भारत में आर्थिक संकट का इतिहास, कारण | History of economic crisis in India in Hindi

भारत में आर्थिक संकट का इतिहास :- 

भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका 2022 अब तक के सबसे खराब आर्थिक संकटों में से एक है। यह अपनी आजादी के बाद पहली बार अपने विदेशी ऋणों में चूक कर चुका है और उसे ये भारी पड़ रही। लगभग 2.19 करोड़ वाली जनसंख्या वाले देश में 22 मिलियन लोग 12 घंटे बिजली कटौती, और भोजन, ईंधन और दवाओं जैसी अन्य आवश्यक वस्तुओं की अत्यधिक कमी का सामना कर रहे हैं।

एक किलोग्राम चावल जैसे खाद्य पदार्थों की कीमतों में 500 श्रीलंकाई रुपये बढ़ने के साथ मुद्रास्फीति 17.5% के उच्चतम स्तर पर है। जब आम तौर पर इसकी कीमत लगभग 80 रुपये होती है। श्रीलंका के आर्थिक संकट के साथ ये जानना भी जरूरी है भारत कब और किन परिस्थितियों में आर्थिक संकट का शिकार रहा है। आइये श्रीलंका के आर्थिक संकट के 2022 के संधर्व में भारत के आर्थिक संकट के इतिहास "History of economic crisis in India" पर एक नजर डालते हैं। 






भारत में आर्थिक संकट का इतिहास, कारण और लिस्ट 


भारत में पहला आर्थिक संकट 1958 :-


भारत एक कृषि प्रधान देश है और आजादी के बाद भारत की अर्थवयवस्था कृषि पर ही निर्भर करती थी। पर 1957 का Financial Year भारत के लिए मुश्किलों भरा था जब भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। उस वक्त भारत में पहला आर्थिक संकट आया था।भारत में कमजोर मानसून और सिंचाई के कम साधन की वजह से ने कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला, जिससे कीमतों में वृद्धि हुई। 1957 - 58 के वित्त वर्ष में भारत को अपना खाद्यान वस्तुओं का आयात बढ़ाना पड़ा। 

जहां 1957 में खाद्यान वस्तुओं का आयात 20 लाख था उसे Double 40 लाख टन करना पड़ा। 1957-58 के दौरान, भारत को आर्थिक विकास में पहली गिरावट का सामना करना पड़ा जब 1.2 प्रतिशत की नकारात्मक जीडीपी वृद्धि दर्ज की गई। दूसरी तरफ निर्यात में भारी कमी आयी थी। भारत का व्यापार घाटा 1955 और 1957 दो सालों के अंतराल में 0.1 बिलियन डॉलर से बढ़कर लगभग 0.9 बिलियन डॉलर हो गया, जबकि सोने का स्टॉक और विदेशी भंडार घटकर आधा रह गया। ये कारण था भारत को पहले आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।


भारत का दूसरा आर्थिक संकट 1966 :-


आजादी के बाद भारत ने एक बड़े देश चीन के साथ पहली बार 1962 में युद्ध लड़ा था और इस युद्ध से अर्थ व्यवस्था को निकालते हुए चार साल लग गए। पर 1965 में भारत ने फिर से एक युद्ध का सामना किया जो उसे अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ लड़ना पड़ा जो 1965 में लड़ा गया। इस युद्ध के बाद जब भारत की अर्थवयवस्था थोड़ी बूस्ट हुई थी उसमें फिर से कमी आ गई। 1965 के युद्ध के बाद भारत को एक साल बाद 1966 में एक गंभीर आकाल का सामना करना पड़ा और उसने भी भारत की अर्थववस्था पर बुरा प्रभाव डाला। उस समय के दौरान भारत को विशेष रूप से अमेरिका से विदेशी सहायता पर भारी निर्भरता थी। 


भूख से मर रही आबादी के बचाव के लिए विदेशी खाद्य भी दी गई और भारत को खाद्य पदार्थों में बढ़ोतरी करनी पड़ी। वित्तीय वर्ष 1966 में भारत को 1 करोड़ टन खाद्य सहायता मिली पर इस वित्त वर्ष में भारत को -3.66% का आर्थिक संकुचन का सामना करना पड़ा जिससे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।


