1857 का विद्रोह : कारण और परिणाम | Causes and Consequences of the Revolt of 1857 in Hindi
नमस्कार , भारत में आजादी की लड़ाई को कौन भूल सकता है। ब्रिटिश इष्ट इण्डिया कंपनी जा भारत में आई तो उसके बाद उसका एक ही ही उदेश्य था भारत को अपना उपनेषवाद बनाना और भारत का अपने हित के लिए प्रयोग करना। भारत एक उपमहाद्वीप है और इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था। सबसे पहले भारत में वास्कोडि गामा भारत आया। 1600 ईसवी से लेकर 1857 तक भारत में छोटे छोटे विद्रोह जरूर हुए थे। पर ये विद्रोह छोटे होते थे जिन्हे अंग्रेजों दुआरा जल्दी खत्म कर दिया जाता था और आसानी से खत्म कर दिया जाता था।
पर जो 1857 का विद्रोह हुआ उसकी अपनी एक पृष्ठ भूमि है। इस पोस्ट में हम जानने की कोशिश करेंगे कि 1857 के विद्रोह के क्या कारण थे और इस विद्रोह के खत्म होने के बाद भारत भारतियों को इसका फायदा हुआ या नहीं। और साथ हिंदी पुकार के माध्यम से ये भी जानने की कोशिश करेंगे की 1857 के विद्रोह की असफलता के कारण क्या थे। तो आइये शुरू करते हैं।
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1857 का विद्रोह :- राजनीतिक कारण, सामाजिक धार्मिक कारण, आर्थिक कारण, असफलता के कारण और परिणाम। |
भारत में 1857 का विद्रोह
1857 के विद्रोह के नाम - भारतीयों ने इसे आजादी की पहली लड़ाई, भारत में स्वतंत्रता का पहला युद्ध, स्वतंत्रता का पहला युद्ध, और का महान युद्ध के नाम से पुकारा। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने इसे सैनिक विद्रोह के नाम से बुलाया था। और वीर सावरकर जैसे क्रन्तिकारी ने तो इसे आजादी का महान युद्ध कहा था।
1857 के विद्रोह के कारण :-
अगर भारत में 1857 के विद्रोह के कारणों की समीक्षा करें तो इसके पीछे चार कारण थे जो प्रमुख माने जाते हैं इनमे से थे राजनीतिक कारण, आर्थिक कारण, सैन्य कारण और सामाजिक कारण अर्थात इन चारों के आधार पर भारतीयों से अंग्रेजों द्वारा पक्षपात किया जाता था इसलिए सभी भारतीय एक बड़े स्तर पर अंग्रेजों के खिलाफ एकत्रित हुए और 1857 का विद्रोह हुआ। पहले जानते हैं राजनीतिक कारण।
A. 1857 के विद्रोह के राजनीतिक कारण- |
इसके साथ भारत के जो बड़े राजा थे उन्हें भी सत्ता से दूर क्र दिया गया था इसके पीछे लार्ड डलहौजी द्वारा बनाया कानून था। दूसरी तरफ भारत के उस वक्त के जाने माने नेता नाना साहिब की पेंशन बंद कर दी गई थी । इसलिए ये भी एक राजनैतिक कारण था। आजादी की लड़ाई लड़ने वाली लक्ष्मीबाई पर भी एक कानून के तहत गोद लिए पुत्तर को सिंहासन पर बैठने से अंग्रेजों द्वारा इंकार कर दिया था। व्यपगत का सिद्धांत लार्ड डलहौजी द्वारा चलाया गया था। पहले जानते हैं क्या था व्यपगत का सिद्धांत।
यही कारण था कि रानी लक्ष्मीबाई ने इस आंदोलन में आगे होकर साथ दिया किउंकि अपने गोद लिए पुत्र को सिंहासन पर बिठाना चाहती थी और अंग्रेजों ने ये भारतीयों के लिए एक गलत कानून बनाया था। 1857 के विद्रोह का का यह कारण इसलिए भी बना कि अंग्रेजो ने रानी लक्ष्मीबाई ने इस कानून के तहत अपना राज्य देने से इंकार कर दिया था। पर इससे पहले कंपनी सतारा ,जैतपुर-संभलपुर, बघाट , उदयपुर नागपुर , करौली और अवध राज्यों का विलय इष्ट इण्डिया कंपनी में कर दिया था।
B. 1857 के विद्रोह के सामाजिक और धार्मिक कारण :- |
