निकाला जाता है। 

 ऐसी सभी संधियां और समझौते संसदीय कार्यक्षेत्र के अधीन आते हैं पर राष्ट्रपति अंतरराष्ट्रीय मंचों और मामलों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं हालाँकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ये राष्ट्रपति की भूमिका भारत में नाममात्र होती है। भारतीय राजनायकों को और अधिकारीयों को भारत से बाहर जाने से पहले राष्ट्रपति की परमिशन की जरूरत होती है।

भारतीय राष्ट्रपति की वीटो शक्तियां | Veto Powers of Indian President in Hindi


भारतीय राष्ट्रपति के पास तीन प्रकार की वीटो शक्तियां होती है जिनमे पूर्ण वीटो शक्तियां सुस्पेंसिव वीटो और पॉकेट वीटो हैं। भारत में मंत्रिमंडल जो विधेयक पारित करता है उस पर भारत के राष्ट्रपति क्क जो फैसला होता है और उस फैसले से उस विधेयक को बंद क्र देता है या रोक देता है उसे राष्ट्रपति की वीटो पावर या वीटो शक्ति कहते हैं। ऐसा प्रावधान या शक्ति भारतीय राष्ट्रपति को भारतीय सविंधान के अनुच्छेद 111 द्वारा दी गई है।





A. भारतीय राष्ट्रपति की पूर्ण वीटो या एब्सोल्यूट वीटो :- 

जब भारत का राष्ट्रपति या अमरीका राष्ट्रपति अपने पूर्ण वीटो शक्ति का प्रयोग करता है, तो कोई विधेयक कभी भी पास नहीं हो सकता है। अगर विधेयक संसद के सदनों में पारित क्र भी दिया गया है तो वह राष्ट्रपति की इस शक्ति से औटोमैटिक खत्म हो जाता है ये शक्ति भारत की सभी शक्तिशाली शक्तियों में से एक है। 
भारत का राष्ट्रपति निम्नलिखित दो मामलों में अपने पूर्ण वीटो का उपयोग करता है पहला जब संसद ने जो विधेयक पारित किया हो और वह एक निजी सदस्य विधेयक हो जो किसी निजी स्वार्थ की पूर्ति करता हो। जब राष्ट्रपति से पहले कैबिनेट इस्तीफा दे देता है तो वह विधेयक को अपनी सहमति दे सकता है। 

भारत में पहले भी पूर्ण वीटो शक्ति का प्रयोग किया गया है इस वीटो पावर का इस्तेमाल भारत के पहले राष्ट्रपति ने पहली बार 1954 में किया था जब पंजाब में पेपसु भियोग संसद द्वारा पारित किया गया थाऔर दूसरी बार वीटो पौवर का इस्तेमाल भारत के दसवें राष्ट्रपति के आर के आर नारायणन ने 1091 में किया था जब भारत में संसद के सदस्यों के वेतन और पेंशन संसोधन संबंधी मामले सामने आये थे।

B. निरोधात्मक वीटो या  निलम्बित वीटो |  Suspension Veto


भारत का राष्ट्रपति सम्बंधित विधेयक को संसद में पुनर्विचार के लिए भेजता है जब वह ऐसा करता है तो उसे भारत के राष्ट्रपति की निलम्बित वीटो कहा जाता है। पर अगर भारत किआ संसद फिर से इस विधेयक को राष्ट्रपति के सामने पेश करती है चाहे उसमें बदलाव किया गया हो या नहीं तो राष्ट्रपति को यह बिल या विधेयक को मंजूरी देनी पड़ती है।



भारतीय संसद द्वारा विधेयक के नए अनुमोदन से उनके निलम्बित वीटो को ओवरराइड किया जा सकता है। अगर भारत में राज्य के विधेयकों की बात करें तो राज्य की विधायका के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है जिसके माधयम से वह राष्ट्रपति द्वारा निलंबित वीटो को खत्म कर सके ऐसा राज्य का राज्य पाल क्र सकता है जब वह राष्ट्रपति के सामने ये बिल पेश क्र सकता है।

जब संसद विधेयक को वापस राष्ट्रपति को भेजती है, तो उसे सदनों में केवल सामान्य बहुमत का प्रयोग किया जाता है न कि श्रेष्ठ बहुमत का। राष्ट्रपति धन विधेयक के संबंध में अपने निलम्बित वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है।



