एक शिक्षक सामने ये समस्याएं पैदा हो पैदा हो सकती हैं ? | These problems may arise in front of a teacher ?

शिक्षा, शिक्षक और शिक्षक की समस्याएं 

भारत एक महान देश है और जहां जनसँख्या की बात हो तो भारत दुनिया का दूसरा देश है जहां दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या पाई जाती है। इतने बड़े और महान देश में उन शिक्षा के महान व्यक्तियों ने जन्म लिया है जिनका नाम आज भी भुला नहीं जा सकता है। भारत में डॉक्टर राधाकृष्णन के जन्म दिन पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है जो 5 सितम्बर को मनाया जायेगा। भारत में पैदा हुए महान शिक्षक और अध्यातमक गुरु स्वामी विवेकानंद को कौन भूल सकता है। 

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के शिक्षकों के प्रति विचार आज भी हमारे कानो में गुजरते हैं। जहां भारत में शिक्षा में विकास हुआ है वहां शिक्षकों को कुछ समस्याओं का सामान भी करना पड़ रहा है आइये आज हिंदी पुकार के माध्यम से शिक्षकों की समस्याओं के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।

भारत में शिक्षकों की समस्याएं क्या है ? 

1. हर क्षेत्र में समर्थन और सहयोग की कमी :-


काम कोई भी हो एक दूसरे के सहयोंग के बिना नहीं चलता है और जहां हम शिक्षा की बात करते है तो इसमें सभी का सहयोग बहुत जरूरी है फिर चाहे वह शिक्षक हो अभिवावक हो या फिर फिर एक सामाजिक कर्यकर्ता हो। पर आज की शिक्षा प्रणाली में सहयोग का पतन होता जा रहा है। स्कुल चाहे सरकारी हो या प्राइवेट शिक्षण में चमक लाने के लिए सभी के सहयोग की जरूरत होती है। 

आज की शिक्षा में ये बात सामने आई है कि अगर एक शिक्षक शिक्षा के स्तर को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है तो उसे अभिवावकों का सहयोग नहीं मिलता, और अगर शिक्षक को माता -पिता का सहयोग मिलता है तो फिर कुछ policies ऐसी होती है जो शिक्षक के अनुकूल नहीं होती है। शिक्षकों के लिए शिक्षण प्रक्रिया में सहयोग की कमी बहुत बड़ी समस्या है।


2. शिक्षा में बुनियादी और गैर बुनियादी पाठ्यक्रमों में समानता का आभाव:-

आजकल की शिक्षा प्रणाली से जुडी शिक्षक की दूसरी समस्या यह है कि स्कूलों में बुनियादी और गैर बुनियादी पाठ्यक्रमों में भिन्नता पाई जाती है। जहां महतमा गाँधी जैसे शिक्षाविद शिक्षा में बुनियादी शिक्षा में Vocational शिक्षा को बढ़ावा देते थे वहीँ आज प्राइमरी शिक्षा में पाठ्यक्रम बिलकुल बदल चूका है इसकिये एक शिक्षक को विद्यार्थियों सही सांचे में ढालने के लिए Problem का सामना करना पड़ता है। बुनियादी शिक्षा को दरकिनार करके शिक्षा में किताबिकरण लाया जा रहा है जिससे शिक्षक Basic शिक्षा नहीं सिखा पाटा है और Grading तक सीमित रह जाता है।


3. आज का शिक्षक उचित शिक्षा प्रदान करने की वजाये कागजी शिक्षा में उलझा हुआ है :-

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि शिक्षक को शिक्षार्थियों का उचित रिकॉर्ड कायम रखना और उसे स्कुल बच्चों और माता पिता के सामने लाना बहुत जरूरी है पर आजकल का शिक्षक कागजी काम में इतना उलझ गया है कि उसे अपने शिक्षण का कुछ समय उचित रिकॉर्ड maintain करने में लग जाता है। शायद इसके पीछे कारन यह है कि आज शिक्षकों को शिक्षण के इलावा और काम लिए जा रहे हैं। Mid Day Meal का रिकॉर्ड तैयार करना, अपनी ACR को तैयार करना, Grading मूल्यांकन करना और सरकार की हदायतों के अनुसार और सरकारी कामों में उलझना जैसी समस्यायों का सामना शिक्षक को ही करना पड़ता है।



