स्वामी विवेकानद के धार्मिक विचार :- स्वामी विवेकानंद को सदी के महान नायक माना जाता है उन्होंने एक हिन्दू धर्म के भिक्षु के रूप में भारत का ही नहीं पुरे विश्व का मार्गदर्शन किया था उनका मार्गदर्शन इतना सरल और स्वच्छ था कि आज भी भारत ही नहीं पूरी दुनिया उनके मार्गदरशन पर चलती है। वे एक धार्मिक महापुरुष थे उनकी धार्मिक आस्था विजोड़ थी। आइये जानते हैं उनके धार्मिक विचारों के बारे में।


स्वामी विवेकानंद की धर्म प्रति सोच या परिभाषा :- स्वामी विवेकानंद के लिए, धर्म केवल सिद्धांत नहीं था, बल्कि जीवन में लागू होने वाला एक वास्तविक अभ्यास था, जो मनुष्य में और मनुष्य को ईश्वर में बढ़ाता है, यह कहते हुए कि "यह होना और बनना है, सुनना या स्वीकार नहीं करना; यह संपूर्ण है आत्मा जो विश्वास करती है उसमें बदल जाती है।" वह उस समय के धार्मिक अनुष्ठानों से नफरत करता था।
1. मूर्ति पूजा के लिए स्वामी विवेकानंद की सोच :-
स्वामी विवेकानंद एक ऐसे अध्यातमक गुरु थे जो सभी धर्मों के ज्ञानी थे। कुछ विचारकों ने हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का खंडन किया है। स्वामी जी मूर्ति पूजा के विवाद पर हमेशा ये कहते थे थे कि मूर्ति पूजा एक साधन है जिसके जरिये हम शुक्षम मन से अपने भगवान् की पूजा क्र सकते है। वे मूर्ति पूजा के समर्थक थे और हमेशा इस बात को कहते थे कि मूर्ति पूजा पर विवाद करना गलत है।
स्वामी विवेकानंद एक ऐसे अध्यातमक गुरु थे जो सभी धर्मों के ज्ञानी थे। कुछ विचारकों ने हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का खंडन किया है। स्वामी जी मूर्ति पूजा के विवाद पर हमेशा ये कहते थे थे कि मूर्ति पूजा एक साधन है जिसके जरिये हम शुक्षम मन से अपने भगवान् की पूजा क्र सकते है। वे मूर्ति पूजा के समर्थक थे और हमेशा इस बात को कहते थे कि मूर्ति पूजा पर विवाद करना गलत है।
उनका मानना था कि मूर्ति एक प्रतीक होता है और इस प्रतीक की वजह से ही हम सूक्षम से भी सूक्षम तथ्यों तक पहुँच सकते हैं। उनके अनुसार ये जब हम ध्यान करते हैं तो विभिन्न मूर्तियों को अपने मन में विचारते हैं इस प्रकार किसी अच्छी मूर्ति का हम अनुष्ठान करते हैं इसलिए उनकी नजरों में मूर्ति पूजा कहीं न कहीं सही है।
2. स्वामी विवेकानद की हिन्दू धर्म के प्रति सोच :-
स्वामी जी धर्म को एक वस्तू नहीं मानते थे पर वे हिन्दू धर्म और आस्था के समर्थक थे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भले ही उन्होंने 1893 के शिकागो भाषण में मेरे प्रिय, अम्रेरीकन भाई और बहनों से की थी पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने अंत में उनके स्वागत और सत्कार के लिए सभी अमेरिका वासियों का, हिन्दू धर्म की तरफ से धन्यवाद भी किया था। हाँ स्वामी जी हमेशा हिन्दू धर्म को वेदांत से जोड़ते थे और वेदांत पर विश्वास रखते थे।
3. स्वामी विवेकानंद और विश्व धर्म :-
स्वामी विवेकानंद भले ही हिन्दू धर्म के पुजारी और भिक्षुक थे पर वे हमेशा विश्व धर्म के समर्थक थे। उनका मकशद हिन्दू धर्म में कटटरता लाकर उसका व्यख्यान करना नहीं था पर वे हमेशा ही इस बात पर विश्वाश रखते थे कि वेदांत के जरिये दुनिया को एक सूत्र में बांधा जाये। विश्व धर्म के समर्थन में वे ये मानते थे कि जिस तरह सारी नदियां अपने प्रवाह के बाद, एक विशाल समुन्दर में जाकर मिल जाति हैं ठीक उसी प्रकार सभी धर्म भी एक सूत्र होने चाहिए। सभी धर्मों का अनुष्ठान अलग हो सकता है पर उदेश्य एक ही होना चाहिए वह मानव कल्याण ही है।
4. स्वामी विवेकानद के माया पर विचार :-
4. स्वामी विवेकानद के माया पर विचार :-
स्वामी विवेकानंद वेदों को मानते थे और वेदों में इद शब्द ने माया के कई रूप धारण किये हैं। वेद में माया जाल को इंद्र जाल से जोड़ा गया है। कुछ विचारक मानते है हिन्दू धर्म माया पर विश्वास रखता है और माया एक भ्र्म है। पर स्वामी विवेकानंद जी ने माया के सिद्धांत को अपनाया था। उनका मानना था हमारा शरीर इन्द्रियां द्वारा काबू होता है और ये वास्त्विक है। माया एक सोच है और हमारी इन्द्रियां भी एक सोच पर निर्भर करती हैं इसलिए जीवन में माया जाल का भी कहीं न कहीं स्थान जरूर है।
5. असहाये व्यक्तियों की सेवा परम धर्म :-
5. असहाये व्यक्तियों की सेवा परम धर्म :-
स्वामी विवेकानद जी मानते थे थे इंसान ही नहीं हर कोई जीव किसी न किसी रूप में भिन्न पाया जाता है। इंसानों में भी ये ही प्रवित्ति पाई जाती है। किसी भी धर्म में कमजोर व्यक्तियों की सेवा करना है हर व्यक्ति का धर्म है। अगर कोई वयक्ति शारीरिक रूप, आर्थिक रूप या आध्यात्मिक रूप से कमजोर है तो इसका मतलब ये नहीं उसे समाज से अलग कर दिया जाये।
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