सामाजिक परिवर्तन के प्रकार, तत्व और स्वरूप :-
किसी भी समाज का विकास अगर धीरे धीरे हुआ है तो ये एक सामाजिक परिवर्तन का विषय है। अर्थात समाज में समाजिक परिवतर्न आते रहते है और इन्ही सामाजिक परिवर्तनों की वजह से नए समाज का सृजन होता है। समाजिक परिवर्तन की अपनी नेचर है और इसका वर्गीकरण भी समय के साथ हुआ है।
पहले समाज में परिवर्तन की प्रवृति कुछ अलग थी अर्थात समाज कुछ अलग प्रकार का था। आज आधुनिक युग में सामाजिक परिवर्तन की नेचर वक्त के साथ बदल चुकी है। इस पोस्ट में हम सामाजिक परिवर्तन के कुछ तत्वों अर्थात प्रकारों की विवेचना करने की कोशिश करेंगे।
अगर सामाजिक परिवर्तन की बात करें तो समाजिक परिवर्तन के प्रमुख पांच तत्व हैं जिन्हे सांस्कृतिक परिवर्तन, धार्मिक परिवर्तन, आर्थिक परिवर्तन, पर्यावरण परिवर्तन, वैज्ञानिक परिवर्तन या तकनीकी परिवर्तन में बांटा जा सकता है जिसकी व्याख्या निम्नलिखित तरीके से देने की कोशिश की गई है।
सामाजिक परिवर्त्तन के पांच प्रकार :-- सांस्कृतिक परिवर्तन
- धार्मिक परिवर्तन
- आर्थिक परिवर्तन
- पर्यावरण परिवर्तन
- वैज्ञानिक या तकनीकी परिवर्तन
1. सांस्कृतिक परिवर्तन :- सांस्कृतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन का का प्रमुख प्रकार या तत्व है। जब से मनुष्य अस्तित्तव में आया है समाज में संस्कृति का विकास हुआ है। एक समाज में सांस्कृतिक परिवर्तन होते रहते हैं और ये समय के साथ बदलते भी रहते हैं।
- सांस्कृतिक परिवर्तन
- धार्मिक परिवर्तन
- आर्थिक परिवर्तन
- पर्यावरण परिवर्तन
- वैज्ञानिक या तकनीकी परिवर्तन
इसको समझने के लिए अगर हम भारत की ही नहीं अगर पुरे विश्व की बात करें तो हर संस्कृति में कहीं न कहीं बदलाव आया है। अगर पश्चमी समाज की बात करें तो समय के साथ उनके विवाह की रश्मों में उनके पहनावे में और उनके रहन सहन में कहीं न कहीं परिवर्तन जरूर देखने को मिला है। इस के साथ पूर्वी समाज की बात करें तो उनके सांस्कृतिक को भी देखा जा सकता है।
2. धार्मिक परिवर्तन :- भीमराव अमेडकर के अनुसार धर्म होते हैं जो नियमों को निर्धारित करते हैं। धर्म बनाने वाला और कोई नहीं पर मनुष्य ही है। पर अगर धर्म की बात करें तो धर्म में भी समय के साथ परिवर्तन देखने को मिले हैं। आज अगर धर्म की बात करें तो धर्म के नियमों को भूलकर उसे राजनीति से जोड़ने की कोशिश किया जाता है।
ये बात सच है कि धर्म आपस में बेर करना नहीं सिखाता है पर अगर किसी भी धर्म की प्रकृति की बात करें तो कहँ न कहीं धर्म में समय के साथ परिवर्तन आये है। सक्षेप में कहें तो धर्म में भी प्रकार बन चुके हैं।
3. आर्थिक परिवर्तन :- आर्थिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन का तीसरा प्रकार या तत्व माना जा सकता है। आर्थिक समाज में परिवर्तन या विकास भी धीरे धीरे हुआ है। पहले जहां मनुष्य का आर्थिक पहलु जहां केवल अपना पेट भरने तक था वहीँ आज Globalization के चलते हर कोई इंसान आर्थिक रूप से और भी मजबूत होना चाहता है।
आज आर्थिक परिवर्तन इतना हो चूका है कि इंसान केवल खाने या पेट भरने तक सीमित नहीं है वह इतना पैसा कामना चाहता है या धन अर्जित करना चाहता है जिससे वह हर कोई सुख पा सके ये सामाजिक परिवर्तन का पहलु प्रकार या तत्व है और जरुरी तत्व है।