4. शिक्षक की आर्थिक दशा और दिशा की समस्या :-

हर कोई ये ही चाहता है कि वह आर्थिक रूप से मजबूत हो अर्थात उसके व्यवसाय के साथ उसका आर्थिक पक्ष भी मजबूत हो। हालाँकि एक सरकारी शिक्षक अर्थी रूप से संतोषजनक हो सकता है पर अगर वही शिक्षक एक Private संस्थान में एक शिक्षक है तो उस शिक्षक की आर्थिक दशा और दिशा को संतोषजनक नहीं माना जा सकता है। अगर एक शिक्षक निजी संस्थानों में शिक्षण करवाता है तो आजकल की महंगाई में वह मुश्किल से गुजारा क्र सकता है इसलिए एक शिक्षक की आर्थिक पक्ष में बह एक समस्या है हालाँकि 1964 के कोठरी कमीशन में शिक्षक की आर्थिक, सामाजिक व व्ययसायिक स्थिति सुधारने की सिफारिश भी की गई है।


5. शिक्षक की समस्या का सामाजिक पहलु :-

शिक्षक समाजिक दृष्टि से सब मजबूत माना जाता है एक शिक्षक ही है जो एक अच्छे समाज का निर्माण करता है। पर आजकल देखने में आया है कि एक शिक्षक आर्थिक पहलु से कमजोर होता जा रहा है। एक शिक्षक कड़ी मेहनत के साथ इस कुर्सी को ग्रहण करता है अगर एक शिक्षक, शिक्षक बना है तो उसके पीछे उसकी योग्यता है और सक सिपाही, सिपाही है तो उसके पीछे भी उसकी पर अगर शिक्षक शिक्षक बन जाता है तो उसको समाज में वह रुतवा नहीं मिलता है जो मिलना चाहिए बस इस बात को धीरे से कह दिया जाता है ये एक अध्यापक है और शिक्षण ही उसका फर्ज है। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं की शिक्षक को सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए बेकार प्रयास करने चाहिए पर सामाजिक दृष्टि से उन्हें एक अच्छा रुतवा मिलाना कहीं न कहीं जरूरी है।

6. शिक्षकों के लये पर्याप्त सामग्री का आभाव :-

हालाँकि इस बात को सही रूप से नहीं कहा जा सकता है कि स्कूलों में और शिक्षा संस्थानों में पर्यापत सामग्री का आभाव है फिर भी अगर दूसरे पहलु को समझने की कोशिश करें तो अभी भी भारत के कई स्कल हैं जिसके पास शिक्षण की पर्याप्त सामग्री का आभाव है नै शिक्षा नीति लागु होने के बाद शिक्षा में सुधार तो लाये गए हैं पर आज भी भारत में ऐसे स्कूल हैं जहां उचित शिक्षा का पर्याप्त प्रबंध नहीं है। संस्थान पूरे वर्ष में कई बार कई बार परीक्षा आयोजित करता रहता है। वे केवल अपने अंकों के आधार पर छात्रों के सीखने के बारे में बड़े निष्कर्ष पर आते हैं। लेकिन यह किसी बच्चे की क्षमताओं को आंकने का अंतिम उपाय नहीं है, इसके बजाय बच्चे को पर्याप्त शिक्षण सामग्री, उचित बुनियादी ढांचा और शिक्षक का समर्थन दिया जाना चाहिए।


7. अधिकांश शिक्षकों में प्रशिक्षण का आभाव :-


टीचर जब टीचर बन जाता है तो वः एक पूर्ण अध्यापक नहीं बन जाता है उसके अंदर गुण तो होते हैं जो शिक्षा को आगे लेकर जाये अपर इसके साथ एक शिक्षक के लिए ये जरूरी है की उनके लिए उचित शिक्षण का प्रबंध किया जाये। प्राइमरी शिक्षक और माध्यमिक शिक्षकों का शिक्षण के लिए आपसी संपर्क जरूरी है और इसके लिए सेमिनार और प्रशिक्षण का आयोजन जरूरी है। 