अंग्रेजों के रहन सहन और वेश भूषा में भी फर्क था जो भारत के समाज के लिए एक खतरा बनता जा रहा था। जब किसी से सामाजिक तौर पर भेदभाव किया जाये तो इसका असर सीधे तौर वहां की अर्थव्यवस्था और रीती रिवाजों पर पड़ता है इसलिए लोग इस बात भी चिंतित थे कि कहीं उनके सामाजिक मूल्यों का हनन न हो इसलिए क्रांति या विद्रोह का फैला स्वभाविक था। यहीं नहीं 1857 से पहले भारत के धार्मिक मूल्यों और कानूनों के साथ भी छेड़छाड़ की गई थी अर्थात उसमें बदलाव किये गए थे।
हिन्दू धर्म में उस वक्त कुछ प्राचीन और गलत प्रथायें भी थी जैसे सती प्रथा, पर इसके साथ भारत के लोगों ने विधवा पुनर्विवाह जैसे परम्पराओं के साथ भी छेड़छाड़ की थी और भारतीय हिन्दू एक्ट 1850 के तहत बड़ा बदलाव किया था। दूसरा धार्मिक कारण ये था कि हिन्दू और मुस्लिम पदाधिकारियों को धर्म के आधार पर नौकरी दी जाती थी। एक बात दिलचप्प है कि 1857 के विद्रोह से पहले पदाधिकारियों का Ratio 5 :1 था अर्थात पांच में से एक हिन्दू को नौकरी दी जाती थी। ये एक धार्मिक भेदभाव था। इन सभी कारणों से ही लोगों को अब ये वहम सताने लगा था कि उनके साथ धार्मिक भेदभाव करके उनके धर्म को बदलने की कोशिश की जा रही है।
C. 1857 के विद्रोह के आर्थिक कारण :- |
एक तरफ जमीनों में कमी आ रही थी दूसरी तरफ अंग्रेजों ने लगान और कर प्रणाली में ऐसे बदलाव किये थे जिसे किसान और भी परेशान होते जा रहे थे। जब कोई किसान खेती करता था तो उसे खेती के लिए जरूरी साधन महाजनों से लिए गए कर्ज से जुटाने पड़ते थे। पर जब खेती त्यार होती थी तो अकाल की वजह से वे कर्ज नहीं चूका पाते थे जब वे कर्ज नहीं चूका पाते तो उनकी भूमि पर कब्ज़ा कर लिया जाता था इसलिए भी किसान वर्ग क्रांति या विद्रोह पर उतारू हुआ था। अब कुछ किसान ऐसे भी थे जो सेना में भर्ती थे और जब उन्हें इस बात का सामना करना पड़ा तो उनमे भी रोष का उतपन होना स्वाभाविक था।
ब्रिटेन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति भारत से होती थी और वहां से त्यार मॉल भारत में आता था। एक तरफ तो भारत से कच्चा मॉल ख़त्म हो जाता था और दूसरा इंग्लैंड में त्यार मॉल या कपडा मशीनों से बना होता था जिससे अर्तव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा था। इन्ही आर्थिक कारणों से भी 1857 के विद्रोह को तूल मिला।
D. 1857 के विद्रोह के सैनिक और तत्कालीन कारण |
जब किसी भी सैनिक काम की बात आती तो उन्हें उनकी धार्मिक अश्थाओं को ध्यान में रखे वगेर ड्यूटी पर भेजा जाता था। भारतीय सेना में चाहे वह हिन्दू हो या फिर मुस्लिम काम करें के लिए समुन्दर पार भेजने के लिए वाध्य किया जाता था ऐसा लार्ड कैनिंग ने 1850 में कानून बनाया था। अगर कोई भी सैनिक अगर ऐसा करने से इंकार करता तो तो उसे नौकरी से बर्खास्त करने का डर दिया जाता था।
1857 के तत्कालीन कारण सैनिक विद्रोह के साथ शुरू हुआ। भारतीय सैनिकों के लिए एक कारतूस का निर्माण किया गया था जिसे "एनफील्ड" नामक राइफल में लोड करने के लिए उसे पहले दांतों से डिस्पोज़ करके खोलना पड़ता था और उसके बाद उसे प्रयोग में लाया जाता था। कुछ लोगों को इस बात का पता चल चूका था कि इस कारतूस को बनाने में सुअर की चर्बी और गए की चर्बी का इस्तेमाल किया गया था।
मंगल पांडे देश के पहले शहीद ने इस बात को साफ करने के लिए ब्रिटिश अधिकारीयों के साथ बात भी कि पर लार्ड कैनिंग ने इस बात का आश्वासन दिलाया गया कि उनकी धार्मिक भावना के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया जा रहा है और इस कारतूस में शोध कर दिया गया है।
पर जब मंगल पांडे को इस बात का पता चला तो उन्होंने परेड के समय एक ब्रिटिश अधिकारी को गोली मार दी जिसके जुर्म में उन्हें 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई। इससे सैनिकों में असंतोष फ़ैल गया। सैनिकों ने 9 मई 1857 को ये कारतूस प्रयोग में लाने से मना कर दिया और 10 मई 1857 में ये सैनिक विद्रोह 1857 के विद्रोह में बदल गया।
