जानिए, हमारे जीवन में समाज का क्या महत्व है ? | Hamare jeevan mein samaj ka mahatva | Importance of society in our daily life in Hindi

जीवन में समाज का महत्व :-

समाज एक ऐसी अवधारणा है :जिसका हम केवल एहसास करते हैं और अपने कार्यों से इसका विकास कर सकते हैं। बिना समाज के मनुष्य तो क्या किसी भी प्राणी का जीवित रहना मुश्किल तो नहीं है पर इतना आसान भी नहीं है। एक समाज में रह कर प्राणी अपनी इच्छाओं को पूर्ति आसानी से कर सकता है। जहां तक मानव समाज की बात करें। 

आज मानव समाज विभिन्न वर्गों में बंटा हुआ है। आइये इस पोस्ट में Hindi Pukar के माध्यम से ये जानने की कोशिश करते हैं हमारे जीवन में समाज की जरूरत क्यों है, समाज हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है और समाज का हमारे जीवन में क्या महत्व है। 

हमारे जीवन में समाज  क्यों महत्वपूर्ण है और इसका क्या महत्व हैं ?

1. समाज एक 'संबंधों का महत्वपूर्णऔर जरुरी जाल है :- 

समाज एक ऐसी संस्था है जिसे हम आपसी सबंधों का जाल भी कह सकते हैं। मनुष्य या प्राणी जब भी जन्म लेता है उसके बात तुरंत उसके सबंध किसी न किसी से जुड़ जाते हैं। जन्म लेते है उसने इस धरती से सबंध कायम किये किये कि वह एक धरती पर रहने वाला प्राणी बन गया। इसके बाद उसने वालयवस्था में अपनी मां कोई मां बोलना सीखा फिर,दादा,भाई, बहिन और फिर पड़ोसियों के साथ खेलना शुरू किया। पहले जब मनुष्य एक छोटा होता है तो अपने पारिवारिक समाज में रहता है फिर उसके बाद, पडोसी समाज में रहता है उसके बाद नागरिक बनने के बाद वह अपने देश के लिए एक समाज का अच्छा उदहारण बनता है। 

सोचो अगर एक बच्चे और परिवार को अलग रखा जाये तो ये समाज नहीं कहलायेगा ये एक परिवार है, परिवार से ही समाज के सृजन की शुरुआत होती है उसके बाद समाज आगे बढ़ता है। ये संबंध मानव व्यवहार और समाज की विभिन्न संस्थाओं को समझने के लिए मौलिक हैं। इसलिए मानव सबंधो के माया जाल और आपसी रिश्तों और सबंधो को समझने और जानने के लिए समाज का अपना महत्व इसी लिए समाज हमारे लिए बहुत जरुरी है। 


2. समाज इसलिए भी जरुरी है ये स्थिति और पहचान बताता है :- 

मनुष्य समाज में रहता है तो वह रिश्ते कोई पहचानता है जब कोई भी जीव बचपन में होता है तो वह अपनी माता के साथ समाज का सृजन करता है उसके बाद परिवार में अपने दादा, पिता और भाई बहन की पहचान करता है। उसके बाद उनके प्रति अपने फर्ज और कर्तव्यों के साथ आगे बढ़ते हुए अपने पड़ोस में अपनी स्थिति की पहचान बनाने की कोशिश अपने दोस्तों के साथ करता है। 

उसके बाद बच्चा जब 14 से लेकर 19 साल का होता है तो वह सभी को भूल कर अपने इन्हीं उम्र के दोस्तों के साथ समाज का निर्माण करता है। 


जब बच्चे को समझ आती है तो अपना करियर बनाने के बारे में सोचता है और ऐसे समाज का सृजन करता है जो उसके साथ जुड़े हों। इसी तरह, वह परिवार और अन्य स्थितियों में भी कार्य करता है। इस प्रकार एक व्यक्ति दैनिक जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाता है। 

उदाहरण के लिए- एक व्यक्ति अपने बच्चों के लिए पिता, अपने माता-पिता के लिए पुत्र, अपनी पत्नी के लिए पति, अपने भाई-बहनों के लिए परेशान, अपने छात्रों के लिए शिक्षक और अन्य भूमिकाओं के लिए भूमिका निभा रहा है। इससे पता चलता है कि बदलते सामाजिक संदर्भ के साथ भूमिका बदल रही है और समाज में एक निश्चित स्थिति से जुड़ी प्रत्येक भूमिका सामाजिक स्थिति कहलाती है। 

इसलिए समाज का हमारे दैनिक जीवन बहुत महत्व है और इसकी जरुरत भी है इसके वगेर कोई भी मनुष्य अपनी स्थिति को नहीं पहचान सकता है। 


3. समाज एक बंधन नहीं एक विकास जरुरी प्रक्रिया है जो हमें नियम सिखाता है:- 

इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है जब भी इंसान जन्म लेता है उसके बाद अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक दूसरे पर निर्भर करता है जिसे एक वयवसायिक समाज भी कह सकते हैं जहां भी रहता है वहां ये ही कोशिश करता है कि अपने समाज में रहे। 

कुछ परिस्थियों में वह अपने आप को बंधन मुक्त समझकर समाज के निर्माता के रूप में उभर कर सामने आता है पर कुछ समय या कभी वह समाज को एक बंधन के रूप में समझता है। 


समाज एक बंधन नहीं है पर एक समाज की धीमी प्रक्रिया है जिसके साथ सभी को चलना ही पड़ेगा यह एक सच्चाई है। सोचो अगर एक इंसान अपनी मर्जी करने लगे और अपने नियमों पर चलना शुरू कर दे तो उसे समाज नहीं माना  है इसलिए समाज एक ऐसी धारणा है जो हमने रिश्तों की, नियमों की और सामाजिक मूल्यों की पहचान करना सिखाता है इसलिए समाज मानव जाति  के लिए ही नहीं सभी वर्ग के लिए जरुरी है। 


मानव संघर्ष और समानता के लिए समाज जरुरी है :- 

अगर समाज में सभी समानता का अधिकार चाहते हैं तो दूसरी ओर इस बार से इंकार नहीं कर सकते हैं कि समाज में संघर्ष भी समानता का एक अपवाद है अर्थात समाज में समानता होते हुए भी कभी -कभी छोटी सी बात को लेकर संघर्ष छिड़ जाता है समाज में अस्थिरता आना स्वभाविक हो जाता है। ये समानता और संघर्ष समाज के ही दो पहलु हैं। 

कभी कभी ये सघर्ष चरम सिमा पर पहुंच जाता है और मानव अपने ही समाज को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है इसलिए इस सघर्ष पर विराम चिन्ह लगाने वाला भी समाज ही इसलिए हमें समाज की जरुरत पड़ती है एक समाज ही है जो समाज में आपसी संघर्ष और समानता के पहलुओं को उजागर कर सकता है। 

इसके लिए एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं मान लो किसी ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की है कि वह वयक्ति अपने क्रियाकलापों से हमारे समाज को नुक्सान पहुंचा रहा है तो पुलिस सबसे पहले आपके नजदीकी सनाज से ही पूछेगी कि क्या यह सच्च है उसके बाद की कार्यवाही करेगी। इसलिए समाज में संघर्ष और समानता लाने के लिए समाज बहुत ही जरुरी है। 

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

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