विश्वविद्यालयों में भी अध्यापक शिक्षा में होने वाले अनुसंधानों, शोध कार्यों एवं नवीन मनोवैज्ञानिक शिक्षण पद्धतियों की जानकारी प्राथमिक एवं पूर्व स्तरीय योग्यता के अध्यापकों को नहीं हो पाती है। इस समस्या के समाधान हेतु केंद्र सरकार की सहायता से एनसीईआरटी तथा केंद्रीय शिक्षा संस्था दिल्ली द्वारा सभी स्तरों के अध्यापक शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है। कोठारी आयोग ने भी इस प्रस्ताव को दूर करने पर बल दिया।

8. पूरी कक्षा की निगरानी में कठिनाई:-

अधिकांश समय हम शिक्षक प्रत्येक छात्र पर विशेष रूप से समय पर पाठ पूरा करने की हड़बड़ी में ध्यान नहीं दे पाते हैं। यह ज्यादातर शरारती छात्रों के कारण है, जो आगे की पंक्तियों में बैठे हैं, जो चल रहे पाठ के दौरान शिक्षकों को परेशान करते हैं। यह बदले में, हमें उन छात्रों में शामिल होने में असमर्थ बनाता है जो पीछे की बेंच पर बैठते हैं या कक्षा में अन्य छात्र जो सीखना चाहते हैं। नतीजतन, शिक्षक किसी तरह पाठ्यक्रम को पूरा करता है, जिससे छात्र समझ वाले हिस्से को छोड़ देते हैं। इससे कक्षा के प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

9. अध्यापक प्रशिक्षण में बुनियादी शिक्षा का आभाव :-

एक और शिक्षा, शिक्षक और शिक्षण के विषय में तथ्य यह है कि शिक्षक को अध्यापक का प्रशिक्षण है पर जब एक शिक्षक को प्रशिक्षण दिया जाता है तो उन्हें बुनियादी शिक्षा से दूर रखा जाता है। प्रिशिक्षण बीएड का हो या फिर प्राइमरी लेवल का शिक्षक को बुनियादी शिक्षा नहीं दो जाती है।


10. माता-पिता की भागीदारी:-

यदि बच्चे के माता-पिता शैक्षिक मोर्चे पर उनके साथ सहयोग नहीं करते हैं, तो स्कूल शिक्षक के लिए यह वास्तव में कठिन हो जाता है। अमेरिकी माता-पिता के साथ समस्या यह है कि या तो वे अपने जीवन में बहुत व्यस्त हैं या उनके पास उचित शिक्षा का अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप वे अपने बच्चों की शैक्षिक प्रगति पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। वास्तव में, मैंने देखा है कि माता-पिता गृह कार्य की अवधारणा का विरोध करते हैं। उनमें से अधिकांश की शिकायत है कि उनके बच्चों को दिए गए कार्य उनके ज्ञान के दायरे से बाहर हैं और वे अपने बच्चों को गृह कार्य पूरा करने के लिए मार्गदर्शन नहीं कर सकते हैं।

अधिकांश माता-पिता स्कूल द्वारा आयोजित माता-पिता की बैठकों और गतिविधियों में खुद को शामिल नहीं करते हैं। मैंने देखा है कि मेरे कुछ छात्रों के माता-पिता एक जैसे हैं। ईमानदारी से, माता-पिता के साथ उचित चर्चा के बिना, मेरे लिए उनके बच्चे को अकादमिक रूप से मजबूत करना बहुत कठिन हो जाता है। ये सभी कारक कक्षा में छात्रों के समग्र प्रदर्शन को प्रमुख रूप से प्रभावित करते हैं। इसलिए माता-पिता और शिक्षकों के बीच संचार में सुधार किया जाना चाहिए

Note: इस पोस्ट के माध्यम से मेरा मकसद किसी शिक्षा प्रणाली को इंगित करना नहीं है ये सभी सामान्य Problems या समस्याएं हैं जो एक शिक्षक के सामने आती रहती है अगर आप एक आदर्श शिक्षक हो तो इन शिक्षक की समस्यायों पर काबू प् सकते है और यह मुश्किल भी नहींए है।



Rakesh Kumar

Rakesh Kumar From HP is interested in writing and go to the provision when where and why

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