C. भारत के राष्ट्रपति की पॉकेट वीटो | Pocket Veto of the President of India



भारत में राष्ट्रपति की वीटो शक्ति या पावर एक ऐसी शक्ति है जब राष्ट्रपति राष्ट्रपति अपनी पॉकेट वीटो पावर का इस्तेमाल करके अनिशिश्चित काल के लिए लंबित कर सकता है। ऐसी शक्ति का प्रयोग करके राष्ट्रपति न तो सम्बंधित बिल को स्वीकार करता है न ही अस्वीकार करता है और न ही उसे पुनर्विचार विचार के लिए लौटाता है।

जब भारत का राष्ट्रपति पॉकेट वीटो का इस्तेमाल करता है तो उसे डिस्पोज करने या ख़तम करने का सविंधान में कोई प्रावधान नहीं है अर्थात किसी भी समय सीमा के लिए राष्ट्रपति इसे पॉकेट में रख सकता है। 

अमेरिका में भी इस तरह की पॉकेट वीटो का इस्तेमाल किया जाता है पर अमेरिका में राष्ट्रपति को 10 दिनों के अंदर बिल को फिर से संसद में भेजना पड़ता है इसके विपरीत भारत में पॉकेट वीटो इस्तेमाल की कोई समय सीमा नहीं है।

कब किया गया भारत में पॉकेट वीटो का इस्तेमाल :-


भारत के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह के समय पॉकेट वीटो का इस्तेमाल किया गया था और इसके पीछे कारण ये था कि उस समय भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक पास होना था और भारत में प्रेस की स्वतंत्रता थी जिसके तहत इस बिल को आलोचना का सामना करना पड़ रहा था इस लिए तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति ने पॉकेट वीटो का इस्तेमाल किया था और ये बिल आगे नहीं बढ़ा था और ख़त्म हो गया था।

भारत के राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां |  Emergency Powers of the President of India in Hindi

भारतीय संविधान के भाग XVIII (अनुच्छेद 352-360) में भारत के राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों (Emergency Powers of the President) का वर्णन किया गया है भारत में आपातकालीन प्रावधानों का लक्ष्य राज्य की संप्रभुता, एकता और अखंडता के साथ-साथ इसकी सुरक्षा को भी बनाये रखना है। भारत के राष्ट्रपति के पास तीन प्रकार की आपातकालीन शक्तियां होती हैं पहली राष्ट्रीय आपातकाल जो अनुच्छेद 352 के अंतर्गत है। दूसरी राष्ट्रपति शासन जो अनुच्छेद 356 में निहित है और तीसरी वित्तीय आपातकाल शक्ति जो भारत के सविंधान के अनुच्छेद 360 में निहित है।


A. भारत के राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां अनुच्छेद 352 के अंतर्गत

भारत में अनुच्छेद 352 के अनुसार आपातकालीन शक्तियां भारत का राष्ट्रपति उस समय करता है जब उसे लगे की युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए संविधान में 'आपातकालीन उद्घोषणा' शब्द का प्रयोग किया गया है। राष्ट्रपति के पास पूरे देश या किसी विशिष्ट क्षेत्र के लिए उद्घोषणा जारी करने का अधिकार है और ऐसा प्रावधान भारतीय सविधान में 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा सम्मिलित किया गया था। 

ऐसी उद्घोषणा संसद में पेश की जाती है। संसद में ये घोषणा कुल सदस्यता के बहुमत से और उस सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम 2/3 बहुमत से पास होनी चाहिए।


भारत में 352 के तहत कितनी बार आपातकाल लगा :- भारत में तीन बार ऐसी परिस्थिति पैदा हुई है जिसकी वजह से भारत के राष्ट्रपति को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी पहली बार 1962 में जब चीन ने भारत आक्रमण किया था उस समय भरत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे और भारत के राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन थे। 

दूसरी बार भी 352 के तहत भारत में आपातकाल की घोषणा की गई थी जब अप्रैल 1971 में भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था उस वक्त भारत के राष्ट्रपति वी. वी गिरी और भारत के प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी  थी। 

तीसरी बार भारत में 352 के तहत आपातकाल 1975 में लगा था जब देश में आंतरिक शांति का हवाला देते हुए इंदिरा गाँधी ने भारत में आपातकाल की घोषणा की थी और उस वक्त भारत के राष्ट्रपति वी. वी गिरी ही थे।



Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

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