4. पर्यावरण परिवर्तन :- तीव्र जनसंख्या वृद्धि, कृषि विकास, अशिक्षा, अज्ञानता व पर्यावरण बोध, उच्च भौतिक जीवन स्तर, औद्योगिकरण, परिवहन विकास, ताप विद्युत का उत्पादन, नगरीकरण आदि आज पर्यावरण परिवर्तन के कारण ही हैं। अगर आज देखा जाये तो दुनिया का पर्यावरण बिलकुल बदल चूका है।
भौतिक परिवर्तन में भी विकास धीरे धीरे हुआ है। औद्योगिकरण जहां समाज का विकास किया है वहीँ इसी औद्योगिकरण ने भौतिक पर्यावरण में बिलकुल बदलाव ला दिया है। इसके साथ अगर मानव समाज के पर्यावरण की बात करें तो इसमें जो बदलाव हुए है उसका अंदाजा आप अपने आप लगा सकते हो।
5. वैज्ञानिक या तकनीकी परिवर्तन :- वैज्ञानिक या तकनीकी परिवर्तन भी समाजिक परिवर्तन का अभिन्न अंग या फिर तत्व है। समय तो बलवान होता है पर आज समय के साथ वैज्ञानिक या तकनीक ने मनुष्य के रहन सहन में इतना ज्यादा परिवर्तन ला दिया है कि वह अपनी सभ्यता के लिए कभी खतरा बनता नजर आता है। वैज्ञानिक या तकनीकी परिवर्तन के कारण आज समाज में इतना ज्यादा बदलाव आ चूका है की आप एक जगह बैठ कर दूसरे व्यक्ति से कुछ मिनटों में बात क्र सकता हैं।
सामाजिक परिवर्तन के अन्य जरुरी प्रकार या तत्व :-
1. उद्विकास की धारणा {concept of evolution} :- उद्विकास को क्रमागत उन्नति उन्नति कहा जा सकता है। अगर सामाजिक परिवर्तन करें तो इसमें परिवर्तन एक दम से नहीं आया है पर इसका विकास धीरे धीरे हुआ है। पहले हिन्दू समाज में विवाह की रशमें अलग होती थी समय के सतह इसमें बदलाव आये और समाजिक परिवर्तन सामने आने लगे। इसी तरह अन्य समाज में भी परिवर्तन या विकास क्रमागत हुई है।
2. प्रगति की धारणा :- प्रोग्रेस या प्रगति ने भी समाज में परिवर्तन लाया है। मनुष्य का आदि काल से आज तक ये ही मकसद रहा है कि वह प्रगति करे और आज इस प्रगति ने महुष्य समाज में इतना परिवर्तन लाया है कि वह इस संसार को एक समझने लगा है।
3. विकास सामाजिक परिवर्तन का जरूरी प्रकार या तत्व :- अधिक विस्तृत होना , सुदृढ़ होना , बेहतर होना होने या बेहतर बनाने की प्रक्रिया, विकसित होने या करने करवाने की प्रक्रिया को विकास कहा जाता है। विकास ने भी हमारे समाज में परिवर्तन लाये हैं। जैसे जैसे मनुष्य आगे बढ़ता गया विकास करता गया और विकास के साथ आज उसने समाज में इतना परिवर्तन ला दिया है कि दुनिया एक Remote पर काबू प्रतीत लगती है।
4. सघर्ष :- संघर्ष ने भी समाज में काफी सामाजिक परिवर्तन लाये हैं। ये मनुष्य का सघर्ष ही है जिसने समाज में सामाजिक बुराइयों को दूर करके समाज में स्थिरता लाने की कोशिश की है और जायदातर भारतीय समाज में छुआछूत, असमानता, रगभेद जैसी बड़ी बुराइयों को दूर करके समानता स्थापित करने की कोशिश की है।
5. अनुकूल वातावरण :- अनुकूल वातावरण ने भी समाज में समाजिक परिवर्तन लाये हैं। अनुकूलित वातावरण कभी कभी मनुष्य समाज में विकास के लिए रूकावट पैदा करता है पर इसी अनुकूल वातावरण ने समाज में विकास की धारणा और अविकास की धारणा का विकास किया है और समाज में परिवर्तन लाये हैं।
निष्कर्ष :- निष्कर्ष में हम ये कह सकते हैं कि समाज में सामाजिक परिवर्तन के दो प्रमुख प्रकार हैं जिसमें विकासवादी सामाजिक परिवर्तन और, क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन हैं विकासवादी सामाजिक परिवर्तन का विकास धीरे धीरे हुआ है और क्रन्तिकारी सामाजिक परिवर्तन का विकास या परिवर्तन संघर्ष और क्रांति के कारण हुए हैं।
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