झाँसी भी इस विद्रोह का मुख्य केंद रहा क्योकि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को गोद लिए पुत्र को सिंहासन पर बैठने के लिए इंकार कर दिया गया था। ग्वालियर में तांत्या टोपे ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया और ये भी केंद्र रहा। बिहार भी इस विद्रोह का केंद्र रहा और यहाँ पर कुंवर सिंह ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया। विद्रोह लगभग 14 महीने तक चला पर दमनकारी नीतियों के चलते ये विद्रोह ख़त्म हो गया और 8 जुलाई, 1858 को लॉर्ड कैनिंग ने इस विद्रोह के ख़त्म होने की घोषणा कर दी क्योकि सभी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया था इसलिए अब इस विद्रोह का नेतृत्व करने वाला कोई मजबूत नेता नहीं था।
स्थान का नाम | भाभारतीय नेता | अंग्रेज अधिकारी का नाम |
दिल्ली में | बहादुर शाह द्वितीय | जॉन निकोलसन |
लखनऊ में | बेगम हजरत महल | हेनरी लारेंस |
कानपुर में | नाना साहेब | सर कोलिन कैंपबेल |
झाँसी और | लक्ष्मी बाई और तात्या टोपे | जनरल ह्यूग रोज |
ग्वालियर में |
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बरेली में | खान बहादुर खान | सर कोलिन कैंपबेल |
इलाहाबाद | मौलवी लियाकत अली | कर्नल ऑनसेल |
1857 विद्रोह की असफलता के कारण |
कुछ रियासतों का विद्रोह में भाग नहीं लेना :-
समन्वय का आभाव -
संगठन की कमी :-
नेतृत्व का आभाव :-
उदेश्य की कमी :-
भारतीय नेताओं के पास संसाधनों की कमी :-
हर किसी आंदोलन को कामयाब करने के लिए संसाधन का होना जरूरी होता है जैसे मान लो बिहार में किसान आंदोलन हुआ उस वक्त उनके पास जो रहने की वयवस्था करने के लिए, खाने पीने के लिए व्यवस्था की गई और उनके आने जाने का भी प्रबंध किया जा रहा था। पर 1857 के आंदोलन में जरूरी संसाधनों जैसे डाक सेवायें, आने जाने के साधनो, और बड़ी बात ये की संचार के साधनो की कमी थी इसलिए ये आंदोलन जल्दी समाप्त करने में अंग्रेजों को कोई भी कठिनाई नहीं हुई।
कुछ वर्ग का इस आंदोलन से दूर रहना :-
1857 के विद्रोह के परिणाम |
1. इस आंदोलन की समाप्ति के बाद भारतीय शासन अधिनियम 1858 अस्तित्व में आया और जिसे विक्टोरिया घोषणा पत्र के नाम से भी जाना गया। इस घोषणा पत्र को लार्ड कैनिंग ने पढ़ा।
2. इस आंदोलन के बाद भारत में ब्रिटिश ईष्ट इण्डिया का खात्मा हो गया और अब शाषन ब्रिटिश सरकार के अधीन था।
3. गवर्नर जनरल का पद समाप्त कर दिया गया और वायसराय के पद को लाया गया। लार्ड कैनिंग ही अंतिम गवर्नर जनरल थे और उन्हें प्रथम वायसराय चुना गया।
4. भारतीय सेना में सैनिकों का अनुपात 5 :1 से 2:1 कर दिया गया और उनके साथ भेदभाव से मनाही की गई।
5. घोषणा पत्र में ये कहा गया कि भारतीयों के साथ किसी भी किस्म का सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक भेदभाव नहीं किया जायेगा और विस्तारवादी नीति पर रोक लगा दी गई।
6. भारतीय देशी रियासतों को उनके अधिकार दिए जायेंगे और उनका सम्मान किया जायेगा। व्यपगत के सिद्धांत को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था। अर्थात अब किसी भी राजा को पुत्र गोद लेने का पूर्ण अधिकार था और उसे साम्राज्य भी शौंप सकते थे।
निष्कर्ष :- "1857 के विद्रोह" का ये निष्कर्ष निकलता है कि , चाहे इस आंदोलन को किसी न किसी रूप में दबा दिया गया था पर इस आंदोलन ने भारत में क्रांति क्र बीज बोये और देश को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया।