भारत में तीसरा आर्थिक संकट 1974 : - 


वित्त वर्ष 1973 -1974 में भारत ने ही नहीं पुरे विश्व ने कहीं न कहीं आर्थिक संकट का सामना किया था। ये आर्थिक संकट एक ऊर्जा संकट के नाम से भी जाना जाता है। 1973 में अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OAPEC) ने तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस प्रतिबंध का कारण इसराइल और योम किप्पुर युद्ध था। अरब Countries ने सीधे तौर से उन देशों पर तेल पर प्रतिबंध लगाया था जो इजराइल का साथ दे रहे थे। 


एक अनुमान में कुछ ही समय में, तेल की कीमतें 400 प्रतिशत बढ़कर 3 डॉलर से 12 डॉलर हो गईं। भारत को भी इस प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। भारत का तेल आयात बिल 1972-73 में $414 मिलियन से बढ़कर 1973-74 तक लगभग $900 मिलियन हो गया। परिणाम ये हुए कि भारत की अर्थवयवस्था में 0.32 % की कमी आई और भारत को इस वित्त वर्ष में आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।


भारत में आर्थिक संकट 1981-82 :- 

दूसरी बार भारत को फिर से तेल की कीमतों ने झटका दिया था और इसका मुख्य कारण ईरानी क्रांति थी जब खाड़ी के देशों में तेल के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। इसके बाद ईरान-इराक युद्ध हुआ जिसने उत्पादन को और कम कर दिया और कीमतों में वृद्धि हुई। इस युद्ध का भारत की अर्थ वयवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ा और 1978-79 से 1981-82 के बीच भारत को तेल के आयात में दो गुना वृद्धि करनी पड़ी। इस वित्त वर्ष में भारत के निर्यात में आठ प्रतिशत की कमी आयी थी। ये भी भारत के लिए एक आर्थिक संकट था।


भारत में आर्थिक संकट 1991:- 


1991 का आर्थिक संकट भारतीय आर्थिक संकट एक सबसे आर्थिक संकट था, जो आयात और अन्य बाहरी कारकों पर अधिक निर्भरता के कारण भुगतान घाटे के संतुलन के परिणामस्वरूप हुआ था। भारतीय व्यापार संतुलन उस समय घाटे में था जब सरकार भारी राजकोषीय घाटे पर चल रही थी। ये ही करण था कि फरवरी 1991 में चंद्रशेखर सरकार बजट पारित नहीं कर सकी थी। इसने देश के लिए अल्पकालिक ऋण लेना असंभव बना दिया और आर्थिक संकट को बढ़ा दिया था। विश्व बैंक और आईएमएफ ने भी अपनी सहायता बंद कर दी, जिससे सरकार के पास भुगतान में चूक से बचने के लिए देश के सोने को गिरवी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।


1991 का संकट मुद्रा के अधिक मूल्यांकन के कारण हुआ था। चालू खाता घाटा, और निवेशकों के विश्वास ने तीव्र विनिमय दर मूल्यह्रास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्थिक संकट मुख्य रूप से 1980 के दशक में बड़े और बढ़ते राजकोषीय असंतुलन के कारण था। अस्सी के दशक के मध्य में, भारत में भुगतान संतुलन की समस्या होने लगी। खाड़ी युद्ध के कारण, भारत का तेल आयात बिल बढ़ गया, निर्यात में गिरावट आई, ऋण सूख गया और निवेशकों ने अपना पैसा निकाल लिया था। वी पी सिंह को आर्थिक संकट और मजहबी लड़ाई के कारण इस्तीफा देना पड़ा था। 1991 में राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद भारत की अर्थव्यवस्था घुटने टेक चुकी थी। 1980 के दशक के अंत तक भारत गंभीर आर्थिक संकट में था जिसे भारत में 1991 का आर्थिक संकट माना जाता है।


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Rakesh Kumar

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